Friday, June 28, 2013

अनाहिता



“तुम यहाँ बैठी हो? और घर पर सब परेशान हो रहे है.”

“घर पर मन नहीं लग रहा था. इसलिए यहाँ चली आई.”

“बताकर आती. सब परेशान हो रहे है घर पर. उन्हें लगा कि तुम मेरे साथ हो. मैं भी परेशान हो गया था. फिर याद आया कि दुनिया में एक ही जगह है जहां तुम मिलोगी.”

वह उसकी बगल में बैठ गया. वह कुछ बोली नहीं बस मुस्कुरा दी.

“समझ में नहीं आता कि इस जगह में ऐसा क्या ख़ास है. क्यों तुम्हे ये समंदर इतना पसंद है?”

उसकी मुस्कान गहरी हो गयी.

“यही तो तुम्हारी गलती है. तुमने कभी समंदर को पढने की कोशिश नहीं की. कभी इसकी लहरों को समझने कि कोशिश नहीं की. ऊपर से इसकी लहरें कितनी चंचल दिखती है. लेकिन जैसे जैसे नीचे जाओगे, ये शांत होती जाती है. और समंदर की तली में तो लहरें बिलकुल खामोश हो जाती है. बिलकुल खामोश. कोई सोच भी नहीं सकता कि ऊपर से चंचल ये लहरें अन्दर में किस खामोशी को दबाये हुयी है. समंदर से गहरे कई राज़ होते है जिन्हें जानने की ज़हमत कोई नहीं उठा पता. गहरी चीजों में कितनी सच्चाई होती है. समंदर भी उतना ही सच्चा होता है. कभी तुमने या हमने ये जानने की कोशिश नहीं की कि चाँद को छूने की नाकामयाब कोशिशो के पीछे क्या पता, इन लहरों की किसी जन्म की अधूरी ख्वाहिशें रही हो. हम तो बस उसे वैज्ञानिक जामा पहना 
कर अपनी पीठ थपथपा लेते है.”

वह कुछ बोला नहीं. शांत बैठा रहा.

“क्या बात है? खामोश क्यों हो?”

“कुछ नहीं. बस ऐसे ही.”

वह खिलखिलाकर हंसी.

“चलो भी. अब मुझसे झूठ न बोला करो. तुम्हारी आँखें चीख पुकार कर कह रही है कि तुम परेशान हो. क्या बात है, बताओ मुझे.”

“मैं.... मैं खो जाना चाहता हूँ.... सच... मैं खो जाना चाहता हूँ कही पर. कुछ दिनों के लिए. बस सोचता हूँ कि कुछ दिनों के लिए खो जाऊ और फिर मन शांत हो जाए तो लौट आऊ.”

इस बार तो उसकी हंसी बड़ी ही लम्बी थी. वह थोड़ी देर को सहम सा गया उसकी हंसी से.

“अरे बुद्धू, जब लौटने का रास्ता मालुम हो तो उसे खोना थोड़ी न कहते है. खो जाने का मतलब कि फिर लौटने की कोई सूरत न रहे. खो जाना मतलब बस खो जाना....”

“शायद...”

वह फिर चुप हो गया. थोड़ी देर को शाम के धुंधलकों में चुप्पी छा गयी. बस समंदर की लहरें किसी जन्म की अधूरी ख्वाहिशों को पूरी करने की कोशिश में लगी रही. बस लहरों का ही शोर रह गया था वहाँ. लोग अपने अपने घरो को लौटने लगे थे. कुछ देर में ही सन्नाटा सा हो गया. फिर...

“तुम मेरे बारे में सोच रहे हो न?”

“हम्म.... हाँ.”

“क्या?”

“तुम बुरा मानोगी.”

फिर वही हंसी....

“बुद्धू, तुम्हारी किसी बात का बुरा नहीं लगता मुझे.”

“पता नहीं.... मगर मैं सोच रहा था कि तुम मेरा कितना ख्याल 
रखती हो...”

इस बार हंसी की जगह एक मुस्कान ने ले ली.

“तो?”

“तो... तो... मुझे बुरा लगता है कि मैं तुम्हारा उतना ख़याल नहीं रख पता जितना मुझे रखना चाहिए. और जब मैं सोचता हूँ कि तुम मेरा जितना ख़याल रखती हो मैं तुम्हारा उतना ख्याल नहीं रख पाता तो मुझे बहुत ग्लानि होती है. मुझे लगता है कि क्यूंकि तुम मेरे लिए इतना सोचती हो इसलिए मुझे भी तुम्हारे लिए इतना सोचना चाहिए.”

हंसी गायब हो गयी और मुस्कान लापता.

“तुम्हे पहले बताना चाहिए था कि तुम्हे ग्लानि होती है.”

“तुम बुरा मान गयी....”

“हरगिज़ नहीं... तुम्हारी ख़ुशी बहुत कीमती है. जानते हो तुम खुश क्यों नहीं हो? क्यूंकि तुम वो नहीं कर रहे जो तुम करना चाहते हो. भूल जाओ सब कुछ. उठाओ अपनी गिटार और बना डालो कुछ नयी धुनें. हो सकता है स्ट्रीट शो करने पड़े. म्यूजिशियन के चक्कर काटने पड़े. मगर यूट्यूब मदद करेगा. फैन फोल्लोइंग बढ़ेगी तो लोग मौके भी देंगे.”

कोई जवाब नहीं. सिर्फ शान्ति.

“तुम जानते हो मैं इतनी खुश क्यों रहती हूँ? क्यूंकि मैं सिर्फ अपने ख्वाब के बारे में सोचती हूँ. तुम भी खुश तभी रह पाओगे जब अपने ख्वाब के बारे में सोचोगे. और जब खुद खुश रहोगे तभी दुसरो को भी ख़ुशी दे पाओगे.”

समंदर में एक बड़ी लहर उठी और छपाक से समंदर में तली में चली गयी.

“सच! मैं... मैं यही करूँगा.”

“हाँ, अभी से तैयारी शुरू करो. अभी जाओ. और जुट जाओ. और सुनो अपना ध्यान न भटकाना. जब तक सफल न हो जाओ. मुझसे न मिलना. मेरे बारे में पूछना भी मत. नहीं तो ध्यान भटकेगा. अब जाओ. और पीछे मुड़कर मत देखना.”

वह उठा लेकिन उठने से पहले उसने उसे गले लगा लिया. फिर ख़ुशी से बिना रुके, और बिना किसी को बताये वह उसी रात वह शहर से चला गया.

तीन साल.

उसने खूब मेहनत की. जान से प्राण से. और कामयाबी हासिल की. आज देश नहीं, दुनिया में उसका नाम था. वह बहुत खुश था.

वह अपने शहर लौटा और सीधा उसके घर गया. वह अपने घर में नहीं थी. उसने मगर किसी से कुछ नहीं पूछा और न ही किसी ने उसे कुछ बताया. वह जानता था कि वह कहाँ मिलेगी.

लेकिन समंदर किनारे बड़ा सन्नाटा था. वहाँ कोई नहीं था. वह जगह निर्जन हो चुकी थी. जैसे कई सालो से वहाँ कोई नहीं आया हो. वह उदास हो गया. क्या हुआ था आखिर?

तभी अचानक उसकी नज़र कुछ पत्थरो पर पड़ी. उन पत्थरो के पास एक छोटा सा खोह था. उसे याद था अक्सर वह उसे सताने के लिए उस खोह में उसकी चीज़े छुपा दिया करती थी और फिरौती में आइस-क्रीम या चौकलेट मिलने पर दिया करती थी. अनायास ही उसके कदम उस तरफ बढ़ चले. उस खोह में कुछ चमकती हुई चीज़ थी. उसने हाथ लगाया. प्लास्टिक में कागज़ का टुकड़ा रखा था. उसने वह कागज़ निकाल कर देखा –

“प्रिय अनिकेत,
मुझसे एक गलती हो गयी. मैं खो गयी. मुझे कभी पता ही नहीं चला. मैंने खुद को खो दिया. हमेशा तुम्हारे बारे में ही सोचा. तुम्हारी ही ख्वाहिशो को जिया. न कभी खुद पर ध्यान दिया. न कभी खुद से प्यार किया. जैसे मैं तो कभी थी ही नहीं. बस तुम ही थे. और जब पता चला कि तुम्हारी ग्लानि की वज़ह मैं हूँ तो कुछ बचा ही नहीं. तब ध्यान आया कि अरे मैं तो कब की खो चुकी हूँ. अभी तुम्हे जाते हुए देख रही हूँ. तुम्हारे जाने के बाद मैं नज़र ही नहीं आ रही. यही तो खो जाना होता है.

अनिकेत, तुम मुझे कभी माफ़ मत करना.

तुम्हारी,
अनाहिता”


- © स्नेहा गुप्ता

Thursday, June 27, 2013

एक ग़ज़ल

सोचती हूँ आज फिर एक ग़ज़ल की शुरुआत करूँ 
चंद अपने अल्फाजों से थोड़ी सी बात करूँ

न मालुम किस हाल में, कैसे हैं, कहाँ हैं 
अपनी हसरतों से आज फिर एक मुलाक़ात करूँ

रूखी सी ज़िन्दगी में ख्वाब अधूरे जो छूट गए
उन्हें संवारू, निखारू और ख़्वाबों से खयालात करूँ 

कि होंठ हो खामोश जब कहना हो बहुत कुछ 
तो फिर अपनी कलम से ही ज़ाहिर सब जज़्बात करूँ

- © स्नेहा गुप्ता
२७/०६/२०१३ 

Saturday, May 18, 2013

आक्रोश


सल्फास खाकर जिंदा हैं
अजी, हम बड़े शर्मिन्दा हैं

जामों के छलकते बाँध में
डीयोडेरेंट की सड़ांध में
कूल डूड हॉट बेब हैं
मॉडर्निटी की छलकती पाजेब हैं
जज्बातों का बाज़ार है
इमोशनल अत्याचार है
दुःख का सीज़न गर्म है
दिल भी बड़ा ही नर्म हैं
महंगाई की चौहरी मार है
ईमानदारी भी बेरोजगार है
किरकेट का इसमें मेल नहीं
आई पी एल कोई खेल नहीं
अब मिलता कहाँ सुकून हैं
विश्वास का हो गया खून हैं
सच्चाई की चप्पल घिस रही है
चूल्हे में ममता पिस रही है
ऊपर शानदार मकान हैं
नीचे कोयले की खान हैं
रेलगाड़ी भी चल रही हैं
खूब पैसे उगल रही है
देखिये, कितना सज्जन ‘फेस’ है
वैसे सी.बी.आई. में दर्ज केस है
मगर पिंजरे में बंद परिंदा हैं

तेरे कातिल अभी तक जिंदा हैं
दामिनी, हम बड़े शर्मिन्दा हैं

-  -  स्नेहा गुप्ता  
  18/05/2013 8:25pm

Friday, May 3, 2013

दिवास्वप्न की पाती.....


सुनो,
तुम डराया न करो मुझे इस तरह..
मुझे डर लगता है
कभी तुम्हारी आँखों से
कभी तुम्हारी बातो से

फिर भी तुम्हे जानना चाहती हूँ
तुम्हे समझना चाहती हूँ
मुझे जानने दो
तुम्हे
समझने दो
तुम्हे सोचना मुझे अच्छा लगता है..


मैंने तुम्हे बताया नहीं कभी
तुम एक रहस्यमयी किताब से हो
तुम्हे पढ़ लेना चाहती हूँ
लेकिन अचानक नहीं
बल्कि हर पन्ना हर रोज़
थोड़ा थोड़ा करके
तुम्हे पढना मुझे अच्छा लगता है

मैंने तुम्हे बताया नहीं कभी
तुम एक बहुघातीय समीकरण से हो
कभी तुम्हे सुलझा लेना चाहती हूँ
कभी यूं ही उलझ कर रह जाना चाहती हूँ
सुलझ कर उलझ जाना मुझे अच्छा लगता है

मैंने तुम्हे बताया नहीं कभी
कि तुम धुंध कि तरह छाये हो मेरी ज़िन्दगी में
और
धुंध में भटकना मुझे अच्छा लगता है

मैंने तुम्हे बताया नहीं कभी
कि मैं जानती हूँ
कि तुम कभी सुनोगे भी नहीं
कभी पलटकर देखोगे भी नहीं
फिर भी तुम्हे पुकारना मुझे अच्छा लगता है

मैंने तुम्हे बताया नहीं कभी
कि मुझे मालुम है
कि तुम्हारी चाहत वो हसीं दुनिया है
जो तुम्हारे आगे है
और तुम्हारी ख़ुशी में ही खुश होना मुझे अच्छा लगता है

मैंने तुम्हे बताया नहीं कभी
कि ऐसे सैकड़ो ख़त मैंने लिख डाले है तुम्हे
जो तुम कभी पढोगे भी नहीं
और मेरे अलावा कोई तुम्हे लिखेगा भी नहीं
फिर भी ...........
.............. अच्छा लगता है......



 - स्नेहा गुप्ता
 03/05/2013 09:30PM

Friday, April 26, 2013

बेवफा ज़िन्दगी .....


अब भी तो कुछ रहम कर ऐ बेवफा ज़िन्दगी
दे रही किस बात की तू सज़ा ज़िन्दगी

सांस लेना भी क्या अब गुनाह हो चला है
हो रही क्या मुझसे यही खता ज़िन्दगी..

ख़ुशी में खुश होने का भी हक दिया नहीं तूने
क्यों करती रही हरदम ज़फ़ा ज़िन्दगी

निचुड़ी हुई आँखे और होंठ बेबस मुस्कुराने को
क्यों ऐसी रही तेरी बेदर्द अदा ज़िन्दगी

बेरहम, तू उसे आने भी तो नहीं देती
कि मौत आये और तेरा हर सितम हो फना ज़िन्दगी 



-    स्नेहा गुप्ता
26/04/2013 11:00pm

Sunday, April 21, 2013

मैं और मेरी ज़िन्दगी.....


बिगड़ती है, संवरती है, ठुकराती है, अपनाती है
इस तरह ज़िन्दगी मुझे जीना सिखाती है

देकर कुछ लम्हे हंसी के, ख़ुशी के
ज़ख्म कोई नया ये फिर दे जाती है

खुद ही हंसती है मेरी बेबसी पर
और खुद ही मेरे ज़ख्म सहलाती है

कभी कभी एक अजनबी सी दुनिया दिखाती 
तो कभी बचपन की सहेली सी नज़र आती है

चमकेंगे निकलकर गर्दिश से ये तारे
मैं इसे समझाती हूँ, ये मुझे समझाती है

चल ढूंढे अपनी ज़मीन अपना आसमान
ख्वाबों के शहर में मुझे खींचकर ले जाती है

बस कुछ पल के साथ को ही दुनिया में मिलते है सभी
अकेली मैं रह जाती हूँ, अकेली यह रह जाती है ...

-   -  स्नेहा गुप्ता
21/04/2013 5:10PM 

Sunday, March 31, 2013

कलाकार .....

तुम तस्वीरें बनाना चाहते हो न…?


कैसे बनाओगे?

बना पाओगे
मेरे उन आंसुओं की तस्वीरें  
जो कभी मेरी आँखों से छलकी ही नही …. ?

खींच पाओगे 
एक रेखाचित्र 
मेरे उस दर्द का 
जो तुमने कभी महसूस ही नहीं किया …?

कौन से रंगों में ढालोगे 
मेरे जले हुए सपनो की राख को…. ?

कैसे उकेरोगे 
उन रंगों को 
जो मेरी पलकों के नीचे 
सपनो की ख़ाक जमने से बनी है ....?

तुमने कहा था कि तुम कलाकार हो 

तुम्हे खुद पर भरोसा तो है न ...?

क्यूंकि तुम हमेशा मेरी मुस्कुराहटो में ही क़ैद होकर रह गये…. 

- स्नेहा गुप्ता 
01/04/2013 12:17 AM

Sunday, March 17, 2013

हमेशा ..........

हर बात दिल में ही घुलती रही हमेशा 
रेत हाथ से फिसलती रही हमेशा 

ये आँखें जब तकदीर का आईना हो चली 
ख्वाहिशें अश्क़ बनकर पिघलती रही हमेशा 

मंजिलें सारी कोहरों में खो गयी 
राहें बेवज़ह ही चलती रही हमेशा 

बहारो को ही चमन से नफरत हो गयी 
बेरहम हो गुलो को कुचलती रही हमेशा 

जिन चिरागों का फ़र्ज़ ज़िन्दगी को रोशन करना था 
ज़िन्दगी उन्ही चिरागों से जलती रही हमेशा 

- स्नेहा गुप्ता 
14 February 2013
11:45PM


Friday, March 1, 2013

अब आपसे मिला नहीं करेंगे .......

 आपसे किसी बात का गिला नहीं करेंगे 
वादा रहा अब आपसे मिला नहीं करेंगे 

आपको हमने यूँ तो हैरान बहुत किया 
बेसबब बेवज़ह परेशान बहुत किया 
ख्यालो से अब आपके खिला नहीं करेंगे 
वादा रहा अब आपसे मिला नहीं करेंगे 

 जिंदगी हसीन थी जिंदगी हसीन है 
बात लेकिन ये बेहद ज़हीन है 
इस बात में मगर हम घुला नहीं करेंगे 
वादा रहा अब आपसे मिला नहीं करेंगे 

आपकी चाहत की मन्नतें न सही 
तक़दीर में अपनी जन्नतें न सही 
मोम बनकर हम जला नहीं करेंगे 
वादा रहा अब आपसे मिला नहीं करेंगे 

मिल जाये कोई नियामत भी शायद 
क्या पता हो जाये मुहब्बत भी शायद 
मुस्कुरायेंगे हमेशा , होठों को सिला नहीं करेंगे 
मगर वादा रहा अब आपसे मिला नहीं करेंगे ...........

- स्नेहा गुप्ता 
01/03/2013
00:30AM


Friday, February 22, 2013

दास्ताँ -ए - जिंदगी ....

चार साल पहले इसे लिखा था ......




ये जिंदगी अश्को का एक समंदर है 

कुछ खामोशी के साथ उठती कई लहरें है 
इन पर भी कई अनकहे अल्फाज़ ठहरे है 
खुद में समेटे कई दास्तानें ये सागर है 

बढ़ रहा है शोर, तन्हाइयां घुट रही है 
सहेज कर रखी हर माला टूट रही है 
क्या रौशनी क्या अन्धेरा सब बराबर है 

मंजिलो से पहले ही हर उम्मीद भटक जाती है 
तूफानी लहरें कश्ती को भंवर में पटक जाती है 
बिखर गयी पंखुड़ियां खो गया हर मंजर है 

पार पाना नामुमकिन ये दरिया बहुत गहरा है 
हसरतो पर हालातो का बेहद सख्त पहरा है 
बाहर  धधकती ज्वालामुखी अन्दर है 

कुछ मिल जाए ऐसी किस्मत नहीं रही 
कुछ पाने की भी अब चाहत नहीं रही 
वक़्त के रहम-ओ-करम पर जिंदा अब मुक़द्दर है ....

- स्नेहा गुप्ता