Friday, April 26, 2013

बेवफा ज़िन्दगी .....


अब भी तो कुछ रहम कर ऐ बेवफा ज़िन्दगी
दे रही किस बात की तू सज़ा ज़िन्दगी

सांस लेना भी क्या अब गुनाह हो चला है
हो रही क्या मुझसे यही खता ज़िन्दगी..

ख़ुशी में खुश होने का भी हक दिया नहीं तूने
क्यों करती रही हरदम ज़फ़ा ज़िन्दगी

निचुड़ी हुई आँखे और होंठ बेबस मुस्कुराने को
क्यों ऐसी रही तेरी बेदर्द अदा ज़िन्दगी

बेरहम, तू उसे आने भी तो नहीं देती
कि मौत आये और तेरा हर सितम हो फना ज़िन्दगी 



-    स्नेहा गुप्ता
26/04/2013 11:00pm

6 comments:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज शनिवार (27-04-2013) कभी जो रोटी साझा किया करते थे में "मयंक का कोना" पर भी है!
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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    1. बहुत बहुत धन्यवाद मयंक सर!

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  2. बेरहम, तू उसे आने भी तो नहीं देती
    कि मौत आये और तेरा हर सितम हो फना ज़िन्दगी ..

    हर बात का इम्तेहान लेना चाहती है जिंदगी ... तभी तो आसानी से नहीं साथ छोड़ती ...

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    1. हाँ दिगंबर सर, ज़िन्दगी ऐसी ही है. बहुत बहुत शुक्रिया आपकी टिप्पणी के लिए

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  3. सनेहा जी नमस्कार
    आपकी इस रचना को हमने कविता मंच ब्लॉग पर साँझा किया है

    संजय भास्कर
    http://kavita-manch.blogspot.in

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    1. शुक्रिया संजय जी

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मेरा ब्लॉग पढ़ने और टिप्पणी देने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद.