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Saturday, December 3, 2016

चाँद तन्हा है... - मीना कुमारी

दोस्तों, आज अपनी पसंदीदा ग़ज़ल आपसे सांझा कर रही हूँ...

चाँद तन्हा है आसमाँ तन्हा,
दिल मिला है कहाँ-कहाँ तन्हा

बुझ गई आस, छुप गया तारा,
थरथराता रहा धुआँ तन्हा

ज़िन्दगी क्या इसी को कहते हैं,
जिस्म तन्हा है और जाँ तन्हा

हमसफ़र कोई गर मिले भी कभी,
दोनों चलते रहें कहाँ तन्हा

जलती-बुझती-सी रोशनी के परे,
सिमटा-सिमटा-सा एक मकाँ तन्हा


[चित्र: गूगल से साभार]



- मीना कुमारी 

Wednesday, July 22, 2015

चाँद और ख्वाहिशें..

हवाओं में तैरो, आसमां से उतर आओ,
ऐ चाँद, कभी कभी ज़मीन पर भी नज़र आओ...


पलों में रूमानियत थोड़ी और बढ़ी है,
घड़ी दो घड़ी तो और ठहर जाओ...


सुनो, क्या गाती है एहसासों की धड़कन,
महसूस करोगे, थोड़े करीब अगर आओ...


सौदा मेरी नींद का, तुमसे, ख्वाहिशों के लिए,
चलो, अब मेरी हथेली में नज़र आओ...

- © Sneha Rahul Choudhary 


[फोटो साभार - गूगल]

Saturday, February 21, 2015

ज़रा ज़रा...

बदलते रहेंगे यूँ ही हालात ज़रा ज़रा
होती रहे गर यूँ बात ज़रा ज़रा

ख्वाबों के चिराग रोशन रहेंगे हमेशा
चाहे ढलती रहे ज़िन्दगी की रात ज़रा ज़रा

तन्हाइयों का कोई शिकवा नहीं करेंगे
होती रहे अगर यूँ ही मुलाक़ात ज़रा ज़रा

इंतज़ार का मज़ा कोई हमसे पूछ ले
कि मिलती है उनसे कोई सौगात ज़रा ज़रा...
-    
- - स्नेहा राहुल चौधरी 

Monday, January 12, 2015

एहसास ...

इंतज़ार पलकों पर सजाए हुए हैं 
एहसासों के फूल खिलाए हुए हैं 

नयनों के दीप जलाए हुए हैं
इन राहों में दिल को बिछाए हुए हैं 

आपके जाने से ख्वाब कुम्हलाएँ हुए हैं
आपके लौटने की आस लगाए हुए हैं 

जज़्बात जो होठों पर आए हुए हैं 
चाहतों में सुर्खी मिलाए हुए हैं

फासलें चाहे जितने दरम्याँ आए हुए हैं
हमारे ज़ेहन में बस आप छाए हुए हैं

आपके लिए शायद हम पराए हुए हैं
हम इस दुनिया में आपके लिए ही आये हुए हैं 

- © Sneha
08:40 pm, 12/01/2015

Monday, November 3, 2014

चाहत...

मुकम्मल की चाहत किसे नहीं होती..
ज़िन्दगी से मुहब्बत किसे नहीं होती..

बेरहम हालातों को गवारा नहीं होता...
वरना मुस्कुराने की आदत किसे नहीं होती...


डर होता है ख़्वाबों के टूट जाने का...
ख्वाब सजाने की हसरत किसे नहीं होती...

ढूंढ लाने वाला अगर कोई मिल जाए तो..
खो जाने की चाहत किसे नहीं होती...

Thursday, June 27, 2013

एक ग़ज़ल

सोचती हूँ आज फिर एक ग़ज़ल की शुरुआत करूँ 
चंद अपने अल्फाजों से थोड़ी सी बात करूँ

न मालुम किस हाल में, कैसे हैं, कहाँ हैं 
अपनी हसरतों से आज फिर एक मुलाक़ात करूँ

रूखी सी ज़िन्दगी में ख्वाब अधूरे जो छूट गए
उन्हें संवारू, निखारू और ख़्वाबों से खयालात करूँ 

कि होंठ हो खामोश जब कहना हो बहुत कुछ 
तो फिर अपनी कलम से ही ज़ाहिर सब जज़्बात करूँ

- © स्नेहा गुप्ता
२७/०६/२०१३ 

Friday, April 26, 2013

बेवफा ज़िन्दगी .....


अब भी तो कुछ रहम कर ऐ बेवफा ज़िन्दगी
दे रही किस बात की तू सज़ा ज़िन्दगी

सांस लेना भी क्या अब गुनाह हो चला है
हो रही क्या मुझसे यही खता ज़िन्दगी..

ख़ुशी में खुश होने का भी हक दिया नहीं तूने
क्यों करती रही हरदम ज़फ़ा ज़िन्दगी

निचुड़ी हुई आँखे और होंठ बेबस मुस्कुराने को
क्यों ऐसी रही तेरी बेदर्द अदा ज़िन्दगी

बेरहम, तू उसे आने भी तो नहीं देती
कि मौत आये और तेरा हर सितम हो फना ज़िन्दगी 



-    स्नेहा गुप्ता
26/04/2013 11:00pm

Sunday, April 21, 2013

मैं और मेरी ज़िन्दगी.....


बिगड़ती है, संवरती है, ठुकराती है, अपनाती है
इस तरह ज़िन्दगी मुझे जीना सिखाती है

देकर कुछ लम्हे हंसी के, ख़ुशी के
ज़ख्म कोई नया ये फिर दे जाती है

खुद ही हंसती है मेरी बेबसी पर
और खुद ही मेरे ज़ख्म सहलाती है

कभी कभी एक अजनबी सी दुनिया दिखाती 
तो कभी बचपन की सहेली सी नज़र आती है

चमकेंगे निकलकर गर्दिश से ये तारे
मैं इसे समझाती हूँ, ये मुझे समझाती है

चल ढूंढे अपनी ज़मीन अपना आसमान
ख्वाबों के शहर में मुझे खींचकर ले जाती है

बस कुछ पल के साथ को ही दुनिया में मिलते है सभी
अकेली मैं रह जाती हूँ, अकेली यह रह जाती है ...

-   -  स्नेहा गुप्ता
21/04/2013 5:10PM 

Sunday, March 17, 2013

हमेशा ..........

हर बात दिल में ही घुलती रही हमेशा 
रेत हाथ से फिसलती रही हमेशा 

ये आँखें जब तकदीर का आईना हो चली 
ख्वाहिशें अश्क़ बनकर पिघलती रही हमेशा 

मंजिलें सारी कोहरों में खो गयी 
राहें बेवज़ह ही चलती रही हमेशा 

बहारो को ही चमन से नफरत हो गयी 
बेरहम हो गुलो को कुचलती रही हमेशा 

जिन चिरागों का फ़र्ज़ ज़िन्दगी को रोशन करना था 
ज़िन्दगी उन्ही चिरागों से जलती रही हमेशा 

- स्नेहा गुप्ता 
14 February 2013
11:45PM


Saturday, February 2, 2013

छोड़िये इस बात की चर्चा बेमानी है ......

छोड़िये  इस बात की चर्चा बेमानी है 
किसका खून खून है, किसका खून पानी है 

जज्बातों को बेचकर उसने यह दौलत पाई है 
अब इस जहाँ में कौन उसका सानी है 

गरीबो के बच्चे कभी खूबसूरत नहीं होते 
इस दुनिया में बस दौलत का ही चेहरा नूरानी है 

हमारे  बस की बाते नहीं है ये सब 
इस दौलत से प्यार के किस्से और कहानी है 

उसकी नौकरी सिफारिशों के बीच दम तोड़ गयी 
अब उसे चोरी करने में क्यों शर्म आनी  है 

क्या फर्क उसके हाथो में बन्दूक हो या तलवार 
कौन जाने उसकी किस्मत में  भोजन कितना पानी है 

महसूस होते है जब किसी बेक़सूर के आंसू 
दिल सुलग उठता है बस इतनी परेशानी है 

छोड़िये इस बात की चर्चा बेमानी है 
किसका खून खून है किसका खून पानी है 

- स्नेहा गुप्ता 

Monday, January 21, 2013

ज़हरीले अल्फाज ....

क़त्ल कर दो उसका जिसका तुम्हे अंदाज़ पसंद नहीं 
जला डालो अंजाम को जब आगाज़ पसंद नहीं 

नोंच डालो उन परिंदों के पर 
खुली हवा में जिनकी परवाज़ पसंद नहीं 

हलक से खींच लो उस ज़ुबान को 
जिस हलक से निकली आवाज़ पसंद नहीं 

उसे ठोकर मारो ऐसी कि फिर सर कभी न उठ सके 
ग़र खुद्दारी से जीने का उसका मिज़ाज पसंद नहीं 

मत पूछो मेरे इन ज़हरीले अल्फाजों की वज़ह 
इस ज़िन्दगी में मुझे कोई हमराज़ पसंद नहीं 

- स्नेहा गुप्ता 
21/01/2013
00:45 A.M.

Saturday, January 5, 2013

ज़िन्दगी में इस क़दर कोहरा घना है .....

ज़िन्दगी में इस क़दर कोहरा घना  है
क्या पता कौन दोस्त कौन दुश्मन बना है

क्या कहूँ किसने मेरे दिल पर वार किया
यहाँ तो हर हाथ मेरे ही खून से सना है

मेरी चुप्पी को हरगिज़ न समझिये मेरी नाराज़गी
दरअसल यहाँ मेरा मुस्कुराना भी मना है

मालूम नहीं इनमे कहाँ खो सी गयी है वो
मुझे इन लम्हों में से ज़िन्दगी को छाँटना है

ये मेरी ग़ज़ल पढ़कर जाने क्यों खामोश है वो
मैं समझूँ तारीफ़ मगर ये वक़्त की आलोचना है

- स्नेहा गुप्ता 





Saturday, April 21, 2012

करता क्यों नहीं




करता क्यों नहीं मेरे लिए दुआ आज कोई
क्या रहा नहीं मेरा यहाँ आज कोई

मेरी ज़ुरूरत नहीं रह गयी शायद अब किसी को
देता नहीं मुझको सदां आज कोई

गुमसुम सी शक्लें खामोश सारे होठ,
करेगा मेरा दर्द कैसे बयाँ आज कोई

यूं ग़मज़दा होकर सब बैठे हैं महफ़िल में,
हो गयी हो जैसे चाहत फ़ना आज कोई

क्यों लिपटा रखा है मुझे सफ़ेद चादर में इस तरह
हो गयी क्या मुझसे फिर खता आज कोई

- स्नेहा गुप्ता


Monday, October 3, 2011

जाने किस बात से ...

जाने किस बात से है परेशान ज़िँदगी
नियामतोँ के बीच है वीरान ज़िँदगी

इक तरफ हालात ज़ख्मी से पड़े हैँ
और इधर इस शोहरत से है हैरान ज़िँदगी

होँठोँ से मुस्कुराहटेँ जुदा न हुईँ कभी
और ज़रा सी इक खुशी से रही अनजान ज़िँदगी

लफ़्ज़ोँ से कहानी शुरू हुई थी उसी दिन
जिस दिन से हो गई थी बेज़ुबान ज़िँदगी

हर पल की जंग, एक जद्दोजहद जीने की
ज़िँदादिल से हौसलेँ मगर बेजान ज़िँदगी

कोई ख्वाब भी देख लेँ, कुछ खयाल भी सजा लेँ
हो जाए ग़र एक पल को भी आसान ज़िँदगी

कुछ पल फुरसत के, कुछ लम्हेँ राहत के
तलाशती है एक सुकून भरी मुस्कान ज़िँदगी

कामयाबियोँ मेँ शामिल गुमनामियाँ भी होँगी
शायद बन जाएगी एक ग़मग़ीन दास्तान ज़िँदगी

किस पर करे यकीन, कौन समझे यहाँ
करे अपना दर्द किससे बयान ज़िँदगी

नफ़रत-ए-तकदीर की जकड़न से आज़ाद कौन करे
कैसे बने किसी का अरमान ज़िँदगी

Monday, September 5, 2011

दोस्ती ...

ऐ खुदा अपनी अदालत मेँ मेरे सबाबोँ की ज़मानत रखना
मैँ अगर मर भी जाऊ, मेरे दोस्तोँ को सलामत रखना

जो बाँटे कभी तू नियामतेँ अपने इस जहाँ मेँ
याद रहे अपने ज़ेहन मेँ तू मेरी ये इबादत रखना

जो हो कभी तो मुआफ़ कर देना मेरे दोस्तोँ का हर गुणाह
या फिर हर सुनवाई मेँ मेरी रूह को ही अदालत रखना

तूने ही बनाया इस जहाँ मेँ ये सबसे प्यारा रिश्ता
तू अपनी ही निग़हबानी मेँ इस रिश्ते की हिफ़ाज़त रखना

और गिरा कभी ग़म का कोई कतरा मेरे दोस्तोँ की आँखोँ से
तू तैयार कायनात को करने को बर्दाश्त मेरा अश्क-ए-कयामत रखना

ऐ खुदा अपनी अदालत मेँ मेरे सबाबोँ की ज़मानत रखना
तेरी हिफ़ाज़त मेँ मेरे दोस्तोँ की खुशी, तू महफ़ूज़ मेरी ये अमानत रखना

आमीन ।

( - स्नेहा )

Monday, May 9, 2011

परिचय...

इस मासूम ज़िँदगी की बस इतनी दास्तान है
सफ़र है बहुत लम्बा और अकेली नन्ही सी ये जान है

मेरी हँसी, मेरी खुशी, मेरी चाहत, मेरी बंदगी
इस सफ़र मेँ साथ मेरे बस यही कुछ सामान है

ये जो मेरी राहोँ मेँ बिछते रहे हैँ हमेशा
ये काँटेँ मेरे हौसलोँ से अनजान है

इस दिल को हालातोँ की बेरूखी की परवाह नहीँ
ये तो बस तकदीर की खामोशी से परेशान है

आँखोँ मेँ नमी आती जाती रहेगी
मगर साथ हमेशा मेरी ये मुस्कान है

है ये भरोसा की शाम ढ़लने से पहले
मिल ही जाएगा जो मेरा आसमान है

यूँ सदियाँ कट जाती है इसे तय करने मेँ
तुम साथ हो अगर तो ये सफ़र बहुत आसान है

इस मासूम ज़िँदगी की बस इतनी दास्तान है
अभी पंख खोले है मैनेँ अभी बाकी मेरी उड़ान है
(written by - Sneha)

i have created a page on facebook for my novel titled For What You Are. I request all of you to join it.
Thanks,
Sneha

Friday, March 25, 2011

लिखना ज़रूरी है अभी ....

खामोश रहने की मजबूरी है अभी
ख्वाहिशेँ सारी अधूरी है अभी
ख्वाब सारे सच कहाँ हुए हैँ
हसरतोँ और किस्मत मेँ दूरी है अभी
खुल कर खेले तबस्सुम ये नियामत नहीँ मिली है
फ़क़त मुस्कुराने की मंज़ूरी है अभी
डर है कहीँ तुम भूल न जाओ मुझे
लिखते रहना मेरा ज़रूरी है अभी
[written by- Sneha Gupta]
GOD BLESS YOU
your true friend SNEHA

Wednesday, March 16, 2011

ये आँखेँ....

आँखोँ मेँ ख्वाब , ख्वाबोँ मेँ जन्नत है
आँखोँ ने माँगी रब से एक मन्नत है
आँखोँ मेँ बसती थोड़ी शरारत है
आँखोँ मेँ छुपी थोड़ी नज़ाकत है
आँखेँ जो देखे वो बहुत खूबसूरत है
आँखेँ ये इन्हीँ आँखोँ से हुई आहत है
आँखेँ ये दे जाती फिर भी, आँखोँ को बड़ी राहत है
आँखेँ अगर फ़िरा ली तो आ जानी कयामत है
आँखोँ मेँ ही कहीँ बस जाने की चाहत है
आँखेँ ये नसीब हो, क्या आँखेँ इतनी खुशकिस्मत है?
आँखेँ बयां कर देँगी वो जो हक़ीकत है
आँखोँ को झुकाकर रखने की ज़रूरत है
आँखोँ मेँ आखिर क्योँ इतनी इनायत है?
आँखेँ ये आखिर किसकी अमानत हैँ?