Showing posts with label दुनिया. Show all posts
Showing posts with label दुनिया. Show all posts

Friday, October 7, 2016

मन्नत

मिसेज शर्मा परेशान थी. सुबह से शाम होने को आई लेकिन उनकी परेशानी ख़त्म होने का नाम नहीं ले रही थी. आज नवरातों की अष्टमी थी. उन्होंने इस साल इक्कीस कन्याएं जिमाने की मन्नत मानी थी. लेकिन तमाम कोशिशों के बावजूद कन्याएं इकट्ठी नहीं जुट पा रही थी. कुछ साल पहले तक तो कन्याएं खुद ही कॉलोनी के घरों में और आस-पास की सोसाइटीयों में घूमती फिरती थी. अब न जाने क्या हो गया था?

मिसेज शर्मा पूरी कोशिश कर रही थी कि उनके मुंह से कोई गलत बात न निकले. लेकिन जब मिस्टर शर्मा पास की ‘अप्सरा सोसाइटी’ से भी अकेले मुंह लटकाए लौट आये तो उनके मुंह से न चाहते हुए भी निकल गया, “क्या हो गया इन मुइयों को? पहले घर-घर छिटकती थी. आज ढूंढें न मिल रही...’

मिस्टर शर्मा घबरा कर बोले, “राम राम! ऐसा न कहो. नवरातों में लडकियां मां का रूप हो जाती है. अरे आज के दिन तो हर घर में कन्या जीमती है न. इसलिए इक्कीस कन्याएं एक साथ आनी मुश्किल हो जाती है. दो तो अपने ही घर में है और पांच-सात तो अपने पड़ोस में है ही. मैंने दो-तीन घरों में और कन्याओं को देखा था. सबको बोल दिया आने को. आ जायेंगी शाम होने से पहले. तुम बस तैयारी पूरी रखो.”

मिस्टर शर्मा की बात सुन मिसेज शर्मा को थोड़ी राहत मिली और वह थोडा सहज होकर बोली, “इसी को कहते है देवी माँ बिना परीक्षा लिए कोई मन्नत पूरी नहीं होने देती. और साल देखिये, मन्नत न होती थी तो समय से कन्या जिमा लेते थे. इस साल मन्नत है तो सुबह से घर के सारे ‘मरद मानुष’ भूखे बैठे है और अभी तक कन्याओं के दर्शन भी ना हुए है.”

“हो जाएगा... हो जाएगा... चिंता न करो...” मिस्टर शर्मा ने दिलासा देते हुए कहा.

कुछ वक़्त और बीता. दिया बाती की बेला आने को थी. मिसेज शर्मा घबराकर बाहर दरवाजे की तरफ बढ़ने लगी. तभी उन्हें एक दूसरे के हाथों में हाथ डाले हंसती हुई करीब १०-११ कन्याएं आती दिखाई दी. छोटी छोटी बच्चियां माता का रूप धरे अपनी चुनरियाँ संभालती हुई खिलखिलाती चली आ रही थी. मिसेज शर्मा हुलसते हुए अन्दर गयी और बहु को आवाज़ लगायी, “सुनीता, आसन लगाओ. माताएं आ रही है.” और फिर उसी तेज़ी से वापिस बाहर गयीं ताकि कन्याओं को अन्दर ला सके.

लेकिन इससे पहले कि कन्याएं मिसेज शर्मा के घर पहुँचती, पड़ोस के घर से मिश्राजी का बेटा निकला और सभी कन्याओं को एक-एक चॉकलेट पकड़ाता हुआ अन्दर ले गया. लडकियां उछलती कूदती उसके साथ चली गयी.

मिसेज शर्मा सर पकड़ के बैठ गयी. अचानक से उनका गला भर आया और वह सोचने लगीं, “माता कितनी परीक्षा लोगी? भरी घर पोतियाँ है. अब बस पोते की मन्नत पूरी करवा दो... और कुछ न चाहिए, माता...”


[चित्र: गूगल से साभार]
© स्नेहा राहुल चौधरी

Friday, September 23, 2016

उन दिनों की प्रेम कहानी...

ये उन दिनों की कहानी है जब प्यार एसएमएस और इन्टरनेट का मोहताज नहीं हुआ था. तब परदेस में कमाने वाले पतियों की घर संभालने वाली अपनी पत्नियों के साथ बगैर किसी लोचे के “लॉन्ग डिस्टेंस रिलेशनशिप” निभती थी. उस ज़माने में आँखें बाकायदा चार हुआ करती थी. इस गंभीर वाले अनबोले प्यार से इतर हाई स्कूल और कॉलेज वाला प्यार भी खूब प्रचलित हुआ करता था. आइसक्रीम की डंडियाँ “फर्स्ट फ्लाइट कूरियर” से भी सरपट प्रेमपत्र पहुंचाने का काम करती थी.

ये उस वक़्त की कहानी है जब सारी दुनिया से लताड़े जाने के बावजूद प्यार में खूब मासूमियत बची थी और ये अपने भोलेपन के साथ लड़के लड़कियों की ज़िन्दगी को सपनीला बनाने के काम में मुस्तैदी के साथ जुटा था.

अपनी ये लड़की उसी जमाने की थी. तो कहानी कुछ यूँ शुरू हुई कि उसके माँ बाप ने उसकी जिद्द के आगे झुककर उसे एक साइकिल खरीद कर दी. लड़की उसी से कॉलेज आने जाने लगी. फिर एक दिन खुद को सायरा बानो बूझते हुए वह “मैं चली मैं चली देखो प्यार की गली...” गुनगुनाते हुए जा रही थी. आमतौर पर कहानियों में लड़का लड़की से टकराता है. लेकिन यहाँ पर अपनी इस लड़की ने ही सामने से आते एक लड़के की साइकिल को ठोक दिया. आमतौर पर इसके आगे यूँ होता कि लड़की आँखें तरेरते हुए लड़के की खूब खबर लेती और लड़का कुछ कुछ फ़िल्मी से अंदाज़ में माफ़ी मांगता. पर यहाँ हुआ ठीक उल्टा. लड़की घबरा गयी और फ़ौरन साइकिल से उतरते हुए खुद ही लड़के को “सॉरी” बोल पड़ी. लड़का कहना तो बहुत कुछ चाहता था लेकिन उसका घबराया हुआ चेहरा देखकर शांत हो गया और कुछ न बोला. लड़की चुपचाप साइकिल लेकर घर की तरफ चल पड़ी. उसे ये बिलकुल भी मालुम न चला कि लड़का चोरी चोरी धीरे धीरे पैडल मारता हुआ उसके घर का रास्ता देख रहा है. खैर, लड़की अपने घर सही सलामत पहुँच गयी और लड़के ने उसकी गली को याद कर लिया.

कहानी यहाँ से शुरू होती है.

उसके बाद लड़की ने कई बार उस लड़के को अपनी गली में देखा. वह उसे देखकर घबरा जाती थी. उसे डर था कि कही वह लड़का उसके पापा से उसकी शिकायत करने तो नहीं आया. या फिर शायद उसकी साइकिल का कोई अंजर पंजर टूट गया था जिसकी कीमत वसूलने आया हो. लेकिन ऐसा कुछ न हुआ. लड़का बस उस गली के चक्कर लगाता और लड़की से नज़रे टकराने पर मुस्कुरा देता. लड़की बड़ी भोंदू थी. कुल मिलाकर ४३ चक्करों के बाद उसे लड़के की मंशा समझ में आई और यह सोचकर ही उसके गाल लाल हो उठे. तो जब लड़का अगले चक्कर के वक़्त उसे देखकर मुस्कुराया तो वह भी मुस्कुरा दी. लड़के की तो बल्लियाँ उछलने लगी. प्रेम दोतरफा जो हो गया था. उसके बाद लड़का जब भी चक्कर लगाता तो “तुझको पुकारे मेरा प्यार...” गाता हुआ निकलता तो लड़की उसकी आवाज़ सुनते ही कभी कथरियाँ सुखाने तो कभी देहरी से आवारा कुत्तो को भगाने के बहाने बाहर निकलती. दोनों एक दुसरे को देखते. लड़का मुस्कुराता और लड़की शरमा जाती. फिर लड़का कालर सीधा करता हुआ “मेरी नींदों में तुम, मेरे ख़्वाबों में तुम...” गाता हुआ निकल जाता. उस जमाने  में यही “डेटिंग” हुआ करती थी.

कहानी यहाँ ख़त्म नहीं होती.

इसके आगे कहानी में बहुत कुछ होने की संभावना थी लेकिन संभावना हमेशा संभावना ही बनी रही. चक्कर लगाते, फ़िल्मी गाने गाते, रिझाते और शर्माते साल बीता और लड़की की शादी कहीं और हो गयी. लड़की उस जमाने की थी. वह चुप्पी मार कर पति, बच्चों और घर गृहस्थी में रम गयी और किसी को कभी कुछ पता न चला. हाँ, लड़के के घर के टेप रिकॉर्डर में “भँवरे ने खिलाया फूल, फूल को ले गया राजकुंवर...” कई महीनों तक बजता रहा. फिर वह भी शांत हो गया. और इस तरह मोहल्ले की ये प्रेम कहानी दुनियादारी की भेंट चढ़ गयी.

अगर हमारा बस चले तो हम ‘इफ़ेक्ट’ के लिए बैकग्राउंड में “दो दिल टूटे दो दिल हारे...” भी बजवा दे...

लेकिन कहानी यहाँ भी ख़त्म नहीं होती.

कई साल बीत गए. लड़का और लड़की अब नाती पोते वाले होने को है. लड़की जब कभी मायके आती है तो बाज़ार जाते हुए जिस जगह पर उस लड़के की साइकिल को ठोका था उस जगह पर पहुँचते ही उसके चेहरे पर ठीक वैसी ही मुस्कान आ जाती है जो उस लड़की के गली से गुजरते हुए लड़के के चेहरे पे आती है. इस मुस्कान से इन दोनों का बड़ा पुराना रिश्ता सा बन गया है. और जिन पुराने गानो को सुनते हुए लड़का मुस्कुरा दिया करता है उन्हें सुनकर लड़की आज भी शरमा जाती है.

कहानी यहाँ भी ख़त्म नहीं होती. दरअसल ये कहानी ख़त्म ही नहीं होती. क्यूंकि उस जमाने की प्रेम कहानियाँ कभी ख़त्म ही नहीं होती... कुछ तो था उस जमाने में और उस जमाने की प्रेम कहानियों में... क्यूंकि ये उन दिनों की कहानी है जब प्यार एसएमएस और इन्टरनेट का मोहताज नहीं हुआ था...


[चित्र: गूगल से साभार]


© स्नेहा राहुल चौधरी 

Saturday, February 2, 2013

छोड़िये इस बात की चर्चा बेमानी है ......

छोड़िये  इस बात की चर्चा बेमानी है 
किसका खून खून है, किसका खून पानी है 

जज्बातों को बेचकर उसने यह दौलत पाई है 
अब इस जहाँ में कौन उसका सानी है 

गरीबो के बच्चे कभी खूबसूरत नहीं होते 
इस दुनिया में बस दौलत का ही चेहरा नूरानी है 

हमारे  बस की बाते नहीं है ये सब 
इस दौलत से प्यार के किस्से और कहानी है 

उसकी नौकरी सिफारिशों के बीच दम तोड़ गयी 
अब उसे चोरी करने में क्यों शर्म आनी  है 

क्या फर्क उसके हाथो में बन्दूक हो या तलवार 
कौन जाने उसकी किस्मत में  भोजन कितना पानी है 

महसूस होते है जब किसी बेक़सूर के आंसू 
दिल सुलग उठता है बस इतनी परेशानी है 

छोड़िये इस बात की चर्चा बेमानी है 
किसका खून खून है किसका खून पानी है 

- स्नेहा गुप्ता 

Monday, January 21, 2013

ज़हरीले अल्फाज ....

क़त्ल कर दो उसका जिसका तुम्हे अंदाज़ पसंद नहीं 
जला डालो अंजाम को जब आगाज़ पसंद नहीं 

नोंच डालो उन परिंदों के पर 
खुली हवा में जिनकी परवाज़ पसंद नहीं 

हलक से खींच लो उस ज़ुबान को 
जिस हलक से निकली आवाज़ पसंद नहीं 

उसे ठोकर मारो ऐसी कि फिर सर कभी न उठ सके 
ग़र खुद्दारी से जीने का उसका मिज़ाज पसंद नहीं 

मत पूछो मेरे इन ज़हरीले अल्फाजों की वज़ह 
इस ज़िन्दगी में मुझे कोई हमराज़ पसंद नहीं 

- स्नेहा गुप्ता 
21/01/2013
00:45 A.M.

Monday, October 3, 2011

जाने किस बात से ...

जाने किस बात से है परेशान ज़िँदगी
नियामतोँ के बीच है वीरान ज़िँदगी

इक तरफ हालात ज़ख्मी से पड़े हैँ
और इधर इस शोहरत से है हैरान ज़िँदगी

होँठोँ से मुस्कुराहटेँ जुदा न हुईँ कभी
और ज़रा सी इक खुशी से रही अनजान ज़िँदगी

लफ़्ज़ोँ से कहानी शुरू हुई थी उसी दिन
जिस दिन से हो गई थी बेज़ुबान ज़िँदगी

हर पल की जंग, एक जद्दोजहद जीने की
ज़िँदादिल से हौसलेँ मगर बेजान ज़िँदगी

कोई ख्वाब भी देख लेँ, कुछ खयाल भी सजा लेँ
हो जाए ग़र एक पल को भी आसान ज़िँदगी

कुछ पल फुरसत के, कुछ लम्हेँ राहत के
तलाशती है एक सुकून भरी मुस्कान ज़िँदगी

कामयाबियोँ मेँ शामिल गुमनामियाँ भी होँगी
शायद बन जाएगी एक ग़मग़ीन दास्तान ज़िँदगी

किस पर करे यकीन, कौन समझे यहाँ
करे अपना दर्द किससे बयान ज़िँदगी

नफ़रत-ए-तकदीर की जकड़न से आज़ाद कौन करे
कैसे बने किसी का अरमान ज़िँदगी

Monday, May 9, 2011

परिचय...

इस मासूम ज़िँदगी की बस इतनी दास्तान है
सफ़र है बहुत लम्बा और अकेली नन्ही सी ये जान है

मेरी हँसी, मेरी खुशी, मेरी चाहत, मेरी बंदगी
इस सफ़र मेँ साथ मेरे बस यही कुछ सामान है

ये जो मेरी राहोँ मेँ बिछते रहे हैँ हमेशा
ये काँटेँ मेरे हौसलोँ से अनजान है

इस दिल को हालातोँ की बेरूखी की परवाह नहीँ
ये तो बस तकदीर की खामोशी से परेशान है

आँखोँ मेँ नमी आती जाती रहेगी
मगर साथ हमेशा मेरी ये मुस्कान है

है ये भरोसा की शाम ढ़लने से पहले
मिल ही जाएगा जो मेरा आसमान है

यूँ सदियाँ कट जाती है इसे तय करने मेँ
तुम साथ हो अगर तो ये सफ़र बहुत आसान है

इस मासूम ज़िँदगी की बस इतनी दास्तान है
अभी पंख खोले है मैनेँ अभी बाकी मेरी उड़ान है
(written by - Sneha)

i have created a page on facebook for my novel titled For What You Are. I request all of you to join it.
Thanks,
Sneha

Monday, April 25, 2011

घिर आई बदली ...

जब कभी कोई आशा किसी दुआ से सँभली
न जाने कहाँ से इन आँखोँ मेँ घिर आई बदली ....

उपवन मेँ भी झूमकर आई बहार
मौसमी के गीत पर खिला हरसिँगार
और गुलबहार जब हँस कर निखरी
चमन मेँ हर तरफ़ खुश्बू ही बिखरी
रजनीगंधा की जो ओस अचानक पिघली
न जाने कहाँ से इन आँखोँ मेँ घिर आई बदली ....

सुरमई शाम मेँ भी महका एक गीत
चंदा को छूकर झूमा संगीत
तारोँ को जैसे एक सुर मेँ है ढ़ाला
मद्धम मद्धम मुस्कुराती शशिबाला
अठखेली कर गुनगुनाई जो ये हवा पगली
न जाने कहाँ से इन आँखोँ मेँ घिर आई बदली ....

अप्रतिम, सुंदर, अद्भुत, मनभावन
मिट्टी की सोँधी खुश्बू से खिल उठा ये मन
बहते है कैसे कल कल कल कर
राहोँ के किनारे के छोटे छोटे निर्झर
क्यूँ ये बरखा आँसुओँ मेँ आ ढ़ली
न जाने कहाँ से इन आँखोँ मेँ घिर आई बदली ....
[written by - Sneha Gupta]

Friday, March 25, 2011

लिखना ज़रूरी है अभी ....

खामोश रहने की मजबूरी है अभी
ख्वाहिशेँ सारी अधूरी है अभी
ख्वाब सारे सच कहाँ हुए हैँ
हसरतोँ और किस्मत मेँ दूरी है अभी
खुल कर खेले तबस्सुम ये नियामत नहीँ मिली है
फ़क़त मुस्कुराने की मंज़ूरी है अभी
डर है कहीँ तुम भूल न जाओ मुझे
लिखते रहना मेरा ज़रूरी है अभी
[written by- Sneha Gupta]
GOD BLESS YOU
your true friend SNEHA