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Sunday, November 29, 2015

वादा...

मुझे अपना एक-एक कदम एक-एक मील सरीखा महसूस हो रहा था. बमुश्किल बीस मिनट दूर जेम्स का घर मुझे कई सदियों दूर महसूस हो रहा था. मुझे समझ में नहीं आ रहा था आखिर जेम्स को सब कुछ बताते हुए मैं उसका सामना कैसे करुँगी. पता नहीं ये सब कुछ जेम्स झेल भी कैसे पायेगा...

बूंदाबांदी जारी थी. केरल में तो ये आम बात ही थी. लेकिन एक दिन पहले जो तूफ़ान आया था उसने मेरी और जेम्स की ज़िन्दगी को तबाह कर दिया था... मैं अनमनी सी चली जा रही थी बस ये सोचते हुए कि ये रास्ता कभी ख़त्म न हो...

जेम्स का कॉटेज सामने नज़र आने लगा था. मेरी हिम्मत नहीं हो रही थी अन्दर जाऊ. पिछली रात के तूफ़ान में सड़क के इस पार एक पेड़ गिर पड़ा था. मैं उसकी ही एक शाखा पर बैठ गयी थी. सोच नहीं पा रही थी कि आखिर जेम्स से कहूँगी तो क्या... “जेम्स, मुझे माफ़ कर दो. मैं अपना वादा नहीं निभा पायी...” ... “जेम्स, तुम्हे इस तरह उसे अकेले छोड़कर नहीं जाना चाहिए था...”
मुझे लग रहा था मेरा सर फट जाएगा.

इससे पहले कि कुछ और सोच पाती, मेरा मोबाइल बज उठा. मैंने देखा – “जेम्स कालिंग...”

खुद पर पूरा नियंत्रण रखते हुए मैंने अपने आंसू पोंछे और फ़ोन उठाया, “हेल्लो...”

“हेल्लो, शिन्नी...! वहाँ क्या कर रही हो...? अन्दर आओ. बारिश में क्यों भींग रही हो?” जेम्स की आवाज़ थी... सारे जहाँ की खुशियाँ समेटे हुए... ज़िन्दगी की उमंग और चाहत से भरपूर... मुझे आश्चर्य नहीं हुआ था जब मिली ने बताया था, “वी आर सीइंग ईच अदर, यू नो...”
बस दुःख हुआ था...

“हेल्लो... हेल्लो... शिन्नी... देखो तो सामने...”
मेरी तन्द्रा टूटी तो मैंने देखा था कि जेम्स दरवाज़े पर खड़ा होकर हाथ हिलाते हुए मेरा ध्यान आकर्षित करने की कोशिश कर रहा था. जैसे ही मैंने उसे देखा, उसने फ़ोन काटकर अन्दर आने का इशारा किया.
अब मैं और नहीं भाग सकती थी...

मैं जैसे ही पास पहुंची, जेम्स ने झपट कर मुझे गले लगा लिया.

“ओह शिन्नी... शिन्नी...! मैंने तुम्हें... तुम सबको कितना मिस किया...”
वह बोले जा रहा था और मैं काठ हो गयी थी. सोच ही नहीं पा रही थी अगर उसे सच्चाई बता दूँ तो क्या उसकी खुशियों की कातिल नहीं कहलाउंगी. उसका मुस्कुराता हुआ चेहरा देखकर मेरा कलेजा मुंह को आ रहा था.

“आज सुबह ही तुम्हारे घर आना चाहता था. फ़ोन किया था पर तुमने उठाया नहीं तो सोचा बाद में मिल लूँगा...”

मैं क्या बताती उसे.. कि मैं घर पर नहीं कब्रिस्तान में थी.

हम अन्दर आ गए थे और अन्दर घुसते ही मेरा कलेजा टूक टूक हो गया. पूरे घर में सिर्फ मिली ही छायी हुई थी. दीवारों, दरवाजों, मेजो, कुर्सियों.. हर जगह सिर्फ उसकी ही छाप नज़र आ रही थी. लग रहा था कि अब किसी तस्वीर से मिली खिलखिलाती हुई बाहर निकल आएगी. सर घूम रहा था. मैं पास ही एक कुर्सी पर बैठ गयी. पूरे घर में जैसे उसकी खुशबू फैली हुई थी. लग रहा था कि अब किसी कमरे से उसकी खनकती हुई आवाज़ शिकायतों के साथ बाहर आएगी, “देखो न शिन्नी, पूरे घर को कबाड़ बना दिया है. सोचो, शादी के बाद मैं कैसे रहूंगी इस कबाड़खाने में. अगर हर सन्डे साफ़ सफाई न करूँ, तो पता चला किसी दिन मुनिसिपैलिटी वाले ये पूरा घर ही ले जायेंगे.”

“शिन्नी... शिन्नी...” जेम्स ने मेरा कन्धा हिलाया, “क्या हुआ?”

“क.. कुछ नहीं.” मैंने खुद को संभाला, “जेम्स, कुछ बताना है तुम्हे.”

“अभी नहीं.’ जेम्स ने मेरी बात काट दी. “पहली मेरी बनायीं हुई कॉफ़ी पीकर फ्रेश हो लो, फिर करेंगे ढेर सारी बातें.”

और मेरे जवाब का इंतज़ार किये बिना ही जेम्स किचन में चला गया. मुझे हर चीज़ अजीब लग रही थी. सबसे ज्यादा अजीब ये बात थी कि जेम्स ने अभी तक एक बार भी मिली के बारे में नहीं पूछा था. वरना तो हर वक़्त मिली मिली मिली... उस दिन क्या हो गया था उसे. वो कुछ ज्यादा ही कूल और रिलैक्स लग रहा था.

मैं उसके बारे में ही सोच रही थी कि वह कॉफ़ी ले आया. “ये लीजिये मैडम! गरमागरम कॉफ़ी...” वही गर्मजोशी... वही अंदाज़... चेहरे पर या आवाज़ में ज़रा भी शिकन नहीं. अबिम ने मुझे बताया था पिछली रात से जेम्स से उसकी बात नहीं हुई थी. जेम्स था तो बिलकुल सही लेकिन उसका मिली की खोज खबर न लेना अखर रहा था.
अब मैं और बर्दाश्त नहीं कर सकती थी. मुझे उसे सब कुछ बताना था. वह कॉफ़ी मेज पर रख कर अपना सामान अनपैक करने में लग गया था.

“जेम्स, यहाँ बैठो.” मैंने उसे आवाज़ लगाते हुए सामने रखी कुर्सी खींच ली थी.

“हाँ, बोलो.” जेम्स ख़ुशी से मेरे पास आकर बैठ गया. फिर खुद ही कहने लगा, “सॉरी यार, पूरा सामान बिखरा हुआ है. आज सुबह ही आया पर कुछ कर नहीं पाया...”

“जेम्स,’ मैंने उसकी बात काट दी, “मिली... मिली नहीं रही...” मेरे हाथ कांपने लगे. मुझे लग रहा था कि मैंने उसका सामना नहीं कर पाउंगी. मैंने नज़रे झुका ली, “कल रात को बहुत तेज़ तूफ़ान आया था. कल शाम को मिली ये कहकर निकली कि वह तुम्हें बहुत मिस कर रही थी इसलिए कुछ वक़्त अकेले नेवल कैंप के पास वाले ‘बीच’ पर गुज़ार कर जल्दी लौट आएगी. लेकिन बारिश तेज़ हो जाने के बाद भी जब देर रात तक वह नहीं आई तो हम सब उसे ढूँढने निकले. आज सुबह तीन बजे हमें उसकी लाश दो किलोमीटर दूर मिली. हम अभी सेमेट्री से ही...” इसके आगे नहीं बोल पायी थी मैं. गला रुंध गया था. लाख रोकने के बाद भी आंसू बह निकले. और आख़िरकार बाँध टूट गया और मैं बिलख बिलख कर रोने लगी.

“जानता हूँ.”
ये जेम्स की आवाज़ थी. बेहद ठंडी और भावशून्य...
मैं अवाक रह गयी...
“जेम्स...” आगे कुछ कह नहीं पायी मैं...
“मुझे मालुम है कि मिली मर गयी.” जेम्स ऐसे बोलने लगा जैसे मिली उसकी कोई न लगती थी, “आज सुबह ही पता चल गया था मुझे. अरे यार! जो पैदा होता है वो मरता भी है. मिली भी मर गयी तो कौन सा पहाड़ टूट गया. सुबह से मुझे दिलासा दे देकर लोगो ने मूड ऑफ कर रखा है. मिली मरी है... मैं तो नहीं मरा न.. डिसगस्टिंग...”

“तुम... तुम जल्लाद हो जेम्स...” मैं आपा खो बैठी, “जिस लड़की पर अपनी जान लुटाते थे... आज उसके मरने पर तुम्हें अफ़सोस तक नहीं हो रहा... कोई किसी के साथ टाइम पास भी करता है न तो उसकी मौत पर दुखी हो जाता है... लेकिन तुम जैसा सेल्फिश आदमी शायद ही दुनिया में हो... मिली कितना प्यार करती थी तुमसे... तुम इंसान नहीं हो सच... हैवान हो... शैतान हो...”

“बस!” जेम्स चिल्लाया, “मेरे घर में मुझ पर ही चिल्लाने की तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई?”

“नहीं रहना मुझे यहाँ...” मैं भी तैश में आ गयी थी, “मुझे तुमसे कोई रिश्ता भी नहीं रखना... शर्मिंदगी होती है कि कभी मैं तुम्हे अपना बेस्ट फ्रेंड मानती थी...”

उसके बाद मैं रुकी नहीं. दनदनाते हुए उसके घर से निकली और बारिश में ही भींगती हुई अपने कॉटेज में वापस आ गयी. दरवाज़ा बंद किया और औंधे मुंह बिस्तर पर गिर पड़ी. सामने टेबल पर एक तस्वीर थी... हमारी यादों की तस्वीर... हम तीनों साथ थे उसमे... मैं, मिली और जेम्स...

जो कुछ भी हुआ था उस दिन यकीन नहीं होता कि वो सपना था या हकीकत... मिली की मौत और जेम्स की बेरुखी... मेरी तो जैसे दुनिया ही उजड़ गयी थी. और मेरी दुनिया में था भी कौन जेम्स और मिली के अलावा... चार साल की उम्र से मदर मरियम अनाथाश्रम में साथ साथ रहे थे हम और जेम्स. एक साथ खेले, कूदे और बड़े हुए... सिस्टर ग्रेस की बदौलत मुझे और जेम्स को अच्छी पढाई मिली और बाद में नौकरी भी. मेरी दुनिया में बस जेम्स ही था. बेस्ट फ्रेंड्स थे हम दोनों. मैंने कभी सोचा ही नहीं था कि इसके आगे भी दुनिया होती है. फिर एक दिन हम दोनों की छोटी सी दुनिया में मेरिलिन आई. वह जेम्स के साथ काम करती थी. उसका भी दुनिया में कोई नहीं था. शायद एक अकेलेपन के दर्द का रिश्ता था जिसने हम तीनो को जोड़ दिया. फिर मेरिलिन मिली बन गयी. और जब मिली ने मुझे बताया कि जेम्स से उसका अफेयर चल रहा था तो मुझे लगा कि जैसे अन्दर कुछ टूट गया था. मैंने कभी जेम्स से शादी करने के बारे में नहीं सोचा था. लेकिन जब मुझे महसूस हुआ कि अब उसकी ज़िन्दगी में कोई और लड़की होगी जो मुझसे ज्यादा अहमियत रखेगी तो मुझे लगा जैसे ज़िन्दगी में मेरा एक ही खज़ाना था जो मेरा नहीं रहा. मेरा और जेम्स का रिश्ता न तो दोस्ती था और न ही प्यार. हम दोनों का रिश्ता दोस्ती और प्यार से बहुत ऊपर था... इसका कोई नाम नहीं था... ये एक ऐसा रिश्ता था जिसे सिर्फ महसूस किया जा सकता था... लेकिन जब मैंने जेम्स की आँखों में मिली के लिए वो खुशनुमा एहसास देखा तो मुझे इतनी ख़ुशी हुई जितनी शायद अपने लिए भी कभी नहीं हुई थी... फिर मैंने भी दिल की सारी गिरहें खोलकर मिली का स्वागत किया और जल्द ही मैं और मिली एक साथ शिफ्ट हो गए. जेम्स के अलावा एक अबिम था जो मेरी फ़िक्र करता था. और कुछ वक़्त बाद मैंने भी उसे नज़र अंदाज़ करना बंद कर दिया था. मैंने महसूस किया था अबिम वाकई मेरी परवाह करता था.
जेम्स मिली पर जान लुटाता था. और मिली भी उसपर दिलोजान से फ़िदा थी. जो भी उन्हें देखता उनके प्यार की कसमें खाता. मुझे याद है मिली के जन्मदिन पर जेम्स ने मुझसे पूछा था कि वह उसे क्या गिफ्ट दे. मैंने मोतियों का एक ‘नेकलेस’ ‘सज्जेस्ट’ किया था. और जेम्स बेवकूफी में नकली मोतियाँ ले आया था. खूब हँसे थे फिर हम तीनों... जेम्स ने कहा था कि वह मोतियाँ बदल कर ले आएगा. लेकिन मिली ने मना कर दिया था... वह ‘नेकलेस’ उसे दिल से भा गया था... और क्यों न भाता... आखिर जेम्स का दिया हुआ तोहफा जो था... वह एक पल को भी उस नेकलेस को खुद से अलग नहीं करती थी...

कितना चाहती थी वो जेम्स को... और क्या सिला दिया जेम्स ने उसे...

रोते रोते मेरी आँख कब लग गयी थी मुझे पता नहीं चला था. दरवाज़े पर हो रही खटखट से नींद खुली थी. दरवाज़ा खुला तो मैंने देखा सामने जेम्स था. उसका ये रूप देखकर मैं डर गयी थी. लाल लाल सूजी हुई आँखें और अजनबी सा चेहरा... मुझे लगा जैसे वह काफी देर से घर के बाहर भींग रहा था. मगर अचानक से मुझे उसका रूखा हुआ ‘बिहेविअर’ याद आया और मैंने उसे झिड़क दिया, “क्या करने आये हो यहाँ?”

“लोग झूठ कहते है तो मुझे अच्छा नहीं लगता शिन्नी.” बेहद ठंडी आवाज़ में वह बोला, “मिली मरी नहीं है...”

उसकी आवाज़ इतनी सर्द थी कि एकबारगी मेरी कंपकंपी छूट गयी. उसे देख-सुन कर ये साफ़ साफ़ ज़ाहिर हो रहा था कि वह अपने होश में नहीं था. यकीन नहीं हो रहा था कि सुबह मैं इसी जेम्स से लड़कर आई थी. वह बुरी तरह भींगा हुआ था मगर लग रहा था जैसे उसे कुछ महसूस ही नहीं हो रहा था. उसकी हालत देखकर मेरा कलेजा मुंह को आ गया. मैं एक दोस्त को खो चुकी थी और दूसरे को हरगिज़ खोना नहीं चाहती थी.

“अन्दर आओ जेम्स...” मैंने उसे बुलाया और वह बिलकुल एक छोटे बच्चे की तरह मेरे पीछे पीछे अन्दर आ गया. उसकी हालत खुद बखुद पुकार रही थी कि वह अपने होश में नहीं था.

मैंने उसे पकड़ कर कुर्सी पर बिठा दिया और एक तौलिये से उसका सर पोंछने लगी. वह खामोश नहीं था. बस अपनी ही धुन में बोले जा रहा था – “ मैंने मिली से वादा किया था कि मैं कल ही आ जाऊँगा. और आऊंगा तो सबसे पहले उससे ही मिलूँगा. मैंने ही उससे कहा था कि वह नेवल कैंप के पास वाले ‘बीच’ पर मेरा इंतज़ार करे. उसने अपना वादा निभाया था, शिन्नी. वह आई थी मुझसे मिलने. बस मैं नहीं पहुँच सका. लेकिन जानती हो शिन्नी? मैंने उससे कहा था कि अगर मैं उससे कल नहीं मिल पाया तो अगले दिन ज़रूर मिलूँगा.”
मैं खामोशी से उसकी बात सुन रही थी. लेकिन अचानक वह बेचैन हो उठा.

“शिन्नी... शिन्नी... तुम मेरे साथ चलो. वह बीच पर ज़रूर आई होगी.” वह उठकर खड़ा हो गया और मेरा हाथ पकड़ कर दरवाज़े की तरफ चल पड़ा.

मैं अचानक से बदले उसके इस बर्ताव को समझ नहीं पायी. मैंने उसे रोकने की कोशिश की, “जेम्स रुक जाओ. मिली मर चुकी है. वो भला अब ‘बीच’ पर कैसे आ सकती है? होश में आओ जेम्स.” मैंने उसे झकझोरा.

“नहीं...!” जेम्स जोर से चिल्लाया, “मिली मरी नहीं है. जिंदा है वो... हरपल उसे महसूस करता हूँ मैं.” वह काँप रहा था... पता नहीं सर्दी से या गुस्से से... “जब लोग उसकी मौत का मातम मनाते है तो मुझे बहुत गुस्सा आता है. दिल करता है सबको मार डालू मैं... मरी नहीं है मिली. मर कैसे सकती है वो..? कैसे अपना वादा तोड़ सकती है?” वह हांफने लगा था. फिर मेरा हाथ पकड़ कर खींचते हुए बाहर ले जाने लगा, “चलो, मैं तुम्हे मिली से मिलवाता हूँ. वो जिंदा है और ज़रूर मेरा इंतज़ार कर रही होगी..”

“रुको जेम्स.” मैंने उसे रोकने की कोशिश कि लेकिन उसने परवाह नहीं की.

वह मुझे खींचते हुए बाहर ले आया. बारिश रुक चुकी थी. बस बूंदाबांदी हो रही थी. लेकिन वह रुका नहीं. मुझे खींचते हुए ‘बीच’ की तरफ ले जाने लगा और रास्ते भर बुदबुदाता रहा, “मर कैसे सकती है मिली? हरपल उसे महसूस करता हूँ मैं... मेरे चारो तरफ है वो.”

मैं बस उसके पीछे चलती जा रही थी और कोशिश कर रही थी उसकी हालत समझ सकू. मुझे डर लग रहा था कि कहीं जेम्स पागल न हो जाए.

आखिरकार हम ‘बीच’ पर पहुँच गए. जेम्स ने घड़ी देखकर कहा, “सात बज गए है. वह आती ही होगी.”

मैं खामोश थी और उम्मीद कर रही थी कि थोड़ी देर बाद जेम्स फूट फूट कर रोये और उसका गुबार बाहर निकल जाए.
मगर ऐसा हुआ नहीं. ‘बीच’ पर अजीब सी शान्ति छाई रही. यकीन नहीं हो रहा था कि बस एक दिन पहले ही वहाँ तूफ़ान आया था जिसने मिली की जान ले ली थी. उस दिन समंदर भी जैसे मिली को निगल कर शांत हो गया था.

कुछ ही मिनट बीते थे कि अचानक तेज़ आवाज़ हुई और समंदर से एक बहुत बड़ी लहर किनारे की तरफ उठी. मैं हैरान थी कि अचानक शांत पड़े समंदर में इतनी बड़ी लहर कहाँ से आ गयी. मैंने घबरा कर जेम्स को पीछे की तरफ खींचने की कोशिश की.
लेकिन टस से मस नहीं हुआ. उल्टा उसने बाँहे फैला दी और आँखें बंद कर के बेहद शांत आवाज़ में बोला, “मेरी मिली आ गयी...”

मैं डर गयी और जोर से चिल्लाई, “जेम्स पागल मत बनो. चलो यहाँ से.” उसे खींचने की मेरी सारी कोशिशें बेकार हो रही थी.

लेकिन जेम्स तो जैसे दूसरी ही दुनिया में चला गया था. बेहद ठंडी आवाज़ में बोला, “तुम घर जाओ, शिन्नी... मैं मिली के साथ जाऊँगा...”

इससे पहले कि मैं कुछ बोल पाती, पानी की तेज़ लहर ने मुझे दूर तक पटक दिया. मेरी आँखों के आगे अँधेरा छा गया...

मैं कितनी देर तक बेहोश रही मालुम नहीं. लेकिन जब मेरी आँख खुली तो समंदर में पहले की तरह ही मुर्दानगी जैसी शान्ति थी. आसमान साफ़ हो गया था और चाँद की रौशनी पानी में चमक रही थी. लेकिन जेम्स का दूर दूर तक कोई पता नहीं था.

मैं पागलों की तरह जेम्स जेम्स चिल्लाते हुए उसे ढूँढने लगी लेकिन वह कही नज़र नहीं आया. मुझे लग रहा था कि बस एक ही पल में मेरी दुनिया उजड़ गयी थी. जो दो लोग मेरे सबसे ज्यादा करीब थे वो मुझसे हमेशा के लिए बहुत दूर चले गए थे. मैं रोते रोते वहीँ गिर पड़ी. तभी अचानक मेरी नज़र एक चमकती हुई चीज़ पर पड़ी. मैंने उसे उठाकर देखा...

वो नकली मोतियों की माला थी जो चाँद की रौशनी में चमक रही थी...

चित्र : गूगल से साभार 



- © स्नेहा राहुल चौधरी 
29/11/2011 9:20pm

Friday, June 28, 2013

अनाहिता



“तुम यहाँ बैठी हो? और घर पर सब परेशान हो रहे है.”

“घर पर मन नहीं लग रहा था. इसलिए यहाँ चली आई.”

“बताकर आती. सब परेशान हो रहे है घर पर. उन्हें लगा कि तुम मेरे साथ हो. मैं भी परेशान हो गया था. फिर याद आया कि दुनिया में एक ही जगह है जहां तुम मिलोगी.”

वह उसकी बगल में बैठ गया. वह कुछ बोली नहीं बस मुस्कुरा दी.

“समझ में नहीं आता कि इस जगह में ऐसा क्या ख़ास है. क्यों तुम्हे ये समंदर इतना पसंद है?”

उसकी मुस्कान गहरी हो गयी.

“यही तो तुम्हारी गलती है. तुमने कभी समंदर को पढने की कोशिश नहीं की. कभी इसकी लहरों को समझने कि कोशिश नहीं की. ऊपर से इसकी लहरें कितनी चंचल दिखती है. लेकिन जैसे जैसे नीचे जाओगे, ये शांत होती जाती है. और समंदर की तली में तो लहरें बिलकुल खामोश हो जाती है. बिलकुल खामोश. कोई सोच भी नहीं सकता कि ऊपर से चंचल ये लहरें अन्दर में किस खामोशी को दबाये हुयी है. समंदर से गहरे कई राज़ होते है जिन्हें जानने की ज़हमत कोई नहीं उठा पता. गहरी चीजों में कितनी सच्चाई होती है. समंदर भी उतना ही सच्चा होता है. कभी तुमने या हमने ये जानने की कोशिश नहीं की कि चाँद को छूने की नाकामयाब कोशिशो के पीछे क्या पता, इन लहरों की किसी जन्म की अधूरी ख्वाहिशें रही हो. हम तो बस उसे वैज्ञानिक जामा पहना 
कर अपनी पीठ थपथपा लेते है.”

वह कुछ बोला नहीं. शांत बैठा रहा.

“क्या बात है? खामोश क्यों हो?”

“कुछ नहीं. बस ऐसे ही.”

वह खिलखिलाकर हंसी.

“चलो भी. अब मुझसे झूठ न बोला करो. तुम्हारी आँखें चीख पुकार कर कह रही है कि तुम परेशान हो. क्या बात है, बताओ मुझे.”

“मैं.... मैं खो जाना चाहता हूँ.... सच... मैं खो जाना चाहता हूँ कही पर. कुछ दिनों के लिए. बस सोचता हूँ कि कुछ दिनों के लिए खो जाऊ और फिर मन शांत हो जाए तो लौट आऊ.”

इस बार तो उसकी हंसी बड़ी ही लम्बी थी. वह थोड़ी देर को सहम सा गया उसकी हंसी से.

“अरे बुद्धू, जब लौटने का रास्ता मालुम हो तो उसे खोना थोड़ी न कहते है. खो जाने का मतलब कि फिर लौटने की कोई सूरत न रहे. खो जाना मतलब बस खो जाना....”

“शायद...”

वह फिर चुप हो गया. थोड़ी देर को शाम के धुंधलकों में चुप्पी छा गयी. बस समंदर की लहरें किसी जन्म की अधूरी ख्वाहिशों को पूरी करने की कोशिश में लगी रही. बस लहरों का ही शोर रह गया था वहाँ. लोग अपने अपने घरो को लौटने लगे थे. कुछ देर में ही सन्नाटा सा हो गया. फिर...

“तुम मेरे बारे में सोच रहे हो न?”

“हम्म.... हाँ.”

“क्या?”

“तुम बुरा मानोगी.”

फिर वही हंसी....

“बुद्धू, तुम्हारी किसी बात का बुरा नहीं लगता मुझे.”

“पता नहीं.... मगर मैं सोच रहा था कि तुम मेरा कितना ख्याल 
रखती हो...”

इस बार हंसी की जगह एक मुस्कान ने ले ली.

“तो?”

“तो... तो... मुझे बुरा लगता है कि मैं तुम्हारा उतना ख़याल नहीं रख पता जितना मुझे रखना चाहिए. और जब मैं सोचता हूँ कि तुम मेरा जितना ख़याल रखती हो मैं तुम्हारा उतना ख्याल नहीं रख पाता तो मुझे बहुत ग्लानि होती है. मुझे लगता है कि क्यूंकि तुम मेरे लिए इतना सोचती हो इसलिए मुझे भी तुम्हारे लिए इतना सोचना चाहिए.”

हंसी गायब हो गयी और मुस्कान लापता.

“तुम्हे पहले बताना चाहिए था कि तुम्हे ग्लानि होती है.”

“तुम बुरा मान गयी....”

“हरगिज़ नहीं... तुम्हारी ख़ुशी बहुत कीमती है. जानते हो तुम खुश क्यों नहीं हो? क्यूंकि तुम वो नहीं कर रहे जो तुम करना चाहते हो. भूल जाओ सब कुछ. उठाओ अपनी गिटार और बना डालो कुछ नयी धुनें. हो सकता है स्ट्रीट शो करने पड़े. म्यूजिशियन के चक्कर काटने पड़े. मगर यूट्यूब मदद करेगा. फैन फोल्लोइंग बढ़ेगी तो लोग मौके भी देंगे.”

कोई जवाब नहीं. सिर्फ शान्ति.

“तुम जानते हो मैं इतनी खुश क्यों रहती हूँ? क्यूंकि मैं सिर्फ अपने ख्वाब के बारे में सोचती हूँ. तुम भी खुश तभी रह पाओगे जब अपने ख्वाब के बारे में सोचोगे. और जब खुद खुश रहोगे तभी दुसरो को भी ख़ुशी दे पाओगे.”

समंदर में एक बड़ी लहर उठी और छपाक से समंदर में तली में चली गयी.

“सच! मैं... मैं यही करूँगा.”

“हाँ, अभी से तैयारी शुरू करो. अभी जाओ. और जुट जाओ. और सुनो अपना ध्यान न भटकाना. जब तक सफल न हो जाओ. मुझसे न मिलना. मेरे बारे में पूछना भी मत. नहीं तो ध्यान भटकेगा. अब जाओ. और पीछे मुड़कर मत देखना.”

वह उठा लेकिन उठने से पहले उसने उसे गले लगा लिया. फिर ख़ुशी से बिना रुके, और बिना किसी को बताये वह उसी रात वह शहर से चला गया.

तीन साल.

उसने खूब मेहनत की. जान से प्राण से. और कामयाबी हासिल की. आज देश नहीं, दुनिया में उसका नाम था. वह बहुत खुश था.

वह अपने शहर लौटा और सीधा उसके घर गया. वह अपने घर में नहीं थी. उसने मगर किसी से कुछ नहीं पूछा और न ही किसी ने उसे कुछ बताया. वह जानता था कि वह कहाँ मिलेगी.

लेकिन समंदर किनारे बड़ा सन्नाटा था. वहाँ कोई नहीं था. वह जगह निर्जन हो चुकी थी. जैसे कई सालो से वहाँ कोई नहीं आया हो. वह उदास हो गया. क्या हुआ था आखिर?

तभी अचानक उसकी नज़र कुछ पत्थरो पर पड़ी. उन पत्थरो के पास एक छोटा सा खोह था. उसे याद था अक्सर वह उसे सताने के लिए उस खोह में उसकी चीज़े छुपा दिया करती थी और फिरौती में आइस-क्रीम या चौकलेट मिलने पर दिया करती थी. अनायास ही उसके कदम उस तरफ बढ़ चले. उस खोह में कुछ चमकती हुई चीज़ थी. उसने हाथ लगाया. प्लास्टिक में कागज़ का टुकड़ा रखा था. उसने वह कागज़ निकाल कर देखा –

“प्रिय अनिकेत,
मुझसे एक गलती हो गयी. मैं खो गयी. मुझे कभी पता ही नहीं चला. मैंने खुद को खो दिया. हमेशा तुम्हारे बारे में ही सोचा. तुम्हारी ही ख्वाहिशो को जिया. न कभी खुद पर ध्यान दिया. न कभी खुद से प्यार किया. जैसे मैं तो कभी थी ही नहीं. बस तुम ही थे. और जब पता चला कि तुम्हारी ग्लानि की वज़ह मैं हूँ तो कुछ बचा ही नहीं. तब ध्यान आया कि अरे मैं तो कब की खो चुकी हूँ. अभी तुम्हे जाते हुए देख रही हूँ. तुम्हारे जाने के बाद मैं नज़र ही नहीं आ रही. यही तो खो जाना होता है.

अनिकेत, तुम मुझे कभी माफ़ मत करना.

तुम्हारी,
अनाहिता”


- © स्नेहा गुप्ता

Thursday, May 17, 2012

सुर्ख

पार्किंग में बाइक लगाकर अभि तेज़ कदमो से पार्क के अन्दर दाखिल हुआ. काफी चहल पहल थी हमेशा की तरह. कुछ आगे चलने पर उसे मान्या दिखाई दी वहीँ पीले गुलाब की झाड़ियो के पास वाली बेंच पर बैठी हुई. उसके हाथ में परिणीता थी. लेकिन वह पढ़ नहीं रही थी ये बात अभि भांप गया क्यूंकि उसकी निगाहें किताब के पन्नो पर नहीं बल्कि कही शून्य में थी. वह उसके पास पहुंचा.

"हेल्लो मान्या." उसने हमेशा की तरह उसे चौकाने के इरादे से अचानक कहा.
मान्या ने सर तो घुमाया पर उसे देखे बिना बेंच से उठकर पीले गुलाब वाली झाड़ियो के पास चली गयी.




अभि हैरान सा उसे देखने लगा. नाराज़ थी वह. लेकिन क्यों? किस बात से?
"क्या हुआ मान्या?" उसने पास जाकर उससे पूछा बिलकुल उसकी नज़र के सामने आते हुए ताकि इस बार वह नज़रे न फेर सके लेकिन मान्या ने फिर से नज़रे घुमा ली.
"आखिर बात क्या है?" अभि ने पूछा उससे. कोई जवाब नहीं. "देखो तो, आज मैंने नीली शर्ट पहनी है और कितना हैंडसम लग रहा हु और तुमने अभी तक तारीफ़ भी नहीं की मेरी." अभि को पूरा यकीन था की यह बात सुनते ही मान्या उसकी तरफ हंस कर देखेगी ज़रूर.


मान्या ने उसकी ओर देखा लेकिन हंस कर नहीं. यह क्या? बड़ी बड़ी आँखे बिलकुल लाल लाल. जैसे मान्या रो रही हो काफी देर से.

"क्या बात है मान्या?" अभि ने थोडा घबरा कर पूछा. उसने कभी मान्या को रोते हुए नहीं देखा था.
"तुमने सारिका से बात की?" मान्या ने भींगी हुई आवाज़ में पूछा.
"सारिका से? हाँ, उसे ही तो दी थी परिणीता तुम्हे दे  देने के लिए."
"क्यूँ?"
"क्यूँ का मतलब?" अभि ने हैरानी से पूछा, "तुम्हारे कॉलेज गया था. पता चला तुम आई नहीं थी. और पार्क में भी तुम नहीं आ रही थी कई दिनों से. इसलिए मैंने तुम्हारी दोस्त सारिका को परिणीता दे दी, तुम्हे देने लिए. और तुम तो जानती हो की लाइब्रेरी में परिणीता के लिए कितनी मारा मारी चलती है. कल ही यह किताब एक लड़के ने लौटाई. मेरी नज़र पड़ गयी और मैंने तुरंत इसको ले लिया. तुमने कहा था की तुम्हे परिणीता पढनी है. इसलिए तुम्हे देने कॉलेज चला गया. सारिका को यह सोच कर दे दी की तुम तो आई नहीं लेकिन छुट्टी में इसो पढ़ तो लोगी कम से कम."
"हाँ, मैं तो मर गयी थी न! फिर आती ही नहीं कभी." मान्या फफक कर रो पड़ी.

"ये क्या हो गया है मान्या तुम्हे?" अभि हैरान था. मान्या संतुलित स्वभाव की लड़की थी और उसका इस तरह से आपा खो देना अभि के लिए बहुत अचरज की बात थी.
"ऐसी क्या बात हो गयी की तुम मेरा इंतज़ार नहीं कर सके जो  सारिका को किताब दे दी." मान्या हिचकियों के बीच बोली.
"अच्छा, तो तुम्हे लगता है की मैं तुम्हारी दोस्त के साथ फ्लर्ट कर रहा था." अभि ने थोड़े गुस्से से कहा.
"नहीं," थोड़े शांत स्वर में मान्या बोली, "मैं जानती हु तुम फ्लर्ट नहीं हो. लेकिन मुझे ये समझ में नहीं आ रहा की हमारी दोस्ती में सारिका की ज़रूरत क्यों महसूस की तुमने."
"ऐसा  नहीं है, मान्या." अभि को अब समझ में आया. तो मान्या इस बात से नाराज़ थी की उसने सारिका से बात की, "मैं सिर्फ ये किताब तुम तक ज़ल्दी पहुचाना चाहता था. बस."
"ज़ल्दी?" मान्या का स्वर फिर तेज़ हो गया, "तुम बिजनेस टूर पर थे जब मुझे ग़ुलाम अली की बहारों का बांकपन मिली. तुम्हारे सभी दोस्त आते थे पार्क में, सौरभ, अनिकेत, वरुण सब आते थे. लेकिन मैंने पंद्रह दिनों तक तुम्हारे लौट आने का इंतज़ार किया.  तुम लौटे और मैंने  तुम्हारे हाथ  में दी वो कैसेट."
"अच्छा बाबा." अभि ने गहरी सांस लेकर कहा, "गलती  हो गयी. अब कोई भी बात होगी तो सिर्फ तुमसे कहूँगा. तुम्हारी दोस्तों से नहीं." अभि उसे मनाने की गरज से मुस्कुराया.
मान्या ने अपने आंसू पोंछे. कुछ देर चुप रही. फिर अभि की ओर देखकर मुस्कुराते हुए बोली, "हाँ, हैंडसम तो लग रहे हो."
"शुक्रिया मोहतरमा." अभि खुश हो गया. मान्या उसकी बहुत अच्छी दोस्त थी लेकिन फिर भी उस जैसी समझदार लड़की का इस तरह ज़रा सी बात पर उखड जाना उसके पल्ले नहीं पड़ रहा था.

मान्या अब शांत थी. अभि ने अच्छा मौका जानकार कहा, "देखो मान्या, यह कोई बड़ी बात नहीं है. बल्कि मेरा तो मानना है की हमारे  कॉमन फ्रेंड्स होने चाहिए. मान लो कभी ऐसा हो की हमारी तुम्हारी बात नहीं हो  पाए या हम मिल न पाए तो कॉमन फ्रेंड्स के ज़रिये हम एक दुसरे के कान्टेक्ट में रह सकते है."
"कान्टेक्ट में हम वैसे भी रह सकते है. फोन से, ईमेल से, मेसेज से. चाहो तो हज़ार तरीके है न चाहो तो हज़ार बहाने." मान्या का स्वर तेज़ होता जा रहा था.
"अरे, तुम समझी नहीं मान्या," अभि ने कोशिश की उसे समझाने की, "अब जैसे मेरे जितने भी दोस्त है वो सब आपस में भी दोस्त है. इससे  फ्रेंड्स सर्किल बनता है. दोस्ती और भी ज्यादा मजबूत होती है. मैं तो कहता
हूँ की उसी तरह तुम भी मेरे दोस्तों को जानो और मैं भी तुम्हारे दोस्तों को जानू. इससे हम एक दुसरे को और बेहतर  जान पायेंगे."
"अभि," मान्या की आवाज़ फिर से भींग गयी थी, "हम दो साल से दोस्त है. क्या मैंने तुम्हे कभी परेशान किया है? कभी कोई ग़लतफहमी रखी तुम्हे लेकर?"
"अरे नहीं कभी नहीं." अभि को लगा मान्या बात को दूसरी तरफ ले जा रही है लेकिन वह रोक नहीं पाया.
"कभी तुम्हे किसी और की ज़रूरत पड़ी मुझे कोई बात समझाने  के लिए?"
"नहीं, तुम तो वैसे ही बहुत सुलझी हुई लड़की हो." अभि खुद ही उलझा जा रहा था.
"तो फिर हमारे बीच कॉमन फ्रेंड्स क्यों होने चाहिए? तुम्हे मुझसे  बात करने के लिए किसी ज़रिये की ज़रूरत क्यों महसूस होती है. क्यों कोई कॉमन फ्रेंड  चाहिए तुम्हे? क्यों आये कोई तीसरा हमारे बीच???" मान्या की आँखें बरसाती नदी की तरह बहने लगी. उसके हाथ से परिणीता छूट कर नीचे गिर पड़ी. उसने अपनी रोती हुई आँखों  से एक नज़र भर कर अभि को देखा और पीले गुलाब वाली झाड़ियो से होते  हुए पार्क के दुसरे दरवाजे की ओर चली गयी. कुछ कदम तेज़ चलने के बाद वह आँखों से ओझल  हो गयी.

अभि उसे जाते हुए देखता रहा. उसने उसे रोका नहीं. आवाज़ भी नहीं दी.
"अभि, ये मान्या थी न?" मिश्रा अंकल बोले. मिश्रा अंकल भी अक्सर पार्क में आते थे. अभि और मान्या दोस्त है, वो जानते थे.
"हाँ." अभि ने कहा.
"क्या हुआ उसे? ऐसे क्यों चली गयी?" मिश्रा अंकल ने पूछा.
अभि ने कोई जवाब नहीं दिया.
वह अभी भी उस रास्ते को ही देख रहा था जहा से अभी कुछ देर पहले  मान्या रोती हुई गयी थी.
मिश्रा अंकल अचरज से उसे देख रहे थे.
"ये कौन से रंग के गुलाब है, अंकल?" अचानक अभि ने पूछा.
"पीले गुलाब है." मिश्रा अंकल ने हैरानी से जवाब दिया.
अभि के चेहरे पर भीनी सी मुस्कान तैर गयी, "मुझे तो सुर्ख लग रहे है...."



 

Tuesday, May 15, 2012

टूटी हुई चप्पल

ऑफिस से निकलते ही किरण को महसूस हो गया था की अब ज्यादा देर चल पाना मुमकिन न हो पायेगा. वह चप्पल घिसट कर लेकिन बड़ी संभल कर चल रही थी. कही टूट न जाए. लेकिन बमुश्किल १०-१५ कदम ही चली होगी की चप्पल टूट गयी. बड़ी हताशा से उसने अपनी टूटी हुई चप्पल को देखा. खामखाँ का खर्च लग गया. अभी करीब एक महीने तक और उस चप्पल को चला लेने की योजना थी उसकी. लेकिन...

चप्पल को सिलवाने के लिए वह नुक्कड़ की तरफ मुड़ गयी.

"८० रुपये लगेंगे, बब्बी." चप्पलवाले ने चप्पल का निरीक्षण करते हुए कहा.

"८० रुपये???" किरण चौंक गयी, "चौक वाले तो ५० रुपये में सिल देते है. क्या हमें बेवकूफ समझते हो? अच्छी लूट मचा रखी है." उसने चप्पलवाले को घुड़कते हुए कहा.

"तो जाओ न बब्बी, चौक वाले से ही सिलवा लो. हमारा टाइम काहे को फ़ोकट में खराब करती हो." चप्पलवाले ने भी तुनक कर जवाब दिया.

किरण असमंजस में पड़ गयी. चौक तक जाने में १० मिनट और फिर आने में १० मिनट यानी लगभग आधा घंटा तो लग ही जाएगा. लेकिन तीस रुपये तो बच जायेंगे. तीस रुपये का मोबाइल रिचार्ज करवा ले तो १० दिन तो चल जाएगा. या फिर वह  उनसे किलो की ४ कापियां कमलेश के लिए ले सकती है.

फिर सोचने में वक़्त नहीं गंवाया किरण ने. टूटी हुई चप्पल उठा कर वह तेज़ कदमो से चौक की तरफ चल पड़ी. नुक्कड़ का चप्पल्वाला उसे देखता रहा. शायद उसे उम्मीद न थी की ये लड़की शाम के वक़्त सिर्फ चप्पल सिलवाने के लिए चौक तक जाने की ज़हमत उठाएगी. उसे पूरी उम्मीद थी की वह मनमाना दाम वसूल लेगा. लेकिन किरण को जाते हुए देखकर वह भौचक्का रह गया. एक ग्राहक खो दिया उसने. ८० के चक्कर में ५० भी गए. उसे बुलाने की हिम्मत भी नहीं जुटा सका वह.

चप्पल सिलवा कर किरण तेज़ी से स्टेशन की तरफ बढ़ रही थी. कीले लगने से चप्पल भारी हो गयी थी. किरण को चलने में बेहद तकलीफ हो रही थी. कीलो से चोट भी लग रही थी उसके पैरो में. लेकिन वह खुश थी की उसने ३० रुपये बचा लिए थे.

ऑटो में बैठते ही उसकी नज़र सूरज पर पड़ी. सूरज उसे ही देख रहा था. जैसे ही किरण ने उसे देखा, उसने मुस्कुरा कर ख़ुशी से अपना हाथ हिला दिया. जवाब में किरण मुस्कुराई. सूरज से उसकी मुलाक़ात यही कोई एक डेढ़ साल पहले हुई थी "युवा कला प्रोत्साहन मंच" द्वारा आयोजित कला प्रदर्शनी में. इत्तेफाक ऐसा की सूरज उस लड़की को ढूंढ रहा था जिसने कैनवास पर रंगों को सजीव कर दिया था और किरण को उस लड़के को ढूंढ रही थी जिसने केवल पेंसिल से एक रेखाचित्र को एक शब्दचित्र बना दिया था. चित्रकार दोनों ही थे लेकिन विधाएं अलग थी और दोनों एक दूसरे की कला के मुरीद हो गए. दोनों मिले और काफी अच्छे दोस्त भी बने. सूरज भी किरण की ही तरह मध्यमवर्गीय परिवार का लड़का था. वह दानापुर में रहता था और किरण आजादनगर में. बाद में किरण को पता चला की सूरज ने अच्छी खासी नौकरी छोड़कर अशोक राजपथ में अकादमिक किताबों और स्टेशनरी की दूकान खोली थी. अपनी जिद के पक्के और जुनूनी सूरज ने जो सोचा था वह कर दिखाया और आज वह अपनी नौकरी की तनख्वाह का दुगुना पैसा अपनी दूकान से कमा रहा था. ज़रा भी बनावटीपन नहीं था सूरज में. बेबाक ऐसा की जो बात दिल में वही बात जुबां पर. उसपर भी स्वभाव से बेहद जिंदादिल और खुशमिजाज़.  किरण को उसकी यही बाते बहुत अच्छी लगती थी. सूरज के दोस्त भी गिने चुने थे और उन्ही में से एक किरण भी थी. हालांकि आपाधापी भरी ज़िन्दगी में बाते कहा हो पाती थी उतनी. स्टेशन से दोनों ही गाडी पकड़ते थे. कभी सूरज नहीं तो कभी किरण नहीं. और कभी ऐसा हो जाए की दोनों एक दूसरे को देख ले सूरज मुस्कुरा कर हाथ हिला देता और किरण भी मुस्कुरा देती. बस ऐसे ही मिलना होता था उन दोनों का. हाँ महीने दो महीने में कभी ऐसा हो जाए की वक़्त भी हो और दोनों साथ भी तो बगल वाले चाय की दूकान पर एक कप चाय पी लेते और दो-चार बाते भी हो जाती.

सूरज के बारे में सोचते सोचते कब घर आ गया किरण को पता भी नहीं चला. ज़ल्दी से ऑटो वाले को पैसे देकर वह घर की और भागी. वैसे ही आधा घंटा देर से पहुंची थी. अन्दर पहुँचते ही उसे रसोई से आवाज़े सुनाई दी. रसोई में पहुँच कर उसने देखा, कमलेश कलछी से सब्जी चला रहा था और माँ पर झल्ला रहा था. माँ आटा निकाल रही थी और किरण पर झल्ला रही थी. बिना कपडे बदले ही किरण ज़ल्दी से रसोई में दाखिल हुई और उसने कमलेश के हाथ से कलछी ले ली. कमलेश पैर पटकता हुआ अपने कमरे में चला गया.

" कितनी बार कहा है की ज़रा ज़ल्दी घर आया कर. लेकिन नहीं. बहाना ढूंढती चलती है काम से बचने का." माँ के स्वर में नाराजगी थी.

"आज ज़रा देर हो गयी." किरण ने कहा, "तुम जाओ माँ, मैं गूंध लुंगी." किरण ने माँ के हाथ से आटे की पतीली ले ली.

"आज ही दो सूट देने है." माँ थकी हुई सी आवाज़ में बोली और रसोई से चली गयी.

सब्जी में पानी की बघार डाल कर किरण ने ज़ल्दी से कपडे बदले और आटा गूंधते हुए चाय भी चढ़ा दी गैस पर.

दो कप में चाय निकाल कर वह कमरे में पहुंची. माँ सूट पर काज कर रही थी.

"तैयार हो गयी?" किरण ने पूछा.

"अभी कहा?" माँ सचमुच थकी हुई थी, "अभी दूसरी वाली में हेम करना है."

"कर लो तुम, बस रोटी बनानी है अब." किरण बोली.

खाना खाकर माँ सूट देने के लिए चली गयी. किरण अपने कमरे में अपने कपडे सहेज रही थी की तभी कमलेश अन्दर आया, "जीजी, पैसे चाहिए." धीमी आवाज़ में बोला.

"कितने?" किरण ने पूछा.

"५००."

"क्यूँ?"

"किताबे लेनी है."

"लिस्ट बना कर दे दो, मैं लेती आउंगी कल."

कमलेश कुछ देर चुपचाप बैठा रहा, फिर धीरे से बोला, "माँ के पैसे खर्च हो गए. मैं जब कमाने लगूंगा तब तुम्हारे सारे पैसे लौटा दूंगा."

"ये देखा है क्या है?" किरण ने थप्पड़ दिखाते हुए कहा, "एक लगेगा तो सारा भूत उतर जाएगा दिमाग पर से. जा चुपचाप जाकर लिस्ट लेकर आ किताबो की."

कमलेश हँस पड़ा. किरण भी हंसी.

"प्रदीप का नया एडिशन आया है. फिसिक्स और केमेस्ट्री चाहिए."

"जो जो चाहिए लिख कर दे दो." किरण बोली.

कमलेश अपने कमरे में चला गया. और किरण अपनी पेंटिंग करने लगी. यह तस्वीर उसे परसों तक बना कर दे देनी थी. पर बहुत काम बचा हुआ था. टूटी हुई चप्पल के कारण पैरो में भी बहुत दर्द हो रहा था उसके. लेकिन काम कैसे छोड़ दे. इसी पेंटिंग के दो हज़ार मिलाने वाले थे.

अगले दिन ऑफिस पहुँचते ही किरण ने अपनी चप्पले उतर कर देखा. पैरो की त्वचा छिल गयी थी. "ये नाजुकता रईसों के लिए है. हमारे लिए नहीं." ज़रा सा चिढ़कर उसने खुद से कहा.

बाबूजी का फ़ोन आया हुआ था. उन्होंने १०,०००/- भेजे थे. बैंक भी जाना था. भला हो ईशान बाबु का. उनके रहते किरण को परेशानी नहीं होती थी बैंक
में. ईशान बाबु बहुत भले आदमी थे. अपनी नेकदिली के कारण मशहूर थे. ऑफिस से आधे दिन की छुट्टी लेकर वह सीधे खजांची रोड की तरफ गयी. शर्माजी उसे देखकर हँसते हुए बोले, "मुझे मालुम था की तुम आओगी. अभी कल ही कमलेश किताबे देखकर गया था."


"हाँ, ये लिस्ट है. ये किताबे निकाल दीजिये, चाचाजी." किरण भी मुस्कुरा कर बोली.


"लो, ३०% की काट दी है." शर्मा जी बोले.


किताबो का बण्डल उठाकर किरण ने पैसे दिए और कृतज्ञता जताते हुए बोली, "आप लोग ही है चाचाजी की हम जैसे लोग इतनी महंगाई के बावजूद पढ़ पा रहे है."


"पढने वालो को मैं भी पहचानता हु, बेटा. कमलेश खूब तरक्की करेगा, देखना."

ऐसे ही कई लोग थे जिनकी वज़ह से किरण के कुछ काम आसान हो जाया करते थे. शर्माजी जहा औरो को १०% से ज्यादा डिस्काउंट नहीं करते थे वही किरण को वह हमेशा ३०% डिस्काउंट पर किताबे देते थे. बैंक में भी ईशान बाबु की बदौलत उसे पैसे ज़ल्दी मिल गए. बाहर आते ही उसने बाबूजी को फ़ोन लगाया, "पैसे मिल गए, बाबूजी."


"ठीक, माँ को दे दो जाकर." बाबूजी ने कहा.


"बाबूजी," किरण ने झिझकते हुए कहा, "वो पिछले महीने कमलेश की फीस के लिए सरिता से ४,०००/- उधार लिए थे. अभी सिर्फ २,०००/- ही लौटाए है. इसमें से एक हज़ार ले लू? बाकी एक हज़ार अगले महीने दे दूंगी."


बाबूजी खामोश हो गए. कुछ देर तक चुप रहने के बाद बोले, "तुमसे कोई बात छुपी नहीं है, बेटा. जो सही लगे करना."


"ठीक ठीक." किरण तुरंत बात समझते हुए बोली, "सरिता समझती है. मैं अगले महीने ही दे दूंगी उसका हिसाब. आप बिलकुल चिंता मत किजिए बाबूजी."


बाबूजी का कलेजा भर आया.

माँ को पैसे थमाकर किरण अपनी तस्वीर पूरी करने बैठ गयी. अंतिम दिन बचा था. गनीमत थी माँ ने दिन में ही सब्जी बना ली थी. घर में पाव रोटी थी. किरण तस्वीर बनाती रही. पर लग नहीं रहा था की पूरी हो पाएगी कल तक. शाम हो गयी. और शाम से रात.


अगले दिन रविवार था. सुबह से ही किरण तस्वीर बनाने में जुटी रही. उसे ध्यान तब टूटा जब माँ एक सूट लिए उसके पास आई.


"कैसा है?" माँ ने पूछा.


"अच्छा है." किरण बोली, "कपडा तो मुलायम है. रंग भी खूबसूरत है. बहुत महंगा लगता है."


"सिर्फ ५०० का है." माँ बोली.


"किसका है?" किरण ने पूछा.


"है एक किरण नाम की लड़की. चित्रकार है. उसी का है. उसकी माँ ने ख़रीदा है उसके लिए." माँ मुस्कुरा रही थी.


"मेरे लिए!" किरण हैरानी से बोली, "लेकिन इतने पैसे कहा से बचाए?"


"कल भेजे थे न बाबूजी ने."


किरण ख़ुशी के मारे कुछ बोल न सकी. बच्चे माता पिता के हृदय का सार कब जान सके है!!

तस्वीर पूरी न हो पाएगी किरण को लगा. उसने वर्माजी को फ़ोन किया.


"लेकिन करार तो आज का ही था किरण. मैंने सिंघानिया साहब को बोल दिया है की आज उन्हें तस्वीर मिल जायेगी." वर्मा जी परेशानी भरे स्वर में बोले.


" मैं कल सुबह खुद आपके पास लेकर आ जाउंगी." किरण ने मिन्नत की.
वर्मा जी कुछ देर खामोश रहे. "ठीक है, आज शाम ६ बजे तक दे दो." और फ़ोन कट गया.


दिन के एक बज रहा था. किरण ने एक ग्लास पानी पिया और फिर से अपनी तूलिका उठा ली.


और आखिरकार ५ बजते बजते तस्वीर पूरी हो गयी. किरण ने उसको कपडे से ढंका और चल पड़ी वर्माजी के घर.


"बहुत अच्छे किरण." वर्मा जी बोले, "ये लो तुम्हारे पैसे."


किरण ने पैसे लेकर उसको पहले आँखों से फिर माथे से लगाया.


"एक नया कांट्रेक्ट है किरण." वर्माजी बोले, "सात सफ़ेद घोड़े शाम के समय पानी में दौड़ते हुए. ६०००/-"


"कब तक?" किरण ने पूछा.


"१० दिन."


"ज़रूर." किरण ख़ुशी से बोली.

ओह्ह! ये टूटी हुई चप्पल! किरण की इच्छा हुई की कीले निकाल कर फ़ेंक दे. मगर क्या करती! अचानक  उसे ध्यान आया की उसने सुबह से कुछ नहीं खाया है.


लिट्टी वाले के ठेले के पास खड़े होकर उसने पूछा, "एक प्लेट कैसे?"


"५० रुपये." लड़के ने जवाब दिया.


"५० रुपये??" किरण को झटका लगा, "कल तक ही तो ४० था आज ५० हो गया. अंधेर मचा रखा है. खूब कमाते हो तुम लोग. खूब लूटते हो."


"हाँ, हाँ. हम लोग ही तो लूटते है. ये जो नेता करोडो अरबो लूट कर खाते है उनको कोई कुछ नहीं कहता. लेकिन हम ५ रुपये कमाई के रखे तो अंधेर मच जाता है. एक लिट्टी पर मुश्किल से दो रुपये बचते है. और उस पर हम लोग ही लूटेरे है." लड़का शायद भरा बैठा था, किरण के बोलते ही फूट पड़ा.
किरण को उसकी आवाज़ में अपनी बात सुनाई दी. "अच्छा, एक प्लेट लगा दो, भाई." वह बोली. उसे सचमुच 
जोर की भूख लग गयी थी.


वह पैसे निकाल रही थी की लड़के ने प्लेट उसके सामने रख दी.


"५ लिट्टियाँ? एक प्लेट की तो ४ आती है न?" किरण ने आश्चर्य से पूछा.


"खा लो दीदी. आशीर्वाद दे दो." लड़के ने स्निग्ध वाणी से कहा.


किरण को दया हो आई उस पर. सारे दिन धुप में खड़े होकर लिट्टियाँ बनाता और बेचता था वह. फिर दिल में इतनी दया और इतनी इंसानियत.


"मौर्यालोक से भी बड़ा होटल होगा एक दिन तुम्हारा, देखना." किरण मुस्कुरा कर बोली. लड़के के चेहरे पर भी हंसी आ गयी.

घर की तरफ जा ही रही थी की न जाने क्या इच्छा हुई की किरण गंगा घाट की तरफ मुड़ गयी. गंगा आरती में वक़्त था अभी. घाट पर ज्यादा लोग भी नहीं थे. किरण चप्पले उतार कर अपने पैर पानी में डाल कर बैठ गयी. ठन्डे पानी के स्पर्श ने उसके ज़ख़्मी पैरो पर मरहम का काम किया.
उसे लगा की उसकी ज़िन्दगी भी तो इस कीले लगी हुई टूटी चप्पल के ही जैसी थी. भारी और तकलीफदेह. इसके विपरीत कितना शांत था गंगाजी का पानी. कितना सुकून था वहाँ पर. इसी सुकून की तो किरण को भी तलाश थी. थोडा सुकून जिसके साथ वह अपनी परेशानियां भूल जाए. बहुत ज्यादा आरामतलब जीवन नहीं चाहिए था उसे. बस थोड़े सुकून के पल ज्यादा हो. और क्या. 

वह चप्पले पहन कर चलने को हुई की तभी एक छाया  देखि. पीछे कोई खड़ा था.

"सूरज तुम?" वह हैरान थी उसे देखकर, "कब आये?"


"अरे मैं तो काफी देर से हु." सूरज हंसकर बोला. "अरे" उसका तकियाकलाम था. हर बात की शुरुआत वह "अरे " से करता था. "अरे, आओ बैठो कुछ देर, फिर चले जाना."


किरण मना नहीं कर पायी.


"अरे, और सब कुछ कैसा चल रहा है?" सूरज ने ही पूछा.


"ठीक है सब." किरण बोली, "नया कांट्रेक्ट मिला है." किरण ने अपनी तकलीफों के बारे में सूरज को कुछ नहीं बताया था. उसे पसंद नहीं था अपना दुखड़ा रोकर किसी की दया बटोरना. "तुम बोलो." उसने सूरज से पूछा.


"अरे मेरा भी सब ठीक. अभी परीक्षा है न. पीक सीजन है. जिस्ता की डिमांड ज्यादा है."


"अच्छी बात." किरण बोली.


"अरे, मैं तो भूल ही गया." अचानक सूरज बोला, "ये देखो, मैंने तुम्हारी तस्वीर बनायी थी." कहते हुए उसने एक कागज़ अपनी शर्ट की जेब से निकाल कर किरण के हाथ में थमा दिया.


किरन ने देखा, उसका रेखाचित्र था. वह सम्मोहित सी देखने लगी.


"तुम्हारी आँखे बनाने में सबसे ज्यादा वक़्त लगा. तुम्हारे जैसी आँखे बन ही नहीं पा रही थी. बहुत कोशिशो के बाद बनी. तुम नाराज़ तो नहीं हो न?"
 

नाराज़ क्यों न हो? सूरज की हिम्मत कैसे हुई उसकी तस्वीर बनाने की? वह भी उससे बिना पूछे? किरण के जी में यही सवाल आने को थे. लेकिन आ नहीं रहे थे. उसे चाहकर भी गुस्सा नहीं आया सूरज पर.
 

"कितना वक़्त बर्बाद किया इस पर?" उसने एक अजीब सा सवाल पूछा सूरज से.


"बर्बाद? अरे, तुम्हारी बहुत सारी तस्वीरे बनायीं है मैंने. लेकिन यह तस्वीर सबसे अच्छी है. इसलिए इसे हमेशा अपने साथ रखता हु. कई दिनों से सोच रहा था तुम्हे दिखाने के लिए. लेकिन वक़्त ही नहीं मिल पा रहा था. इत्तेफाक से देखो की आज मिल गयी तुम. और इस तस्वीर को तो पूरी रात जाग कर बनाया है मैंने. मैंने कहा न बहुत मेहनत लगी इसे बनाने में."

किरण हैरानी से सूरज को देख रही थी. उसे लगा की उसकी टूटी हुई चप्पल, जो कीले लगने से भारी हो गयी थी, अचानक बिलकुल हलकी हो गयी है....
 






Monday, September 5, 2011

दोस्ती ...

ऐ खुदा अपनी अदालत मेँ मेरे सबाबोँ की ज़मानत रखना
मैँ अगर मर भी जाऊ, मेरे दोस्तोँ को सलामत रखना

जो बाँटे कभी तू नियामतेँ अपने इस जहाँ मेँ
याद रहे अपने ज़ेहन मेँ तू मेरी ये इबादत रखना

जो हो कभी तो मुआफ़ कर देना मेरे दोस्तोँ का हर गुणाह
या फिर हर सुनवाई मेँ मेरी रूह को ही अदालत रखना

तूने ही बनाया इस जहाँ मेँ ये सबसे प्यारा रिश्ता
तू अपनी ही निग़हबानी मेँ इस रिश्ते की हिफ़ाज़त रखना

और गिरा कभी ग़म का कोई कतरा मेरे दोस्तोँ की आँखोँ से
तू तैयार कायनात को करने को बर्दाश्त मेरा अश्क-ए-कयामत रखना

ऐ खुदा अपनी अदालत मेँ मेरे सबाबोँ की ज़मानत रखना
तेरी हिफ़ाज़त मेँ मेरे दोस्तोँ की खुशी, तू महफ़ूज़ मेरी ये अमानत रखना

आमीन ।

( - स्नेहा )