Saturday, January 5, 2013

ज़िन्दगी में इस क़दर कोहरा घना है .....

ज़िन्दगी में इस क़दर कोहरा घना  है
क्या पता कौन दोस्त कौन दुश्मन बना है

क्या कहूँ किसने मेरे दिल पर वार किया
यहाँ तो हर हाथ मेरे ही खून से सना है

मेरी चुप्पी को हरगिज़ न समझिये मेरी नाराज़गी
दरअसल यहाँ मेरा मुस्कुराना भी मना है

मालूम नहीं इनमे कहाँ खो सी गयी है वो
मुझे इन लम्हों में से ज़िन्दगी को छाँटना है

ये मेरी ग़ज़ल पढ़कर जाने क्यों खामोश है वो
मैं समझूँ तारीफ़ मगर ये वक़्त की आलोचना है

- स्नेहा गुप्ता 





4 comments:

  1. mat kaho aakash me kohra ghana hai....
    yeh kisi ki vyaktigat aalochna hai...

    ~Dushyant Kumar
    nice Parody

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    1. Sorry sir! It is not parody. Just a coincidence

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मेरा ब्लॉग पढ़ने और टिप्पणी देने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद.