Saturday, March 8, 2014

काश...

सुमि की हिम्मत नहीं हो पा रही थी कि वह अमर से कुछ कह सके... रुलाई गले में बांधे, आंसुओं को रोके वह खड़ी थी कि अमर कुछ कहे और बात शुरू हो..
लेकिन अमर ने कुछ नहीं कहा. वह चुपचाप उठा और किचन में चला गया. सुमि भी उसके पीछे पीछे गयी. अमर ने चाय की केतली गैस पर डाली थी. भुनभुनाता हुआ लाइटर ढूंढ रहा था.
“एक चीज़ सही से नहीं मिलती...” दांत पीसते हुए कहा उसने.
“मैं बना दूं चाय?” सुमि ने हिम्मत करके पूछा.
अमर ने कोई जवाब नहीं दिया. मानो उसने कुछ सुना ही नहीं. उसने सुमि की तरफ देखा भी नहीं.
माचिस से गैस जलाई और चाय बनाकर सीधा कमरे में आ गया. पहला घूँट जैसे ही गले में गया कि खुद को कोसने लगा – “पान वाले की दूकान पर चाय पीने में इज्जत घटती है...”
कप सहित उठा और चाय ले जा कर सिंक में बहा दी.
सुमि वही पर खड़ी चुपचाप सबकुछ देखती रही. अमर की झल्लाहट उससे बर्दाश्त नहीं हो रही थी. उसे समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर उसने ऐसा कौन सा गुनाह कर दिया कि अमर ऐसे बर्ताव करने लगा मानो उसका कोई वजूद ही नहीं है. सब्र का बाँध टूट गया और सुमि के गाल भींग गए...
वह खुद में ही खोयी थी कि देखा अमर जल्दी जल्दी तैयार होकर दफ्तर निकलने की तैयारी में था. झल्लाता हुआ कभी इधर कभी उधर जाता लेकिन सुमि से कुछ न कहता...
हिम्मत करके सुमि ने ही फिर पूछा – “कहो न? क्या ढूंढ रहे हो? मुझे मालुम है तुम्हारी चीज़े कहाँ रखी है.”
अमर एक पल को रुका और उसने चारो तरफ देखा लेकिन फिर से सुमि को नज़रंदाज़ कर गया. जैसे वो सामने थी ही नहीं... जैसे उसकी बातों का कोई मतलब ही नहीं था अमर के लिए. सुमि की आँखों से एक बार फिर अश्रुधारा बहने लगी...
तभी अचानक अमर का फ़ोन बजा. अमर ने उछलकर अपना मोबाइल दराज के पीछे से हाथ घुसा कर निकाला. अच्छा तो मोबाइल ढूंढ रहा था अमर. हाँ, अक्सर दराज से नीचे गिर जाता था अमर का मोबाइल. सुमि अक्सर कहती थी दराज के भीतर या फिर मेज पर मोबाइल रखने के लिए लेकिन अमर सुने तब तो..
मोबाइल को स्पीकर पर डालकर अमर जूते पहनने लगा. फ़ोन अमर के दोस्त का था.
“निकल गए अमर?” दोस्त ने पूछा.
“बस निकल रहा हूँ.” अमर ने परेशानी से जवाब दिया.
“क्या हुआ?” दोस्त ने पूछा.
“कुछ नहीं. कुछ हो तो खाने को ले लेना. आजा खाना नहीं खाया. चाय भी बहुत बुरी बनी थी.” अमर रोआंसा होकर कहा.

क्या??? अमर ने खाना नहीं खाया था? सुमि अवाक रह गयी थी. ये वो किस दुनिया में खो गयी थी कि उसने कुछ बनाया नहीं अमर के लिए! ऐसा कभी हुआ है कि अमर बिना खाये दफ्तर चला जाए..?

“अमर, दो मिनट रुक जाओ. मैं अभी कुछ बना देती हूँ.” सुमि ने घबरा कर कहा.

अमर के हाथ रुक गए. उसने फिर ऊपर देखा लेकिन सुमि से उसकी नज़रे नहीं टकराई. उधर उसका दोस्त फ़ोन पर हेल्लो हेल्लो किये जा रहा था.
“हेल्लो अमर? अमर? हेल्लो? क्या हुआ?”
“हाँ,” अमर का ध्यान फ़ोन पर गया. उसने स्पीकर बंद करके मोबाइल उठाया.
“क्या हुआ अमर?” दोस्त ने पूछा, “अचानक से खामोश हो गए थे?”



“पता नहीं...” अमर ने आह भरकर कहा, “इतना वक़्त हो गया सुमि को गुज़रे हुए लेकिन अब भी हर पल उसे महसूस करता हूँ...” अमर अपना बैग उठाकर दरवाजे की तरफ बढ़ चुका था.

“गुज़रे हुए....”

सुमि को लगा जैसे भूकंप आया हो और अचानक उसके सर पे पत्थर गिर पड़े हो. सारा घर घूमने लगा. आँखों के आगे अँधेरा छाने लगा. 

तभी उसकी नज़र सामने दीवार पर टंगी अपनी तस्वीर पर गयी. 

काश...! वह अपनी तस्वीर पर टंगी उस माला को हटा पाती...


निवेदन महिलाओं से – आप अपने परिवार की धुरी है. स्वास्थ्य सम्बन्धी छोटी बड़ी समस्याओं को नज़रंदाज़ न करे. अपना ध्यान रखे. अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस की हार्दिक शुभकामनायें...!

© स्नेहा गुप्ता 
08/03/2014 08:55pm

Tuesday, November 19, 2013

आदत [ लघुकथा]

"हाँ हाँ वही पर. फाइल नीचे वाली तह में है.. अच्छा ठीक है.. बाय..."
सानिध्या ने फ़ोन बंद किया तो उसका ध्यान अनुपमा के मुस्कुराते हुए चेहरे पर टिका. लगभग ठंडी हो चुकी कॉफ़ी का कप उठाकर उसने अनजान बनते हुए पूछा - "इस मुस्कराहट की वज़ह जान सकती हूँ?"

अनुपमा की मुस्कराहट थोड़ी बड़ी हुई और उसने कहा - "पिछले आधे घंटे में तुम्हारा फ़ोन चार बार बजा है. कभी फाइल, कभी घड़ी, कभी टैब ...."

"तो?" सानिध्या ने भी उसी अंदाज़ में जवाबी सवाल दागा.

"कुछ नहीं." अनुपमा बोली, "बस पुरानी बातें याद आ गयी थी."

"सोम की शर्त?" 
सानिध्या का तीर सही निशाने पर लगा था जैसे. अनुपमा यह सवाल सुनते ही घबरा सी गयी.

"तुम्हे पता है इस बारे में?" उसने आश्चर्य से सानिध्या से पूछा.

"सब कुछ पता है..." अपनी उसी रहस्यमयी मुस्कान के साथ सानिध्या ने अपनी ठंडी कॉफ़ी का कप एक ही घूँट में खाली कर दिया.

"कुछ भी कहो... मगर यकीन नहीं होता कि यह पंद्रह-सोलह साल पहले की बात है...." अनुपमा ने सँभलते हुए कहा, "सोम ने बड़े यकीन से शर्त लगाई थी कि तुम दोनों के प्यार का खुमार कुछ महीनों में ही उतर जाएगा. मगर जब तुमने पिछली बार भी गेट-टुगेदर कैंसिल किया तो....."

"पिछली बार कई महीनों के बाद मोहित की छुट्टियाँ सैंक्शन हुई थी. हमने पहले से ही इसकी प्लानिंग कर रखी थी. गेट-टुगेदर का प्लान तो बाद में बना था..." अनुपमा की बात बीच में ही काट दी सानिध्या ने.

"देन इन दैट केस, थैंक्स फॉर कमिंग टुडे, मैडम." सानिध्या की खिंचाई की अनुपमा ने और दोनों सहेलियां हंसने लगी.

कुछ देर की हंसी के बाद जब अचानक खामोशी हुई तो अनुपमा ने कहा, "सच बताना सानिध्या, तुम्हें नहीं लगता कि तुमने बहुत ज्यादा कोम्प्रोमाईज़ किया है? मोहित का इस तरह हर छोटी छोटी चीज़ के लिए तुम पर डिपेंड होना? तुम्हे खीझ नहीं होती...?"

सानिध्या मुस्कुराई- "जानती हो अनुपमा, किसी की मोहब्बत बनना वाकई बेहद खूबसूरत एहसास होता है. लेकिन उससे भी ज्यादा खूबसूरत होता है किसी की आदत बन जाना...एक ऐसी आदत जिसका तुम्हे पता भी नहीं चल पता लेकिन तुम जिससे अलग होने की कल्पना भी नहीं कर सकते.... ये मेरी ज़िन्दगी का वृत्तचित्र है अनु, और इसे मैंने खुद बनाया है अपने खयालो से... तुम लोग ही तो कहते थे न कि मेरे ख़याल बेहद खूबसूरत होते है..."

तभी सानिध्या का फ़ोन फिर से बजा और तब उसके चेहरे पर अनुपमा ने जो मुस्कान देखी वो सचमुच दुनिया में सबसे ज्यादा खूबसूरत थी...

http://www.scribd.com/doc/181756127/Branwyn-Sep-Oct-2013 

- स्नेहा गुप्ता 
19/11/2013 08:30PM

Friday, June 28, 2013

अनाहिता



“तुम यहाँ बैठी हो? और घर पर सब परेशान हो रहे है.”

“घर पर मन नहीं लग रहा था. इसलिए यहाँ चली आई.”

“बताकर आती. सब परेशान हो रहे है घर पर. उन्हें लगा कि तुम मेरे साथ हो. मैं भी परेशान हो गया था. फिर याद आया कि दुनिया में एक ही जगह है जहां तुम मिलोगी.”

वह उसकी बगल में बैठ गया. वह कुछ बोली नहीं बस मुस्कुरा दी.

“समझ में नहीं आता कि इस जगह में ऐसा क्या ख़ास है. क्यों तुम्हे ये समंदर इतना पसंद है?”

उसकी मुस्कान गहरी हो गयी.

“यही तो तुम्हारी गलती है. तुमने कभी समंदर को पढने की कोशिश नहीं की. कभी इसकी लहरों को समझने कि कोशिश नहीं की. ऊपर से इसकी लहरें कितनी चंचल दिखती है. लेकिन जैसे जैसे नीचे जाओगे, ये शांत होती जाती है. और समंदर की तली में तो लहरें बिलकुल खामोश हो जाती है. बिलकुल खामोश. कोई सोच भी नहीं सकता कि ऊपर से चंचल ये लहरें अन्दर में किस खामोशी को दबाये हुयी है. समंदर से गहरे कई राज़ होते है जिन्हें जानने की ज़हमत कोई नहीं उठा पता. गहरी चीजों में कितनी सच्चाई होती है. समंदर भी उतना ही सच्चा होता है. कभी तुमने या हमने ये जानने की कोशिश नहीं की कि चाँद को छूने की नाकामयाब कोशिशो के पीछे क्या पता, इन लहरों की किसी जन्म की अधूरी ख्वाहिशें रही हो. हम तो बस उसे वैज्ञानिक जामा पहना 
कर अपनी पीठ थपथपा लेते है.”

वह कुछ बोला नहीं. शांत बैठा रहा.

“क्या बात है? खामोश क्यों हो?”

“कुछ नहीं. बस ऐसे ही.”

वह खिलखिलाकर हंसी.

“चलो भी. अब मुझसे झूठ न बोला करो. तुम्हारी आँखें चीख पुकार कर कह रही है कि तुम परेशान हो. क्या बात है, बताओ मुझे.”

“मैं.... मैं खो जाना चाहता हूँ.... सच... मैं खो जाना चाहता हूँ कही पर. कुछ दिनों के लिए. बस सोचता हूँ कि कुछ दिनों के लिए खो जाऊ और फिर मन शांत हो जाए तो लौट आऊ.”

इस बार तो उसकी हंसी बड़ी ही लम्बी थी. वह थोड़ी देर को सहम सा गया उसकी हंसी से.

“अरे बुद्धू, जब लौटने का रास्ता मालुम हो तो उसे खोना थोड़ी न कहते है. खो जाने का मतलब कि फिर लौटने की कोई सूरत न रहे. खो जाना मतलब बस खो जाना....”

“शायद...”

वह फिर चुप हो गया. थोड़ी देर को शाम के धुंधलकों में चुप्पी छा गयी. बस समंदर की लहरें किसी जन्म की अधूरी ख्वाहिशों को पूरी करने की कोशिश में लगी रही. बस लहरों का ही शोर रह गया था वहाँ. लोग अपने अपने घरो को लौटने लगे थे. कुछ देर में ही सन्नाटा सा हो गया. फिर...

“तुम मेरे बारे में सोच रहे हो न?”

“हम्म.... हाँ.”

“क्या?”

“तुम बुरा मानोगी.”

फिर वही हंसी....

“बुद्धू, तुम्हारी किसी बात का बुरा नहीं लगता मुझे.”

“पता नहीं.... मगर मैं सोच रहा था कि तुम मेरा कितना ख्याल 
रखती हो...”

इस बार हंसी की जगह एक मुस्कान ने ले ली.

“तो?”

“तो... तो... मुझे बुरा लगता है कि मैं तुम्हारा उतना ख़याल नहीं रख पता जितना मुझे रखना चाहिए. और जब मैं सोचता हूँ कि तुम मेरा जितना ख़याल रखती हो मैं तुम्हारा उतना ख्याल नहीं रख पाता तो मुझे बहुत ग्लानि होती है. मुझे लगता है कि क्यूंकि तुम मेरे लिए इतना सोचती हो इसलिए मुझे भी तुम्हारे लिए इतना सोचना चाहिए.”

हंसी गायब हो गयी और मुस्कान लापता.

“तुम्हे पहले बताना चाहिए था कि तुम्हे ग्लानि होती है.”

“तुम बुरा मान गयी....”

“हरगिज़ नहीं... तुम्हारी ख़ुशी बहुत कीमती है. जानते हो तुम खुश क्यों नहीं हो? क्यूंकि तुम वो नहीं कर रहे जो तुम करना चाहते हो. भूल जाओ सब कुछ. उठाओ अपनी गिटार और बना डालो कुछ नयी धुनें. हो सकता है स्ट्रीट शो करने पड़े. म्यूजिशियन के चक्कर काटने पड़े. मगर यूट्यूब मदद करेगा. फैन फोल्लोइंग बढ़ेगी तो लोग मौके भी देंगे.”

कोई जवाब नहीं. सिर्फ शान्ति.

“तुम जानते हो मैं इतनी खुश क्यों रहती हूँ? क्यूंकि मैं सिर्फ अपने ख्वाब के बारे में सोचती हूँ. तुम भी खुश तभी रह पाओगे जब अपने ख्वाब के बारे में सोचोगे. और जब खुद खुश रहोगे तभी दुसरो को भी ख़ुशी दे पाओगे.”

समंदर में एक बड़ी लहर उठी और छपाक से समंदर में तली में चली गयी.

“सच! मैं... मैं यही करूँगा.”

“हाँ, अभी से तैयारी शुरू करो. अभी जाओ. और जुट जाओ. और सुनो अपना ध्यान न भटकाना. जब तक सफल न हो जाओ. मुझसे न मिलना. मेरे बारे में पूछना भी मत. नहीं तो ध्यान भटकेगा. अब जाओ. और पीछे मुड़कर मत देखना.”

वह उठा लेकिन उठने से पहले उसने उसे गले लगा लिया. फिर ख़ुशी से बिना रुके, और बिना किसी को बताये वह उसी रात वह शहर से चला गया.

तीन साल.

उसने खूब मेहनत की. जान से प्राण से. और कामयाबी हासिल की. आज देश नहीं, दुनिया में उसका नाम था. वह बहुत खुश था.

वह अपने शहर लौटा और सीधा उसके घर गया. वह अपने घर में नहीं थी. उसने मगर किसी से कुछ नहीं पूछा और न ही किसी ने उसे कुछ बताया. वह जानता था कि वह कहाँ मिलेगी.

लेकिन समंदर किनारे बड़ा सन्नाटा था. वहाँ कोई नहीं था. वह जगह निर्जन हो चुकी थी. जैसे कई सालो से वहाँ कोई नहीं आया हो. वह उदास हो गया. क्या हुआ था आखिर?

तभी अचानक उसकी नज़र कुछ पत्थरो पर पड़ी. उन पत्थरो के पास एक छोटा सा खोह था. उसे याद था अक्सर वह उसे सताने के लिए उस खोह में उसकी चीज़े छुपा दिया करती थी और फिरौती में आइस-क्रीम या चौकलेट मिलने पर दिया करती थी. अनायास ही उसके कदम उस तरफ बढ़ चले. उस खोह में कुछ चमकती हुई चीज़ थी. उसने हाथ लगाया. प्लास्टिक में कागज़ का टुकड़ा रखा था. उसने वह कागज़ निकाल कर देखा –

“प्रिय अनिकेत,
मुझसे एक गलती हो गयी. मैं खो गयी. मुझे कभी पता ही नहीं चला. मैंने खुद को खो दिया. हमेशा तुम्हारे बारे में ही सोचा. तुम्हारी ही ख्वाहिशो को जिया. न कभी खुद पर ध्यान दिया. न कभी खुद से प्यार किया. जैसे मैं तो कभी थी ही नहीं. बस तुम ही थे. और जब पता चला कि तुम्हारी ग्लानि की वज़ह मैं हूँ तो कुछ बचा ही नहीं. तब ध्यान आया कि अरे मैं तो कब की खो चुकी हूँ. अभी तुम्हे जाते हुए देख रही हूँ. तुम्हारे जाने के बाद मैं नज़र ही नहीं आ रही. यही तो खो जाना होता है.

अनिकेत, तुम मुझे कभी माफ़ मत करना.

तुम्हारी,
अनाहिता”


- © स्नेहा गुप्ता

Thursday, June 27, 2013

एक ग़ज़ल

सोचती हूँ आज फिर एक ग़ज़ल की शुरुआत करूँ 
चंद अपने अल्फाजों से थोड़ी सी बात करूँ

न मालुम किस हाल में, कैसे हैं, कहाँ हैं 
अपनी हसरतों से आज फिर एक मुलाक़ात करूँ

रूखी सी ज़िन्दगी में ख्वाब अधूरे जो छूट गए
उन्हें संवारू, निखारू और ख़्वाबों से खयालात करूँ 

कि होंठ हो खामोश जब कहना हो बहुत कुछ 
तो फिर अपनी कलम से ही ज़ाहिर सब जज़्बात करूँ

- © स्नेहा गुप्ता
२७/०६/२०१३ 

Saturday, May 18, 2013

आक्रोश


सल्फास खाकर जिंदा हैं
अजी, हम बड़े शर्मिन्दा हैं

जामों के छलकते बाँध में
डीयोडेरेंट की सड़ांध में
कूल डूड हॉट बेब हैं
मॉडर्निटी की छलकती पाजेब हैं
जज्बातों का बाज़ार है
इमोशनल अत्याचार है
दुःख का सीज़न गर्म है
दिल भी बड़ा ही नर्म हैं
महंगाई की चौहरी मार है
ईमानदारी भी बेरोजगार है
किरकेट का इसमें मेल नहीं
आई पी एल कोई खेल नहीं
अब मिलता कहाँ सुकून हैं
विश्वास का हो गया खून हैं
सच्चाई की चप्पल घिस रही है
चूल्हे में ममता पिस रही है
ऊपर शानदार मकान हैं
नीचे कोयले की खान हैं
रेलगाड़ी भी चल रही हैं
खूब पैसे उगल रही है
देखिये, कितना सज्जन ‘फेस’ है
वैसे सी.बी.आई. में दर्ज केस है
मगर पिंजरे में बंद परिंदा हैं

तेरे कातिल अभी तक जिंदा हैं
दामिनी, हम बड़े शर्मिन्दा हैं

-  -  स्नेहा गुप्ता  
  18/05/2013 8:25pm

Friday, May 3, 2013

दिवास्वप्न की पाती.....


सुनो,
तुम डराया न करो मुझे इस तरह..
मुझे डर लगता है
कभी तुम्हारी आँखों से
कभी तुम्हारी बातो से

फिर भी तुम्हे जानना चाहती हूँ
तुम्हे समझना चाहती हूँ
मुझे जानने दो
तुम्हे
समझने दो
तुम्हे सोचना मुझे अच्छा लगता है..


मैंने तुम्हे बताया नहीं कभी
तुम एक रहस्यमयी किताब से हो
तुम्हे पढ़ लेना चाहती हूँ
लेकिन अचानक नहीं
बल्कि हर पन्ना हर रोज़
थोड़ा थोड़ा करके
तुम्हे पढना मुझे अच्छा लगता है

मैंने तुम्हे बताया नहीं कभी
तुम एक बहुघातीय समीकरण से हो
कभी तुम्हे सुलझा लेना चाहती हूँ
कभी यूं ही उलझ कर रह जाना चाहती हूँ
सुलझ कर उलझ जाना मुझे अच्छा लगता है

मैंने तुम्हे बताया नहीं कभी
कि तुम धुंध कि तरह छाये हो मेरी ज़िन्दगी में
और
धुंध में भटकना मुझे अच्छा लगता है

मैंने तुम्हे बताया नहीं कभी
कि मैं जानती हूँ
कि तुम कभी सुनोगे भी नहीं
कभी पलटकर देखोगे भी नहीं
फिर भी तुम्हे पुकारना मुझे अच्छा लगता है

मैंने तुम्हे बताया नहीं कभी
कि मुझे मालुम है
कि तुम्हारी चाहत वो हसीं दुनिया है
जो तुम्हारे आगे है
और तुम्हारी ख़ुशी में ही खुश होना मुझे अच्छा लगता है

मैंने तुम्हे बताया नहीं कभी
कि ऐसे सैकड़ो ख़त मैंने लिख डाले है तुम्हे
जो तुम कभी पढोगे भी नहीं
और मेरे अलावा कोई तुम्हे लिखेगा भी नहीं
फिर भी ...........
.............. अच्छा लगता है......



 - स्नेहा गुप्ता
 03/05/2013 09:30PM

Friday, April 26, 2013

बेवफा ज़िन्दगी .....


अब भी तो कुछ रहम कर ऐ बेवफा ज़िन्दगी
दे रही किस बात की तू सज़ा ज़िन्दगी

सांस लेना भी क्या अब गुनाह हो चला है
हो रही क्या मुझसे यही खता ज़िन्दगी..

ख़ुशी में खुश होने का भी हक दिया नहीं तूने
क्यों करती रही हरदम ज़फ़ा ज़िन्दगी

निचुड़ी हुई आँखे और होंठ बेबस मुस्कुराने को
क्यों ऐसी रही तेरी बेदर्द अदा ज़िन्दगी

बेरहम, तू उसे आने भी तो नहीं देती
कि मौत आये और तेरा हर सितम हो फना ज़िन्दगी 



-    स्नेहा गुप्ता
26/04/2013 11:00pm

Sunday, April 21, 2013

मैं और मेरी ज़िन्दगी.....


बिगड़ती है, संवरती है, ठुकराती है, अपनाती है
इस तरह ज़िन्दगी मुझे जीना सिखाती है

देकर कुछ लम्हे हंसी के, ख़ुशी के
ज़ख्म कोई नया ये फिर दे जाती है

खुद ही हंसती है मेरी बेबसी पर
और खुद ही मेरे ज़ख्म सहलाती है

कभी कभी एक अजनबी सी दुनिया दिखाती 
तो कभी बचपन की सहेली सी नज़र आती है

चमकेंगे निकलकर गर्दिश से ये तारे
मैं इसे समझाती हूँ, ये मुझे समझाती है

चल ढूंढे अपनी ज़मीन अपना आसमान
ख्वाबों के शहर में मुझे खींचकर ले जाती है

बस कुछ पल के साथ को ही दुनिया में मिलते है सभी
अकेली मैं रह जाती हूँ, अकेली यह रह जाती है ...

-   -  स्नेहा गुप्ता
21/04/2013 5:10PM 

Sunday, March 31, 2013

कलाकार .....

तुम तस्वीरें बनाना चाहते हो न…?


कैसे बनाओगे?

बना पाओगे
मेरे उन आंसुओं की तस्वीरें  
जो कभी मेरी आँखों से छलकी ही नही …. ?

खींच पाओगे 
एक रेखाचित्र 
मेरे उस दर्द का 
जो तुमने कभी महसूस ही नहीं किया …?

कौन से रंगों में ढालोगे 
मेरे जले हुए सपनो की राख को…. ?

कैसे उकेरोगे 
उन रंगों को 
जो मेरी पलकों के नीचे 
सपनो की ख़ाक जमने से बनी है ....?

तुमने कहा था कि तुम कलाकार हो 

तुम्हे खुद पर भरोसा तो है न ...?

क्यूंकि तुम हमेशा मेरी मुस्कुराहटो में ही क़ैद होकर रह गये…. 

- स्नेहा गुप्ता 
01/04/2013 12:17 AM

Sunday, March 17, 2013

हमेशा ..........

हर बात दिल में ही घुलती रही हमेशा 
रेत हाथ से फिसलती रही हमेशा 

ये आँखें जब तकदीर का आईना हो चली 
ख्वाहिशें अश्क़ बनकर पिघलती रही हमेशा 

मंजिलें सारी कोहरों में खो गयी 
राहें बेवज़ह ही चलती रही हमेशा 

बहारो को ही चमन से नफरत हो गयी 
बेरहम हो गुलो को कुचलती रही हमेशा 

जिन चिरागों का फ़र्ज़ ज़िन्दगी को रोशन करना था 
ज़िन्दगी उन्ही चिरागों से जलती रही हमेशा 

- स्नेहा गुप्ता 
14 February 2013
11:45PM