Friday, September 23, 2016

उन दिनों की प्रेम कहानी...

ये उन दिनों की कहानी है जब प्यार एसएमएस और इन्टरनेट का मोहताज नहीं हुआ था. तब परदेस में कमाने वाले पतियों की घर संभालने वाली अपनी पत्नियों के साथ बगैर किसी लोचे के “लॉन्ग डिस्टेंस रिलेशनशिप” निभती थी. उस ज़माने में आँखें बाकायदा चार हुआ करती थी. इस गंभीर वाले अनबोले प्यार से इतर हाई स्कूल और कॉलेज वाला प्यार भी खूब प्रचलित हुआ करता था. आइसक्रीम की डंडियाँ “फर्स्ट फ्लाइट कूरियर” से भी सरपट प्रेमपत्र पहुंचाने का काम करती थी.

ये उस वक़्त की कहानी है जब सारी दुनिया से लताड़े जाने के बावजूद प्यार में खूब मासूमियत बची थी और ये अपने भोलेपन के साथ लड़के लड़कियों की ज़िन्दगी को सपनीला बनाने के काम में मुस्तैदी के साथ जुटा था.

अपनी ये लड़की उसी जमाने की थी. तो कहानी कुछ यूँ शुरू हुई कि उसके माँ बाप ने उसकी जिद्द के आगे झुककर उसे एक साइकिल खरीद कर दी. लड़की उसी से कॉलेज आने जाने लगी. फिर एक दिन खुद को सायरा बानो बूझते हुए वह “मैं चली मैं चली देखो प्यार की गली...” गुनगुनाते हुए जा रही थी. आमतौर पर कहानियों में लड़का लड़की से टकराता है. लेकिन यहाँ पर अपनी इस लड़की ने ही सामने से आते एक लड़के की साइकिल को ठोक दिया. आमतौर पर इसके आगे यूँ होता कि लड़की आँखें तरेरते हुए लड़के की खूब खबर लेती और लड़का कुछ कुछ फ़िल्मी से अंदाज़ में माफ़ी मांगता. पर यहाँ हुआ ठीक उल्टा. लड़की घबरा गयी और फ़ौरन साइकिल से उतरते हुए खुद ही लड़के को “सॉरी” बोल पड़ी. लड़का कहना तो बहुत कुछ चाहता था लेकिन उसका घबराया हुआ चेहरा देखकर शांत हो गया और कुछ न बोला. लड़की चुपचाप साइकिल लेकर घर की तरफ चल पड़ी. उसे ये बिलकुल भी मालुम न चला कि लड़का चोरी चोरी धीरे धीरे पैडल मारता हुआ उसके घर का रास्ता देख रहा है. खैर, लड़की अपने घर सही सलामत पहुँच गयी और लड़के ने उसकी गली को याद कर लिया.

कहानी यहाँ से शुरू होती है.

उसके बाद लड़की ने कई बार उस लड़के को अपनी गली में देखा. वह उसे देखकर घबरा जाती थी. उसे डर था कि कही वह लड़का उसके पापा से उसकी शिकायत करने तो नहीं आया. या फिर शायद उसकी साइकिल का कोई अंजर पंजर टूट गया था जिसकी कीमत वसूलने आया हो. लेकिन ऐसा कुछ न हुआ. लड़का बस उस गली के चक्कर लगाता और लड़की से नज़रे टकराने पर मुस्कुरा देता. लड़की बड़ी भोंदू थी. कुल मिलाकर ४३ चक्करों के बाद उसे लड़के की मंशा समझ में आई और यह सोचकर ही उसके गाल लाल हो उठे. तो जब लड़का अगले चक्कर के वक़्त उसे देखकर मुस्कुराया तो वह भी मुस्कुरा दी. लड़के की तो बल्लियाँ उछलने लगी. प्रेम दोतरफा जो हो गया था. उसके बाद लड़का जब भी चक्कर लगाता तो “तुझको पुकारे मेरा प्यार...” गाता हुआ निकलता तो लड़की उसकी आवाज़ सुनते ही कभी कथरियाँ सुखाने तो कभी देहरी से आवारा कुत्तो को भगाने के बहाने बाहर निकलती. दोनों एक दुसरे को देखते. लड़का मुस्कुराता और लड़की शरमा जाती. फिर लड़का कालर सीधा करता हुआ “मेरी नींदों में तुम, मेरे ख़्वाबों में तुम...” गाता हुआ निकल जाता. उस जमाने  में यही “डेटिंग” हुआ करती थी.

कहानी यहाँ ख़त्म नहीं होती.

इसके आगे कहानी में बहुत कुछ होने की संभावना थी लेकिन संभावना हमेशा संभावना ही बनी रही. चक्कर लगाते, फ़िल्मी गाने गाते, रिझाते और शर्माते साल बीता और लड़की की शादी कहीं और हो गयी. लड़की उस जमाने की थी. वह चुप्पी मार कर पति, बच्चों और घर गृहस्थी में रम गयी और किसी को कभी कुछ पता न चला. हाँ, लड़के के घर के टेप रिकॉर्डर में “भँवरे ने खिलाया फूल, फूल को ले गया राजकुंवर...” कई महीनों तक बजता रहा. फिर वह भी शांत हो गया. और इस तरह मोहल्ले की ये प्रेम कहानी दुनियादारी की भेंट चढ़ गयी.

अगर हमारा बस चले तो हम ‘इफ़ेक्ट’ के लिए बैकग्राउंड में “दो दिल टूटे दो दिल हारे...” भी बजवा दे...

लेकिन कहानी यहाँ भी ख़त्म नहीं होती.

कई साल बीत गए. लड़का और लड़की अब नाती पोते वाले होने को है. लड़की जब कभी मायके आती है तो बाज़ार जाते हुए जिस जगह पर उस लड़के की साइकिल को ठोका था उस जगह पर पहुँचते ही उसके चेहरे पर ठीक वैसी ही मुस्कान आ जाती है जो उस लड़की के गली से गुजरते हुए लड़के के चेहरे पे आती है. इस मुस्कान से इन दोनों का बड़ा पुराना रिश्ता सा बन गया है. और जिन पुराने गानो को सुनते हुए लड़का मुस्कुरा दिया करता है उन्हें सुनकर लड़की आज भी शरमा जाती है.

कहानी यहाँ भी ख़त्म नहीं होती. दरअसल ये कहानी ख़त्म ही नहीं होती. क्यूंकि उस जमाने की प्रेम कहानियाँ कभी ख़त्म ही नहीं होती... कुछ तो था उस जमाने में और उस जमाने की प्रेम कहानियों में... क्यूंकि ये उन दिनों की कहानी है जब प्यार एसएमएस और इन्टरनेट का मोहताज नहीं हुआ था...


[चित्र: गूगल से साभार]


© स्नेहा राहुल चौधरी 

9 comments:

  1. हमारे दौर की कहानी लिखने के लिए शुक्रिया। तब हर गली, हर नुक्कड़, हर मोहल्ले में ऐसी कहानियां मुजस्सम होती थीं और ख़त्म तो सच में कभी नहीं होती थीं क्योंकि वह गली, वह नुक्कड़, वह मोहल्ले आज भी ज़िंदा हैं। आइसक्रीम की डंडी का कूरियर से भी तेज़ होना........क्या ख़ूब लिखा है। बहुत सुंदर और हृदयस्पर्शी।

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  2. हमारे दौर की कहानी लिखने के लिए शुक्रिया। तब हर गली, हर नुक्कड़, हर मोहल्ले में ऐसी कहानियां मुजस्सम होती थीं और ख़त्म तो सच में कभी नहीं होती थीं क्योंकि वह गली, वह नुक्कड़, वह मोहल्ले आज भी ज़िंदा हैं। आइसक्रीम की डंडी का कूरियर से भी तेज़ होना........क्या ख़ूब लिखा है। बहुत सुंदर और हृदयस्पर्शी।

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    1. बहुत बहुत शुक्रिया अंकल, मुझे ख़ुशी है कि आपने इस कहानी को इतना पसंद किया :)

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  3. आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि- आपकी इस प्रविष्टि के लिंक की चर्चा कल रविवार (25-09-2016) के चर्चा मंच "शिकारी और शिकार" (चर्चा अंक-2476) पर भी होगी!
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ-
    डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  4. सच पहले के और आज के प्यार में जमीं आसमान का फर्क है ..पहले जैसा प्यार आत्मिक होता था अब तो लगता है आत्मा जैसी चीज ही कम बची है

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    1. आप सही कह रही है कविता मैडम. आजकल तो प्यार कम बन्वातिपन ज्यादा दीखता है. खुश हूँ कि आपको कहानी अच्छी लगी :)

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  5. ये तो सच कहा स्नेहा जी प्रेम कहानियाँ कभी ख़त्म ही नहीं होती
    प्रेम की गहराई को बहुत ही गहराई से प्रस्तुत करती कहानी

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    1. बहुत बहुत शुक्रिया संजय जी :)

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मेरा ब्लॉग पढ़ने और टिप्पणी देने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद.