Thursday, June 7, 2012

लाइफ-पार्टनर

आयुष अस्पताल से घर लौटकर अपने कमरे में दाखिल ही हुआ था कि उसे अक्षिता लैपटॉप खोले मिल गयी.

"क्या कर रही हो, अक्कू?" उसने मुस्कुरा कर उसके सर पे हलकी थपकी देते हुए पूछा.

"भैया, आपने मुझे अपनी गर्लफ्रेंड के बारे में नहीं बताया?" अक्षिता ने झटके से घूम कर उससे सीधा सवाल दाग दिया.

आयुष घबरा गया. उफ़! फिर नयी मुसीबत. अब अच्छा खासा वक़्त लगना था उसे अक्षिता को ये समझाने में कि उसकी कोई गर्लफ्रेंड नहीं है. लेकिन अक्षिता का क्या! उसे तो आयुष के परिचितों में शामिल हर लड़की उसकी गर्लफ्रेंड ही लगती थी. और उसे ही क्यों? माँ और पापा का भी तो यही हाल था. घर में सभी यह जानने के लिए बेताब थे आयुष किस लड़की को पसंद करता है. दर असल यह बेताबी उसकी शादी को लेकर थी. और सबसे ज्यादा उत्साहित आयुष की छोटी बहन अक्षिता ही थी. वह जासूस की तरह आयुष पर नज़र रखती थी. भैया ने किस लड़की से बात की. कौन सी लड़की के साथ हँसे. किससे सबसे ज्यादा दोस्ती है इत्यादि की खबर अक्षिता हमेशा रखती थी. उसकी जासूसी से आयुष का लैपटॉप और मोबाइल तक नहीं बचा. किस लड़की ने भैया को मेल भेजा. किसका मेसेज आया... हर बात की खबर अक्षिता को थी. इसी तरह कुछ दिन पहले वो करुणा के पीछे पड़ गयी थी. आयुष ने बड़ी मशक्कत के बाद उसे समझाया था करुणा केवल दोस्त है.

और आज फिर से....

"कौन है मेरी गर्लफ्रेंड?" आयुष ने जूते उतारते हुए उससे पूछा.

"सारिका," अक्षिता ने आयुष का मेल खोल रखा था और लैपटॉप पर उंगलियाँ फिराते हुए बोली, "आपका पूरा मेल बॉक्स उसी के मेल से भरा हुआ है."

"अरे, वो दोस्त है मेरी." आयुष हँसते हुए बोला.

"बाप रे!" अक्षिता ने हैरानी जताते हुए कहा, "सिर्फ दोस्त है और इतने सारे मेल भेजती है! आपको मेल भेजने के अलावा उसके पास और कोई काम नहीं है क्या?"

"अक्कू, वो इवेंट मेनेजर है. लखनऊ में उसकी अपनी कंपनी है."आयुष ने बताया उसे.

"अच्छा?" अक्षिता हैरान हो गयी, "और फिर भी इतना वक़्त निकाल लेती है आपको मेल करने के लिए...!"

आयुष समझ गया कि अक्षिता इतनी ज़ल्दी पीछा छोड़ने वाली नहीं थी. उसकी बात का जवाब दिए बिना उसने थोड़ी ऊँची आवाज़ में कहा, "अरे, कोई है घर में मुझे चाय पानी पूछने के लिए? दिन भर का थका हारा काम से लौटा और पूछताछ शुरू हो गयी. किसी को कोई फ़िक्र है?"

"हाँ हाँ लाती हु." अक्षिता उठते हुए बोली, "इसमें इतना भाव खाने कि कौन सी बात है. लेकिन आपने कभी बताया नहीं सारिका के बारे में."

"अरे मेरी अम्मा. ज़रूर बताऊंगा पहले ज़रा सांस तो ले लेने दो. आज दो दो सर्जरी केस आ गए थे." आयुष बोला और हाथ मुह धोने चला गया.

अक्षिता किचेन में गयी आयुष के लिए चाय बनाने. माँ आ गयी तभी.

"कुछ बताया उसने सारिका के बारे में?" उन्होंने पूछा. मतलब उन्हें भी खबर हो चुकी थी.

"हाँ," अक्षिता ने कहा, "इवेंट मैनेजर है. लखनऊ में अपनी कंपनी है."

"अरे वाह!" माँ खुश हो गयी.

"और जाती हूँ पूछने." अक्षिता चहक कर दो कप चाय उठाये आयुष के कमरे में चली गयी.

आयुष ने मेल खोल रखा था. सारिका के ही मेल्स देख रहा था. उसने अपने शहर की कुछ तस्वीरे भेजी थी. अक्षिता आई.

"और बताइये न भैया. सारिका के बारे में." चाय थमाते हुए वह बोली.
आयुष ने मुस्कुरा कर अपनी बहन को देखा. वह जानता था कि सबसे ज्यादा शौक अक्षिता को ही है. नामालूम उसने कितनी बार हर परिचित से 'भैया कि शादी में ये करुँगी. भैया कि शादी में वो करुँगी.' कहकर अपने सारी योजनाओं को दोहराया होगा. लेकिन आयुष भी क्या करे! कोई लड़की पसंद भी तो आनी चाहिए.

आयुष ने चाय के कुछ घूँट भरे और कहना शुरू किया, "पिछली बार जब दिल्ली गया था तब सारिका से मुलाक़ात हुई थी. वह वहाँ अपने स्टाफ को घुमाने लायी थी. लालकिले पर हम दोनों के ही ट्रूप मिले. वह अपने साथियो को लालकिले से जुडी कहानियां और घटनाएं बता रही थी. मैं उसे गाईड समझ बैठा. यहाँ तक कि उसे ऑफर भी कर दिया पूरे ट्रिप का. वह खिलखिलाकर हंसी. और इस तरह हमारी दोस्ती हुई. मैंने उसका नंबर और ईमेल ले लिए और उसने मेरा. बस तभी से हम कॉन्टेक्ट में है."

"अच्छा, तो मतलब उसे भी इतिहास और ऐतिहासिक चीजों में दिलचस्पी है आपकी तरह?" अक्षिता ने ख़ुशी से कहा.

"हाँ," आयुष ने शांत सा जवाब दिया, "इसीलिए तो दोस्ती हुई."

"फिर तो बहुत अच्छा है भैया. आप दोनों की पसंद भी मिलती है." अक्षिता अपनी ख़ुशी छिपा नहीं पायी.

"तुम भी बिलकुल पागलो जैसी बात करती हो, अक्कू. कहाँ जयपुर और कहाँ लखनऊ! और मैं आज तक उससे सिर्फ एक ही बार मिला हूँ. और ऐसा कैसे हो सकता है?"

"क्यों नहीं हो सकता?" अक्षिता ने जवाबी सवाल दागा, "यहाँ तो बिना देखे ही शादियाँ हो जाती है और आप तो मिल भी चुके है एक बार."

"सिर्फ एक बार." आयुष दृढ़ता से बोला.

"तो कह दो कि आपको सारिका पसंद नहीं. फिर मैं नहीं बोलूंगी कभी कुछ भी." अक्षिता ने ज़रा सी नाराजगी जताई.

"अरे, ऐसा नहीं है अक्कू. सारिका बहुत अच्छी लड़की है. लेकिन मैं तो सिर्फ एक ही बार मिला हूँ उससे. और ये सब! फिर मेरे दोस्त क्या कहेंगे?"

"भाभी से पूछकर दोस्त चुनोगे कभी?" अक्षिता ने पूछा.

"बिलकुल नहीं.' आयुष ने स्वाभिमान से जवाब दिया.

"तो फिर दोस्तों से पूछकर भाभी चुनने का क्या तुक?"

आयुष ने स्तब्धता से अक्षिता को देखा. सही तो कह रही थी वो. ज़िन्दगी उसकी अपनी है. लड़की उसे पसंद होनी चाहिए. अब कैसे पसंद आये कहा पसंद आये इससे दोस्तों को क्या मतलब?

आयुष से कुछ कहते नहीं बना. लेकिन अक्षिता ने बात जारी रखी, "ऐसा कैसे होगा. कैसे होगा सोचने लगे तो फिर कभी नहीं होगा. फिर माँ पापा को अपनी पसंद की ही किसी लड़की से आपकी शादी कर देनी होगी. फिर आप किसी दिन फुर्सत में बैठ कर सोचोगे कि काश सारिका को प्रोपोज किया होता तो क्या बात होती!"

आयुष को नहीं मालुम था की अक्षिता इस हद तक उत्साहित है. वह उससे कुछ कहना ही चाहता था कि माँ ने उसे बुलाया और वह चली गयी... आयुष को अपने विचारों में छोड़कर....

रात का खाना खाने के बाद जब आयुष लेटा तो भी अक्षिता की बाते ही उसके दिमाग में घूम रही थी. सारिका सचमुच बहुत अच्छी लगती थी उसे. आत्मनिर्भर लड़की थी. और उसके उम्र की कम लडकियों को वह जानता जिन्होंने अपनी खुद की कंपनी खोल रखी हो. वैसे अच्छी तो उसे करुणा भी लगती थी. दोनों जुदा थी एक दुसरे से. हालांकि हंसमुख दोनों ही थी. लेकिन एक फर्क था. सारिका की बातो में आयुष को परिपक्वता नज़र आती थी. कैसे भी हालात हो वह रास्ता निकाल लेती थी. सबको साथ लेकर चलने कि आदत थी उसकी. और अपने स्टाफ के ४० सदस्यों को संभाल लेना अपने आप में एक बड़ी बात थी. इसके विपरीत करुणा का मुश्किल हालातो से कभी सामना नहीं हुआ था. वह तो हँसते खेलते डॉक्टर बन गयी थी. वैसे तेज़ वह भी बहुत थी. आयुष ने जब दोनों लडकियों कि तुलना की तो उसे लगा कि सारिका जहां बिना किसी सहारे के बल्कि दुसरो को सहारा देते हुए अपना जीवन जीने में सक्षम थी वही करुणा की ज़िन्दगी में एक ऐसा शख्स चाहिए था जो उसे संभाल सके.

निस्संदेह, आयुष सारिका को ही ज्यादा पसंद करता था. उसे पूरा यकीन था कि यदि कुछ विपरीत हालात सामने आ भी गए तो सारिका घबराने के बजाये कोई न कोई रास्ता निकाल ही लेगी. और एक बार बात करके देखने में हर्ज़ ही क्या था.

लेकिन किस बहाने से फ़ोन करे. दरअसल आयुष उससे मिल कर आमने सामने बात करना चाहता था. ऐसे कई मौके मिले थे उसे सारिका से मिलने के लेकिन उसने ध्यान नहीं दिया. खुद  सारिका ने उसे निमंत्रण भी दिया था अपनी छुट्टियों में शामिल होने का. वह साल में दो बार अपने स्टाफ के साथ छुट्टियां मनाती थी. लेकिन आयुष कुछ काम की अधिकता की वज़ह से और कुछ झिझक से नहीं जा पाया था. लेकिन आज उसे झिझक नहीं हो रही थी. बल्कि एक किस्म की चाहत सी हो गयी थी सारिका से मिलने की.

कहते है कि जब किसी चीज़ की सच्चे दिल से चाहत करो तो वह ज़रूर मिलती है. तीसरे दिन सारिका का मेसेज आया - 'फ्री होगे तो मेसेज करना.'


आयुष ने मेसेज नहीं किया. उसने कॉल किया, "हेल्लो सारिका."


"हेल्लो आयुष, एक शादी का कांट्रेक्ट मिला है आगरा में. अप्पर मिडिल क्लास फैमिली है. लम्बा प्रोग्राम है. देखो अगर आ सको तो तुम्हे आगरा घुमाउंगी."


अंधा क्या मांगे दो आँखे! आयुष छूटते ही बोला, "हाँ हाँ क्यों नहीं. ज़रूर आउंगा."


"सच? मैं इंतज़ार करुँगी." सारिका ने ख़ुशी से कहा.


"हाँ बाबा. लेकिन मेहमाननवाजी में कोई कमी नहीं होनी चाहिए."


सारिका खिलखिला कर हंस पड़ी, "जी डॉक्टर साहब, कोई कमी नहीं होगी. आप आइये तो सही. मैं एड्रेस मेसेज कर रही हु."

आगरा स्टेशन पर सारिका खुद आई थी आयुष को लेने. आयुष ने उसे देखते ही पहचान लिया. तस्वीर से ज्यादा अच्छी वह हकीकत में लगती थी.


"वेलकम टू आगरा डॉक्टर आयुष चौहान." उसने काफी जिंदादिली से हाथ मिलाया आयुष से.


"थैंक यू वैरी मच मिस सारिका वर्मा." आयुष भी उतनी ही गर्मजोशी से मिला सारिका से.

पूरी शादी में सारिका व्यस्त रही. लेकिन क्या मजाल जो एक पल को भी आयुष ने यह महसूस किया हो कि सारिका उसे वक़्त नहीं दे पा रही है. पूरे समय सारिका उसे अपने पास ही रखती थी. जो जो इंतज़ाम वह करती आयुष को बताती जाती. फूलवाले के यहाँ भी वह आयुष के साथ ही गयी. होटल का सारा इंतज़ाम देखने के लिए भी वह आयुष को साथ ले गयी. आयुष उस शादी में किसी को भी नहीं पहचानता था. लेकिन एक पल को भी उसे अजनबी जैसा एहसास नहीं होने दिया सारिका ने. पहले सारिका की जिन बातो की आयुष तारीफ़ भर करता था अब वही उसे सम्मोहित करने लगी थी.

शादी अच्छे से संपन्न हो गयी. और वादे के अनुसार अगले दिन सारिका आयुष को आगरा घुमाने ले गयी. पहले उन्होंने आगरे का किला देखा फिर ताजमहल देखने चले.
"प्रेम की अद्भुत निशानी." आयुष ने ताजमहल को देखकर कहा.

"तुम्हे यह प्रेम की निशानी लगती है?" सारिका ने पूछा.

"हाँ," आयुष ने जवाब दिया.

"मुझे तो यह आडम्बर लगता है."


"आडम्बर कैसे?" आयुष ने पूछा.

"आडम्बर नहीं तो क्या?" सारिका ने रुखाई से कहा, "दिखावा है दुनिया के सामने कि मुमताज़ को प्यार करता था. सच्चे प्यार को दिखावे कि ज़रूरत नहीं होती."

"दिखावा नहीं है." आयुष ने कहा, "शाहज़हां मुमताज़ को बहुत चाहता था इसलिए उसकी याद में ये ताजमहल बनवाया."

"कितना चाहता था?" सारिका ने पूछा, "तुम्हे मालुम भी है?" उसकी आवाज़ में व्यंग्य था, "कौन जानता है कि वह मुमताज़ पर अत्याचार करता हो. क्यूंकि उसने पैसे का सहारा लेकर ताजमहल बनवा दिया मतलब सच्चा प्रेमी हो गया? मतलब जो ताजमहल नहीं बनवाते वो प्रेम नहीं करते?"

"ऐसी बात नहीं है." आयुष ने उसे समझाने कि कोशिश की, "उसके पास इतनी दौलत थी इसलिए उसने बनवाया. इसका ये मतलब थोड़ी न हुआ की जिनके पास दौलत नहीं वो सच्चा प्यार नहीं करते. लेकिन अगर कुछ लोग दौलत का सहारा अपना प्यार जताने के लिए ले लेते है तो इसमें गलत क्या है?"

"दौलत दिखावे के लिए ज़रूरी होती है प्यार जताने के लिए नहीं." सारिका ने दृढ़ता से कहा.

"मैं तुमसे सहमत नहीं हु." आयुष ने भी उसी दृढ़ता से जवाब दिया.

सारिका अचानक से हँसते हुए बोली, "ये तो अच्छी लड़ाई हो गयी"

"हा हा" आयुष भी हँसा, "चलो अच्छा है किसी बात पर तो हम असहमत होते है."

"हाँ, लड़ने के भी कुछ बहाने होने चाहिए." सारिका जोर से हसी, "वैसे तो हम हर बात पर सहमत ही हो जाया करते है."

आयुष ने उसे हँसते हुए देखा लेकिन कुछ बोला नहीं. अब तक वो आगरा की सडको पर पहुँच चुके थे. दोनों पैदल चल रहे थे. मौसम भी अच्छा था.
कुछ देर चुप रहने के बाद आयुष बोला, "हम हर बात पर सहमत इसलिए होते है क्यूंकि हमारी पसंद लगभग एक जैसी है. हम दोनों को ही इतिहास और ऐतिहासिक  चीज़े पसंद है."

सारिका ने हंसकर सहमति जताई. दोनों घुमते रहे. काफी देर तक... पैदल आगरा की सडको पर....

दिन कैसे बीता आयुष को पता ही नहीं चला. दोनों लौट आये थे. आयुष सोचता रहा सारिका के ही बारे में. कितनी सहज थी वो. कोई बनावटीपन नहीं. आयुष ने सोचा कि उसने उसके बार में पहले क्यों नहीं सोचा और रात भर वो यही सोच सोच कर मुस्कुराता रहा.

शादी हो चुकी थी और लड़की की विदाई भी. सारिका और आयुष के चलने का भी वक़्त आ गया था. आयुष वापस जयपुर और सारिका वापस लखनऊ. दोनों अलग हो रहे थे. सारिका और आयुष दोनों ही स्टेशन पर पहुंचे. सारिका की ट्रेन आधे घंटे बाद आने वाली थी. आयुष की ट्रेन स्टेशन पर लग चुकी थी.

"अच्छा सारिका," आयुष ने कहा, "चलता हूँ. फिर मिलेंगे." उसने कहा हालाँकि  इच्छा तो थी मिलते रहेंगे कहने की. लेकिन बोला नहीं कुछ. कई बार इच्छा हुई की प्रोपोज  कर दे लेकिन कर नहीं पाया वह.


आयुष गाडी में चढ़ चुका था. वह जब अपनी सीट पर बैठा तो उसने खिड़की से देखा. सारिका उसी दिशा में देख रही थी लेकिन शायद वह आयुष को देख नहीं पा रही थी. आयुष ने उसका ध्यान आकर्षित करने की कोशिश नहीं की. वह बस मुस्कुराता हुआ देखता रहा सारिका को...

आयुष लौट तो आया था लेकिन उसका दिल वही रह गया था आगरा में या फिर शायद किसी के दुपट्टे से बंधकर अब तक लखनऊ भी पहुँच चुका था. वह सोचता रहता सारिका के ही बारे में. और सोच सोच कर मुस्कुराता रहता.


"भैया, ऐसे मुस्कुराने से भाभी थोड़ी न मिल जायेंगी. बात तो करो पहले. वरना आप मुस्कुराते रह जाओगे और वो अपनी शादी का  निमंत्रण भेज देंगी."


आयुष घबरा कर उठा. उसने अक्षिता को घूरा, "भागो यहाँ से तुम." उसने झिड़का भी उसे लेकिन फिर खुद ही हस पड़ा.


अक्षिता ने सही बात कही थी. बात करना ज़रूरी था. अगले दिन उसने सारिका को फ़ोन लगाया.


"हेल्लो सारिका."


"हेल्लो आयुष, कैसे हो?" सारिका की जानी पहचानी आवाज़.


"बिज़ी हो?" उसने पूछा, "कुछ बात करनी थी."


"आयुष मैं तुम्हे फ़ोन करती हु." सारिका ने थोडा सोचकर कहा.


"ठीक है ठीक है." आयुष ने जल्दबाजी से कहा और फ़ोन काट दिया.
तीन दिन बाद सारिका का फ़ोन आया.


"हेल्लो आयुष. माफ़ करना, एक बर्थडे पार्टी का कॉन्ट्रेक्ट मिल गया था."


"अरे, कोई बात नहीं." आयुष ने कहा फिर अपनी आवाज़ को शांत और संयत रखने का प्रयास किया.


"कुछ कहना था तुम्हे? बोलो." सारिका ने कहा.


"हाँ सारिका." आयुष ने महसूस किया उसकी धड़कन तेज़ हो गयी थी, "मैं तुम्हे बहुत पसंद करता हु. क्या तुम मेरी लाइफ पार्टनर बनोगी?" एक झटके में कह दिया आयुष ने.


"ये कैसा मज़ाक है, आयुष?" सारिक की आवाज़ में परेशानी झलक रही थी.


"मज़ाक नहीं सारिका." आयुष ने खुद को संभालते हुए कहा, "मैं सच कह रहा हु. मैं तुम्हे पसंद करता हु हमेशा से ही. मैं अक्सर सोचता था की अगर तुम्हारे जैसी लाइफ पार्टनर मिल जाए तो कितना अच्छा रहे. फिर ख्याल आया की तुम्हारे जैसी क्यों, तुम ही क्यों नहीं. तुम ही मेरी लाइफ पार्टनर बन जाओ तो कितना अच्छा रहे..."

"लेकिन तुम तो मुझे ठीक से जानते भी नहीं." सारिका सचमुच परेशान थी.


"जानता हु. अच्छी तरह जानता हु." अब आयुष में आत्मविश्वास आ गया था, "तुम बहुत अच्छी लड़की हो. तुम्हारे अन्दर बनावटीपन नहीं है. तुम बहुत सहज हो. और जानने के लिए तो सारी उम्र पड़ी है."


"लेकिन हमारी लाइफ स्टाइल बिलकुल अलग है. हमारा रहन सहन. हमारा पहनावा ओढावा. सब कुछ अलग." अब सारिका की आवाज़ में पहले जैसी तल्खी नहीं थी. आयुष ने यह बात गौर भी की.


"तो क्या हुआ अगर अलग है तो. थोडा तुम एडजस्ट कर लेना थोडा मैं एडजस्ट कर लूंगा." आयुष ने उत्साहित होकर कहा.

"लेकिन तुम्हारी फैमिली?" सारिका हर पहलु पर गौर कर रही थी.

"तुम सबको बहुत पसंद हो." आयुष ने उत्साहित होकर कहा.

"मुझे बहुत अजीब लग रहा है."

"कुछ अजीब नहीं. तुम सिर्फ इतना बताओ कि मैं तुम्हे पसंद हु या नहीं?" आयुष ने अधीरता से पूछा.

"तुम्हारे जैसा लाइफ पार्टनर मिलना एक लड़की के लिए खुशनसीबी ही होगी."

"बस अब और क्या चाहिए." आयुष ख़ुशी से फूला नहीं समाया.

"लेकिन आयुष," सारिका घबरा कर बोली, "मेरा मन बहुत विचलित हो गया है. पता नहीं क्या होगा कैसे होगा."

"सब हो जाएगा. तुम बिलकुल चिंता मत  करो. मैं आ रहा हु लखनऊ तुमसे मिलने." आयुष का मन ख़ुशी से नाच रहा था.


फ़ोन कट गया. आयुष ने इस बात पर ध्यान नहीं दिया कि सारिका ने उसकी बात का कोई जवाब नहीं दिया था.


रात को आयुष ने औपचारिक रूप से अपने माता पिता के सामने सारिका की बात रखी. वे लोग तो बस इसी का इंतज़ार कर रहे थे. उन्होंने सहर्ष स्वीकृति दे दी. अगले दिन आयुष लखनऊ जाने के लिए घर से निकला. अक्षिता ने उसे बेस्ट ऑफ़ लक कहा.

सारिका के घर का पता था आयुष के पास. जब वह उसके घर पहुंचा तो थोडा सा घबराया हुआ भी था. उसने घंत्री बजाई तो एक प्रौढ़ महिला ने दरवाज़ा खोला.


"नमस्ते." आयुष ने हाथ जोड़कर कहा, "क्या आप सारिका की माँ है?"


"जी. आप कौन?"


"मैं आयुष."


"अरे, आयुष बेटा. आओ आओ अन्दर आओ." सारिका की माँ ने ख़ुशी से आयुष को अन्दर बुलाया, "सारिका ने बताया था आपके बारे में."


"अच्छा?" आयुष ने ख़ुशी से पूछा, "क्या बताया था?"


"यही की आप दोनों दोस्त है." सारिका की माँ आयुष को बैठक में लाते हुए बोली, "सारिका तो है नहीं घर पे. मैं उसे फ़ोन कर देती हूँ. आप यहाँ बैठो, मैं चाय लेकर आती हु."

सारिका की माँ चली गयी. उनकी बातो से आयुष समझ गया की सारिका ने उन्हें कुछ भी नहीं बताया था उसके प्रोपोजल के बारे में. वह अपने आस पास का निरिक्षण करने लगा. छोटा सा घर था लेकिन साफ़ सुथरा था. छोटे से कमरे में हर सामान करीने से रखा हुआ था. आयुष की नज़रे कमरे में घूम ही रही थी की सारिका के पिताजी कमरे में दाखिल हुए.


"नमस्ते." आयुष ने खड़े होकर अभिवादन किया.


"नमस्ते बेटा, बैठो. आप खड़े क्यों हो गए?" आयुष के पिताजी बैठते हुए बोले.


जवाब में आयुष मुस्कुराते हुए बैठ गया.


"क्या नाम है बेटा आपका?' सारिका के पिताजी ने पूछा.


"जी, आयुष चौहान." आयुष ने जवाब दिया.


"कहा से हो आप?' उन्होंने फिर पूछा.


"जी, जयपुर से."


"करते क्या हो आप जयपुर में?"


"जी, मैं कार्डियोलोजिस्ट हूँ."


"अच्छा तो आप डॉक्टर हो!" सारिका के पिताजी हँसते हुए बोले. आयुष भी मुस्कुराया.

अभी बाते चल ही रही थी कि उधर से सारिका और इधर से सारिका की माँ चाय लेकर आ गयीं. सारिका ने जैसे ही आयुष को देखा, वो खुश भी हुई और परेशान भी. बगैर बातचीत में शामिल हुए, वो एक कोने में जाकर सर झुका कर खड़ी हो गयी. लेकिन उसके चेहरे पर उभर आई परेशानी आयुष से छुपी नहीं रही. उसने वक़्त नहीं खोया अब ज्यादा.


"अंकल, मैं आपकी बेटी से शादी करना चाहता हूँ."


आयुष का इतना कहना था कि कमरे में सन्नाटा छा गया. जैसे मुर्दानगी  छा गयी हो.


कुछ देर बाद, सारिका के पिताजी बोले, "हमारे यहाँ गैर-बिरादरी में शादी नहीं होती." उनकी वाणी में पहले जैसी मधुरता नहीं रही थी. हालाँकि सारिका की माँ चुप रही.


"अंकल, आज के ज़माने में भी आप ऐसा बातो को मानते है?" अब आयुष को समझ में आ गया था कि उसके प्रोपोज करने पर सारिका परेशान क्यों हो गयी थी.


"ज़माने बदलते है. परम्पराएं नहीं बदलती." सारिका के पिताजी दृढ़ स्वर में बोले.


"भले ही उसके लिए आपको अपनी बेटी की खुशियों कि बलि क्यों न चढ़ानी पड़े?" आयुष भी दृढ़  स्वर में बोला. वह कुछ सोचकर ही लखनऊ आया था.


आयुष का इतना बोलना था कि सारिका के पिता ने अपनी बेटी को खा जाने वाली नजरो से घूरा. सारिका पहले से ही सर झुकाए खड़ी थी.


"सारिका ने कुछ नहीं किया." आयुष बोला, "मैं सारिका को पसंद करता हूँ, इसलिए उसे आप लोगो से माँगने चला आया. लेकिन मैं नहीं जानता था कि आप लोग इतने ढकोसलापंथी है." आयुष का स्वर तेज़ हो गया था. वह उठ खड़ा हुआ, "मुझे तरस आता है ये सोचकर कि इतनी काबिल लड़की के माता पिता ऐसी सोच रखते है..." वह चलने को हुआ कि तभी उसकी नज़र सारिका पर पड़ी... वह उसे ही देखा रही थी... अपनी डबडबाई आँखों से.... आयुष समझ गया कि उसे आंसू छलकाने कि भी इजाज़त नहीं थी.... उसका दिल भर आया लेकिन वह रुका नहीं.... दनदनाता हुआ बाहर निकल गया....

आयुष लौट तो आया था लेकिन उसका चैन वही लखनऊ में छूट गया था. सर में हमेशा दर्द रहने लगा था और नींद भी आनी कम हो गयी थी. जब से वह लौटा था तब से उसने सारिका से बात भी नहीं की थी और न ही सारिका ने उसे फ़ोन किया था. पर उसे सारिका की बेहद चिंता हो रही थी. न जाने बिरादरी के नाम पर क्या 
सलूक
करे उसके माता पिता उसके साथ.

सारिका बस खामोश थी. घर में किसी ने कुछ कहा तो नहीं था उससे लेकिन पिताजी का गुस्सा छुपा नहीं रहा था. वह भी चुप थी. बस रात को चुपके से रो लेती थी. माँ से यह बात छुपी नहीं की सारिका अन्दर ही अन्दर घुट रही थी. सारिका बस किसी तरह वक़्त काट लेना चाहती थी. एक शादी का कॉन्ट्रेक्ट मिला और सारिका ने खुद को व्यस्त कर लिया. एक दोपहर को वह डेकोरेटर का हिसाब कर रही थी की माँ ने पूछा, "कहा मिली थी तुम आयुष से?"



सारिका के दुःख का गुबार फूट पड़ा, "आयुष जा चुका है माँ. और अब वह लौट कर नहीं आने वाला. और अब उसके बारे में पूछने का कोई मतलब नहीं है. तुम कुछ मत पूछो . तुम सिर्फ मुझे बता देना की किस बिरादरी वाले से शादी करनी है मुझे. बता देना क्यूंकि शादी के लिए फूलवाले से मैं खुद बात कर लुंगी. सारी व्यवस्था मैं खुद कर लुंगी. तुम्हे किसी बात की चिंता नहीं करनी है. लेकिन माँ, एक बात कभी मत पूछना." सारिका की आँखे भर आई थी, "मुझसे कभी मत पूछना की मैं खुश हु या नहीं..."


रात को जब पिताजी खाना खा रहे थे तो सारिका की माँ ने पूछा, "आयुष में क्या खराबी थी?"


"वह हमारी बिरादरी का नहीं है." पिताजी उसी आवाज़ में बोले.


"अच्छा?' सारिका की माँ व्यंग्य से बोली, "और हमारी बिरादरी का कोई डॉक्टर लड़का जयपुर से चला आता अपनी सारिका के लिए और हिम्मत से कर लेता खुद आपसे ही बात?"


पिताजी चुप रहे लेकिन मुह में निवाला ले जाता हुआ उनका हाथ रुक गया.
"बड़ा सीना चौड़ा कर के कहते है आप की मेरी बेटी है जब कभी सारिका की तारीफ़ होती है तो. जिस बेटी ने समाज में इतना नाम दिलाया है आपको आप उसकी चाह बिरादरी के नाम पर कुर्बान कर रहे है? जब आप बुद्धे हो जायेंगे तब क्या आपकी बिरादरी वाले आयेंगे आपकी देख भाल करने या बेटी देखेगी? तब किस मुह से आप बेटी से अपेक्षा करेंगे की वह आपकी देख-रेख करे जब आपने उसकी ख़ुशी बिरादरी के नाम को चढ़ा दी. तब अगर वह ये कह दे कि जाइए बिरादरी वालो से सेवा करवाइए तब आप क्या कहेंगे? वो लड़का भी तो बिरादरी के बाहर कि लड़की के लिए आया था. बिना माँ-बाप कि मर्ज़ी के तो नहीं आया होगा इतनी दूर. उसके माँ-बाप कैसे मान गए? वो मानते होंगे कि आज बेटे को देखेंगे तो कल बेटा हमको देखेगा. वो सब छोडिये.  आप जो लड़का ढूंढेंगे सारिका के लिए क्या वो उतनी तकलीफ उठाएगा जितनी तकलीफे उठाकर आयुष जयपुर से यहाँ लखनऊ आया था. जिस तरह से आपने बे-इज्ज़त करके आयुष को निकाला, क्या आपका चुना हुआ लड़का इतनी बे-इज्ज़ती बर्दाश्त करेगा? मान लीजिये सारिका के लिए वर ढूँढने में धोखा खा गए तो? मानियेगा कभी अपनी गलती? साफ़ साफ़ कह दीजियेगा कि सारिका की ही किस्मत खराब है. आप क्या दोष दीजियेगा उसे. उसकी किस्मत तो इतनी तेज़ है कि एक लड़का खुद चल कर आ गया आपके पास आपकी बेटी का हाथ माँगने. जाते जाते वक़्त मैंने उसकी आँखों में अपनी सारिका के लिए मोह देखा. इतना जान लीजिये कि आप कितना ही अच्छा लड़का खोज लीजिये लेकिन आयुष 
जितना ख़याल और स्नेह कोई लड़का सारिका से नहीं करेगा. और बड़ा घमंड है आपको अपनी बिरादरी का तो यही बात कचहरी में कहिये तो जानू. सारिका बालिग़ है. आयुष के साथ कोर्ट मैरिज कर ली तो क्या कीजियेगा आप? लेकिन, मैं जानती हूँ कि मेरी बच्ची घुटती रहेगी लकिन ऐसा हरगिज़ नहीं करेगी. क्यूंकि अपने पिता से बहुत प्यार करती है. भले वो अपनी इकलौती बच्ची से प्यार करते हो या नहीं..."


सारिका के पिता चुपचाप सुन रहे थे. उनसे खाया नहीं जा रहा था. उन्हें शांत देखकर सारिका कि माँ उनके करीब आई और बोली, "देखिये तो, हमारे बच्चे कितने बड़े हो गए है! क्या अब हमें बड़े नहीं हो जाना चाहिए."

आयुष अपने कमरे में लेटा हुआ था. सरदर्द से राहत पाने के लिए उसने एक पट्टी बाँध ली थी सर पे. फिर भी कोई आराम नहीं था. अचानक अक्षिता आंधी तूफ़ान कि तरह
दौड़ती हुई आई... "भैया, भैया... भाभी का फ़ोन... भाभी का फ़ोन..."


उसकी तेज़ आवाज़ से आयुष कि तन्द्रा टूटी. उसने हडबडाकर फ़ोन लिया.


"हेल्लो?"


"हेल्लो आयुष. कहा थे तुम. एक भी मेल का जवाब नहीं दिया. कल से फ़ोन कर रही हु कभी स्विच ऑफ तो कभी कोई उठाता नहीं. अभी तुम्हारी बहन ने फ़ोन उठाया. कहा हो तुम अभी?' सारिका एक सांस में बोल गई.


"घर पे हूँ. क्यों?" आयुष ने हैरान होकर पूछा.


"बाबूजी तुमसे मिलने अस्पताल गए है."


"क्या??" आयुष उछल कर खड़ा हो गया, "क्या कह रही हो सारिका...?"


"सही कह रही हु. ज़ल्दी पहुँचो अस्पताल. बाबूजी पहुँच भी गए होंगे अभी तक. कल सुबह ही निकले थे घर से."


"ओह! तुमने पहले नहीं बताया."


"नहीं बताया." सारिका गुस्से बोली, "डॉक्टर साहब फुर्सत हो तो ज़रा अपना मेल और मेसेज चेक कर ले. कल से कॉन्टेक्ट करने के लिए परेशान हु और इनका शिगूफा कि मैंने बताया नहीं...."


"अच्छा, अच्छा, फ़ोन रखो, मैं तुमसे बाद में झगडा करता हूँ."

आयुष ने फ़ोन काटा और लपक कर बाथरूम की ओर बढ़ा. पहले जहाँ उसपर देवदास की सुस्ती और उदासी छाई थी, सारिका की आवाज़ सुनते ही युसेन बोल्ट की फुर्ती और ताजगी आ गयी. 
पांच मिनट में तैयार होकर वह अपनी गाडी की ओर बढ़ा. तब तक पूरे घर को मामले की सूचना देने का शुभ काम अक्षिता कर चुकी थी.

आयुष जैसे ही गाडी में बैठा, उसे बेहद सुकून का एहसास हुआ. उसने सारिका को फ़ोन किया.


"हेल्लो, पहुँच गए आयुष. इतनी ज़ल्दी?


"मैंने कहा था न की अगर सच्चे दिल से चाहे तो हम ज़रूर मिलेंगे.. वैसे सारिका, तुमने मेरे एक सवाल का जवाब नहीं दिया?"


"कौन सी बात का?"


"क्या तुम मेरी लाइफ-पार्टनर बनोगी?"


"मैं बाबूजी से पूछकर बताती हु." सारिका ने कहा और इसके साथ ही खिलखिलाकर हस पड़ी.


आयुष की हंसी भी उसके चेहरे पर खेलने लगी. फ़ोन काट कर उसने गाडी स्टार्ट की और अचानक उसकी कल्पना में खुद की और सारिका की एक तस्वीर उभर आई......







 

  - © स्नेहा राहुल चौधरी

22 comments:

  1. waah.. bahut hi acchi kahaani hain... shuru se ant tak bandhe rakhti hain.. :)

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  2. Dear Sneha,
    I can tell you are a GREAT story teller (smile). This was very creative and touching. You are also very talented. Keep writing my friend.

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    1. Thank you very much Andy Sir and again thanks for your compliment. If you wish, you can read my novel from here http://www.amazon.com/For-What-You-Are-ebook/dp/B005GTKGLI/ref=sr_1_1?ie=UTF8&qid=1339313872&sr=8-1&keywords=for+what+you+are+by+sneha+gupta

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  3. nice story............
    well expressed................

    anu

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  4. मस्त कहानी .. खुला व्यवहार और आत्मविश्वास प्रेम की बुनियाद है ...
    अच्छी कहानी है ...

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    1. Bahut bahut dhanyawaad, Digambar Sir. vastutah, aapasi saamanjasya, aur ek dusre par vishwaas hi prem ke rishte ko mazboot banata hai.

      Mere blog tak aane ke liye, kahaani padhne ke liye, aur aapke protsaahan ke liye punah dhanyawaad...!!

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  5. बहुत ही बेहतरीन और प्रशंसनीय प्रस्तुति....


    इंडिया दर्पण
    पर भी पधारेँ।

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    1. bahut bahut dhanyawaad, aapka page zarur dekhungi

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  6. आत्मविश्वास के साथ सरल और खुला व्यवहार एक अलग ही दुनिया का सृजन करता है, बहुत ही सुंदर कहानी, शुभकामनाएं.

    रामराम.

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    1. bahut bahut dhanyawaad taauji ki aap mere blog par aaye aur kahaani sirf padhi ise pasand karne ke baad comment bhi diya :)

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मेरा ब्लॉग पढ़ने और टिप्पणी देने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद.