Friday, May 3, 2013

दिवास्वप्न की पाती.....


सुनो,
तुम डराया न करो मुझे इस तरह..
मुझे डर लगता है
कभी तुम्हारी आँखों से
कभी तुम्हारी बातो से

फिर भी तुम्हे जानना चाहती हूँ
तुम्हे समझना चाहती हूँ
मुझे जानने दो
तुम्हे
समझने दो
तुम्हे सोचना मुझे अच्छा लगता है..


मैंने तुम्हे बताया नहीं कभी
तुम एक रहस्यमयी किताब से हो
तुम्हे पढ़ लेना चाहती हूँ
लेकिन अचानक नहीं
बल्कि हर पन्ना हर रोज़
थोड़ा थोड़ा करके
तुम्हे पढना मुझे अच्छा लगता है

मैंने तुम्हे बताया नहीं कभी
तुम एक बहुघातीय समीकरण से हो
कभी तुम्हे सुलझा लेना चाहती हूँ
कभी यूं ही उलझ कर रह जाना चाहती हूँ
सुलझ कर उलझ जाना मुझे अच्छा लगता है

मैंने तुम्हे बताया नहीं कभी
कि तुम धुंध कि तरह छाये हो मेरी ज़िन्दगी में
और
धुंध में भटकना मुझे अच्छा लगता है

मैंने तुम्हे बताया नहीं कभी
कि मैं जानती हूँ
कि तुम कभी सुनोगे भी नहीं
कभी पलटकर देखोगे भी नहीं
फिर भी तुम्हे पुकारना मुझे अच्छा लगता है

मैंने तुम्हे बताया नहीं कभी
कि मुझे मालुम है
कि तुम्हारी चाहत वो हसीं दुनिया है
जो तुम्हारे आगे है
और तुम्हारी ख़ुशी में ही खुश होना मुझे अच्छा लगता है

मैंने तुम्हे बताया नहीं कभी
कि ऐसे सैकड़ो ख़त मैंने लिख डाले है तुम्हे
जो तुम कभी पढोगे भी नहीं
और मेरे अलावा कोई तुम्हे लिखेगा भी नहीं
फिर भी ...........
.............. अच्छा लगता है......



 - स्नेहा गुप्ता
 03/05/2013 09:30PM

18 comments:

  1. बेहद सुंदरता से शब्द संयोजन किया गया है, कविता गहरा प्रभाव डाल रही है बिल्कुल एकल प्रेम पाति सी. शायद पहली बार हुआ है कि किसी कविता को मैने तीन बार पढा हो, बहुत ही बेहतरीन रचना.

    रामराम

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    1. बहुत बहुत धन्यवाद ताउजी

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  2. तुम एक बहुघातीय समीकरण से हो
    कभी तुम्हे सुलझा लेना चाहती हूँ

    कविता के चौथे स्टेंजा में बहुघातीय समीकरण शब्द ने स्कूल की याद दिला दी, गणित के मास्साब से बहुत डंडे खिलाये हैं इस बहुघातीय समीकरण ने.:)

    वर्ड वेरीफ़िकेशन हटा दिजीये, इसकी वजह से टिप्पणी करने में बहुत देर लगती है और ब्लागिंग में ज्यादा कुछ उपयोग नही है इसका.

    रामराम

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    1. आपकी आज्ञा सर आँखों पर ताऊजी. हटा दिया वर्ड वेरिफिकेशन :)

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  3. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज शनिवार (04-05-2013) दो मई की वन्दना गुप्ता जी के चर्चा मंच आपकी नज़र आपका कथन में "मयंक का कोना" पर भी है!
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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    1. धन्यवाद मयंक सर

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  4. बहुत सुन्दर! दिल को छू लेनी वाली रचना!
    कभी यहां भी पधारकर मुझे अनुग्रहीत करें-
    http://voice-brijesh.blogspot.com

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    1. बहुत धन्यवाद बृजेश जी

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  5. फिर भी ...........
    .............. अच्छा लगता है......
    सच ... बहुत ही खूबसूरत से अहसास ...

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    1. बहुत बहुत धन्यवाद सदा जी

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  6. कि मुझे मालुम है
    कि तुम्हारी चाहत वो हसीं दुनिया है
    जो तुम्हारे आगे है
    और तुम्हारी ख़ुशी में ही खुश होना मुझे अच्छा लगता है--
    प्रेम की गहन अनुभूति
    बहुत सुंदर


    आग्रह है मेरे ब्लॉग का भी अनुसरण करे
    http://jyoti-khare.blogspot.in

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    1. धन्यवाद ज्योति सर

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  7. कि‍तना कुछ रह जाता है अनकहा....

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    1. हाँ बहुत कुछ अनकहा ही रह जाता है...

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  8. अनजाने की कितना कुछ प्रेम का कुछ कह जाती है ...
    शब्दों की जादूगरी ... लाजवाब ...

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  9. वैसे तुम पुकार कर तो देखो.... क्या पता वो पलट कर तुम्हे सुन ले।

    खालीपन और अकेलेपन का एहसास लिए अच्छी रचना।

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मेरा ब्लॉग पढ़ने और टिप्पणी देने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद.