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Friday, September 23, 2016

उन दिनों की प्रेम कहानी...

ये उन दिनों की कहानी है जब प्यार एसएमएस और इन्टरनेट का मोहताज नहीं हुआ था. तब परदेस में कमाने वाले पतियों की घर संभालने वाली अपनी पत्नियों के साथ बगैर किसी लोचे के “लॉन्ग डिस्टेंस रिलेशनशिप” निभती थी. उस ज़माने में आँखें बाकायदा चार हुआ करती थी. इस गंभीर वाले अनबोले प्यार से इतर हाई स्कूल और कॉलेज वाला प्यार भी खूब प्रचलित हुआ करता था. आइसक्रीम की डंडियाँ “फर्स्ट फ्लाइट कूरियर” से भी सरपट प्रेमपत्र पहुंचाने का काम करती थी.

ये उस वक़्त की कहानी है जब सारी दुनिया से लताड़े जाने के बावजूद प्यार में खूब मासूमियत बची थी और ये अपने भोलेपन के साथ लड़के लड़कियों की ज़िन्दगी को सपनीला बनाने के काम में मुस्तैदी के साथ जुटा था.

अपनी ये लड़की उसी जमाने की थी. तो कहानी कुछ यूँ शुरू हुई कि उसके माँ बाप ने उसकी जिद्द के आगे झुककर उसे एक साइकिल खरीद कर दी. लड़की उसी से कॉलेज आने जाने लगी. फिर एक दिन खुद को सायरा बानो बूझते हुए वह “मैं चली मैं चली देखो प्यार की गली...” गुनगुनाते हुए जा रही थी. आमतौर पर कहानियों में लड़का लड़की से टकराता है. लेकिन यहाँ पर अपनी इस लड़की ने ही सामने से आते एक लड़के की साइकिल को ठोक दिया. आमतौर पर इसके आगे यूँ होता कि लड़की आँखें तरेरते हुए लड़के की खूब खबर लेती और लड़का कुछ कुछ फ़िल्मी से अंदाज़ में माफ़ी मांगता. पर यहाँ हुआ ठीक उल्टा. लड़की घबरा गयी और फ़ौरन साइकिल से उतरते हुए खुद ही लड़के को “सॉरी” बोल पड़ी. लड़का कहना तो बहुत कुछ चाहता था लेकिन उसका घबराया हुआ चेहरा देखकर शांत हो गया और कुछ न बोला. लड़की चुपचाप साइकिल लेकर घर की तरफ चल पड़ी. उसे ये बिलकुल भी मालुम न चला कि लड़का चोरी चोरी धीरे धीरे पैडल मारता हुआ उसके घर का रास्ता देख रहा है. खैर, लड़की अपने घर सही सलामत पहुँच गयी और लड़के ने उसकी गली को याद कर लिया.

कहानी यहाँ से शुरू होती है.

उसके बाद लड़की ने कई बार उस लड़के को अपनी गली में देखा. वह उसे देखकर घबरा जाती थी. उसे डर था कि कही वह लड़का उसके पापा से उसकी शिकायत करने तो नहीं आया. या फिर शायद उसकी साइकिल का कोई अंजर पंजर टूट गया था जिसकी कीमत वसूलने आया हो. लेकिन ऐसा कुछ न हुआ. लड़का बस उस गली के चक्कर लगाता और लड़की से नज़रे टकराने पर मुस्कुरा देता. लड़की बड़ी भोंदू थी. कुल मिलाकर ४३ चक्करों के बाद उसे लड़के की मंशा समझ में आई और यह सोचकर ही उसके गाल लाल हो उठे. तो जब लड़का अगले चक्कर के वक़्त उसे देखकर मुस्कुराया तो वह भी मुस्कुरा दी. लड़के की तो बल्लियाँ उछलने लगी. प्रेम दोतरफा जो हो गया था. उसके बाद लड़का जब भी चक्कर लगाता तो “तुझको पुकारे मेरा प्यार...” गाता हुआ निकलता तो लड़की उसकी आवाज़ सुनते ही कभी कथरियाँ सुखाने तो कभी देहरी से आवारा कुत्तो को भगाने के बहाने बाहर निकलती. दोनों एक दुसरे को देखते. लड़का मुस्कुराता और लड़की शरमा जाती. फिर लड़का कालर सीधा करता हुआ “मेरी नींदों में तुम, मेरे ख़्वाबों में तुम...” गाता हुआ निकल जाता. उस जमाने  में यही “डेटिंग” हुआ करती थी.

कहानी यहाँ ख़त्म नहीं होती.

इसके आगे कहानी में बहुत कुछ होने की संभावना थी लेकिन संभावना हमेशा संभावना ही बनी रही. चक्कर लगाते, फ़िल्मी गाने गाते, रिझाते और शर्माते साल बीता और लड़की की शादी कहीं और हो गयी. लड़की उस जमाने की थी. वह चुप्पी मार कर पति, बच्चों और घर गृहस्थी में रम गयी और किसी को कभी कुछ पता न चला. हाँ, लड़के के घर के टेप रिकॉर्डर में “भँवरे ने खिलाया फूल, फूल को ले गया राजकुंवर...” कई महीनों तक बजता रहा. फिर वह भी शांत हो गया. और इस तरह मोहल्ले की ये प्रेम कहानी दुनियादारी की भेंट चढ़ गयी.

अगर हमारा बस चले तो हम ‘इफ़ेक्ट’ के लिए बैकग्राउंड में “दो दिल टूटे दो दिल हारे...” भी बजवा दे...

लेकिन कहानी यहाँ भी ख़त्म नहीं होती.

कई साल बीत गए. लड़का और लड़की अब नाती पोते वाले होने को है. लड़की जब कभी मायके आती है तो बाज़ार जाते हुए जिस जगह पर उस लड़के की साइकिल को ठोका था उस जगह पर पहुँचते ही उसके चेहरे पर ठीक वैसी ही मुस्कान आ जाती है जो उस लड़की के गली से गुजरते हुए लड़के के चेहरे पे आती है. इस मुस्कान से इन दोनों का बड़ा पुराना रिश्ता सा बन गया है. और जिन पुराने गानो को सुनते हुए लड़का मुस्कुरा दिया करता है उन्हें सुनकर लड़की आज भी शरमा जाती है.

कहानी यहाँ भी ख़त्म नहीं होती. दरअसल ये कहानी ख़त्म ही नहीं होती. क्यूंकि उस जमाने की प्रेम कहानियाँ कभी ख़त्म ही नहीं होती... कुछ तो था उस जमाने में और उस जमाने की प्रेम कहानियों में... क्यूंकि ये उन दिनों की कहानी है जब प्यार एसएमएस और इन्टरनेट का मोहताज नहीं हुआ था...


[चित्र: गूगल से साभार]


© स्नेहा राहुल चौधरी 

Saturday, March 8, 2014

काश...

सुमि की हिम्मत नहीं हो पा रही थी कि वह अमर से कुछ कह सके... रुलाई गले में बांधे, आंसुओं को रोके वह खड़ी थी कि अमर कुछ कहे और बात शुरू हो..
लेकिन अमर ने कुछ नहीं कहा. वह चुपचाप उठा और किचन में चला गया. सुमि भी उसके पीछे पीछे गयी. अमर ने चाय की केतली गैस पर डाली थी. भुनभुनाता हुआ लाइटर ढूंढ रहा था.
“एक चीज़ सही से नहीं मिलती...” दांत पीसते हुए कहा उसने.
“मैं बना दूं चाय?” सुमि ने हिम्मत करके पूछा.
अमर ने कोई जवाब नहीं दिया. मानो उसने कुछ सुना ही नहीं. उसने सुमि की तरफ देखा भी नहीं.
माचिस से गैस जलाई और चाय बनाकर सीधा कमरे में आ गया. पहला घूँट जैसे ही गले में गया कि खुद को कोसने लगा – “पान वाले की दूकान पर चाय पीने में इज्जत घटती है...”
कप सहित उठा और चाय ले जा कर सिंक में बहा दी.
सुमि वही पर खड़ी चुपचाप सबकुछ देखती रही. अमर की झल्लाहट उससे बर्दाश्त नहीं हो रही थी. उसे समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर उसने ऐसा कौन सा गुनाह कर दिया कि अमर ऐसे बर्ताव करने लगा मानो उसका कोई वजूद ही नहीं है. सब्र का बाँध टूट गया और सुमि के गाल भींग गए...
वह खुद में ही खोयी थी कि देखा अमर जल्दी जल्दी तैयार होकर दफ्तर निकलने की तैयारी में था. झल्लाता हुआ कभी इधर कभी उधर जाता लेकिन सुमि से कुछ न कहता...
हिम्मत करके सुमि ने ही फिर पूछा – “कहो न? क्या ढूंढ रहे हो? मुझे मालुम है तुम्हारी चीज़े कहाँ रखी है.”
अमर एक पल को रुका और उसने चारो तरफ देखा लेकिन फिर से सुमि को नज़रंदाज़ कर गया. जैसे वो सामने थी ही नहीं... जैसे उसकी बातों का कोई मतलब ही नहीं था अमर के लिए. सुमि की आँखों से एक बार फिर अश्रुधारा बहने लगी...
तभी अचानक अमर का फ़ोन बजा. अमर ने उछलकर अपना मोबाइल दराज के पीछे से हाथ घुसा कर निकाला. अच्छा तो मोबाइल ढूंढ रहा था अमर. हाँ, अक्सर दराज से नीचे गिर जाता था अमर का मोबाइल. सुमि अक्सर कहती थी दराज के भीतर या फिर मेज पर मोबाइल रखने के लिए लेकिन अमर सुने तब तो..
मोबाइल को स्पीकर पर डालकर अमर जूते पहनने लगा. फ़ोन अमर के दोस्त का था.
“निकल गए अमर?” दोस्त ने पूछा.
“बस निकल रहा हूँ.” अमर ने परेशानी से जवाब दिया.
“क्या हुआ?” दोस्त ने पूछा.
“कुछ नहीं. कुछ हो तो खाने को ले लेना. आजा खाना नहीं खाया. चाय भी बहुत बुरी बनी थी.” अमर रोआंसा होकर कहा.

क्या??? अमर ने खाना नहीं खाया था? सुमि अवाक रह गयी थी. ये वो किस दुनिया में खो गयी थी कि उसने कुछ बनाया नहीं अमर के लिए! ऐसा कभी हुआ है कि अमर बिना खाये दफ्तर चला जाए..?

“अमर, दो मिनट रुक जाओ. मैं अभी कुछ बना देती हूँ.” सुमि ने घबरा कर कहा.

अमर के हाथ रुक गए. उसने फिर ऊपर देखा लेकिन सुमि से उसकी नज़रे नहीं टकराई. उधर उसका दोस्त फ़ोन पर हेल्लो हेल्लो किये जा रहा था.
“हेल्लो अमर? अमर? हेल्लो? क्या हुआ?”
“हाँ,” अमर का ध्यान फ़ोन पर गया. उसने स्पीकर बंद करके मोबाइल उठाया.
“क्या हुआ अमर?” दोस्त ने पूछा, “अचानक से खामोश हो गए थे?”



“पता नहीं...” अमर ने आह भरकर कहा, “इतना वक़्त हो गया सुमि को गुज़रे हुए लेकिन अब भी हर पल उसे महसूस करता हूँ...” अमर अपना बैग उठाकर दरवाजे की तरफ बढ़ चुका था.

“गुज़रे हुए....”

सुमि को लगा जैसे भूकंप आया हो और अचानक उसके सर पे पत्थर गिर पड़े हो. सारा घर घूमने लगा. आँखों के आगे अँधेरा छाने लगा. 

तभी उसकी नज़र सामने दीवार पर टंगी अपनी तस्वीर पर गयी. 

काश...! वह अपनी तस्वीर पर टंगी उस माला को हटा पाती...


निवेदन महिलाओं से – आप अपने परिवार की धुरी है. स्वास्थ्य सम्बन्धी छोटी बड़ी समस्याओं को नज़रंदाज़ न करे. अपना ध्यान रखे. अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस की हार्दिक शुभकामनायें...!

© स्नेहा गुप्ता 
08/03/2014 08:55pm

Thursday, June 27, 2013

एक ग़ज़ल

सोचती हूँ आज फिर एक ग़ज़ल की शुरुआत करूँ 
चंद अपने अल्फाजों से थोड़ी सी बात करूँ

न मालुम किस हाल में, कैसे हैं, कहाँ हैं 
अपनी हसरतों से आज फिर एक मुलाक़ात करूँ

रूखी सी ज़िन्दगी में ख्वाब अधूरे जो छूट गए
उन्हें संवारू, निखारू और ख़्वाबों से खयालात करूँ 

कि होंठ हो खामोश जब कहना हो बहुत कुछ 
तो फिर अपनी कलम से ही ज़ाहिर सब जज़्बात करूँ

- © स्नेहा गुप्ता
२७/०६/२०१३ 

Friday, May 3, 2013

दिवास्वप्न की पाती.....


सुनो,
तुम डराया न करो मुझे इस तरह..
मुझे डर लगता है
कभी तुम्हारी आँखों से
कभी तुम्हारी बातो से

फिर भी तुम्हे जानना चाहती हूँ
तुम्हे समझना चाहती हूँ
मुझे जानने दो
तुम्हे
समझने दो
तुम्हे सोचना मुझे अच्छा लगता है..


मैंने तुम्हे बताया नहीं कभी
तुम एक रहस्यमयी किताब से हो
तुम्हे पढ़ लेना चाहती हूँ
लेकिन अचानक नहीं
बल्कि हर पन्ना हर रोज़
थोड़ा थोड़ा करके
तुम्हे पढना मुझे अच्छा लगता है

मैंने तुम्हे बताया नहीं कभी
तुम एक बहुघातीय समीकरण से हो
कभी तुम्हे सुलझा लेना चाहती हूँ
कभी यूं ही उलझ कर रह जाना चाहती हूँ
सुलझ कर उलझ जाना मुझे अच्छा लगता है

मैंने तुम्हे बताया नहीं कभी
कि तुम धुंध कि तरह छाये हो मेरी ज़िन्दगी में
और
धुंध में भटकना मुझे अच्छा लगता है

मैंने तुम्हे बताया नहीं कभी
कि मैं जानती हूँ
कि तुम कभी सुनोगे भी नहीं
कभी पलटकर देखोगे भी नहीं
फिर भी तुम्हे पुकारना मुझे अच्छा लगता है

मैंने तुम्हे बताया नहीं कभी
कि मुझे मालुम है
कि तुम्हारी चाहत वो हसीं दुनिया है
जो तुम्हारे आगे है
और तुम्हारी ख़ुशी में ही खुश होना मुझे अच्छा लगता है

मैंने तुम्हे बताया नहीं कभी
कि ऐसे सैकड़ो ख़त मैंने लिख डाले है तुम्हे
जो तुम कभी पढोगे भी नहीं
और मेरे अलावा कोई तुम्हे लिखेगा भी नहीं
फिर भी ...........
.............. अच्छा लगता है......



 - स्नेहा गुप्ता
 03/05/2013 09:30PM

Friday, March 1, 2013

अब आपसे मिला नहीं करेंगे .......

 आपसे किसी बात का गिला नहीं करेंगे 
वादा रहा अब आपसे मिला नहीं करेंगे 

आपको हमने यूँ तो हैरान बहुत किया 
बेसबब बेवज़ह परेशान बहुत किया 
ख्यालो से अब आपके खिला नहीं करेंगे 
वादा रहा अब आपसे मिला नहीं करेंगे 

 जिंदगी हसीन थी जिंदगी हसीन है 
बात लेकिन ये बेहद ज़हीन है 
इस बात में मगर हम घुला नहीं करेंगे 
वादा रहा अब आपसे मिला नहीं करेंगे 

आपकी चाहत की मन्नतें न सही 
तक़दीर में अपनी जन्नतें न सही 
मोम बनकर हम जला नहीं करेंगे 
वादा रहा अब आपसे मिला नहीं करेंगे 

मिल जाये कोई नियामत भी शायद 
क्या पता हो जाये मुहब्बत भी शायद 
मुस्कुरायेंगे हमेशा , होठों को सिला नहीं करेंगे 
मगर वादा रहा अब आपसे मिला नहीं करेंगे ...........

- स्नेहा गुप्ता 
01/03/2013
00:30AM


Tuesday, May 15, 2012

टूटी हुई चप्पल

ऑफिस से निकलते ही किरण को महसूस हो गया था की अब ज्यादा देर चल पाना मुमकिन न हो पायेगा. वह चप्पल घिसट कर लेकिन बड़ी संभल कर चल रही थी. कही टूट न जाए. लेकिन बमुश्किल १०-१५ कदम ही चली होगी की चप्पल टूट गयी. बड़ी हताशा से उसने अपनी टूटी हुई चप्पल को देखा. खामखाँ का खर्च लग गया. अभी करीब एक महीने तक और उस चप्पल को चला लेने की योजना थी उसकी. लेकिन...

चप्पल को सिलवाने के लिए वह नुक्कड़ की तरफ मुड़ गयी.

"८० रुपये लगेंगे, बब्बी." चप्पलवाले ने चप्पल का निरीक्षण करते हुए कहा.

"८० रुपये???" किरण चौंक गयी, "चौक वाले तो ५० रुपये में सिल देते है. क्या हमें बेवकूफ समझते हो? अच्छी लूट मचा रखी है." उसने चप्पलवाले को घुड़कते हुए कहा.

"तो जाओ न बब्बी, चौक वाले से ही सिलवा लो. हमारा टाइम काहे को फ़ोकट में खराब करती हो." चप्पलवाले ने भी तुनक कर जवाब दिया.

किरण असमंजस में पड़ गयी. चौक तक जाने में १० मिनट और फिर आने में १० मिनट यानी लगभग आधा घंटा तो लग ही जाएगा. लेकिन तीस रुपये तो बच जायेंगे. तीस रुपये का मोबाइल रिचार्ज करवा ले तो १० दिन तो चल जाएगा. या फिर वह  उनसे किलो की ४ कापियां कमलेश के लिए ले सकती है.

फिर सोचने में वक़्त नहीं गंवाया किरण ने. टूटी हुई चप्पल उठा कर वह तेज़ कदमो से चौक की तरफ चल पड़ी. नुक्कड़ का चप्पल्वाला उसे देखता रहा. शायद उसे उम्मीद न थी की ये लड़की शाम के वक़्त सिर्फ चप्पल सिलवाने के लिए चौक तक जाने की ज़हमत उठाएगी. उसे पूरी उम्मीद थी की वह मनमाना दाम वसूल लेगा. लेकिन किरण को जाते हुए देखकर वह भौचक्का रह गया. एक ग्राहक खो दिया उसने. ८० के चक्कर में ५० भी गए. उसे बुलाने की हिम्मत भी नहीं जुटा सका वह.

चप्पल सिलवा कर किरण तेज़ी से स्टेशन की तरफ बढ़ रही थी. कीले लगने से चप्पल भारी हो गयी थी. किरण को चलने में बेहद तकलीफ हो रही थी. कीलो से चोट भी लग रही थी उसके पैरो में. लेकिन वह खुश थी की उसने ३० रुपये बचा लिए थे.

ऑटो में बैठते ही उसकी नज़र सूरज पर पड़ी. सूरज उसे ही देख रहा था. जैसे ही किरण ने उसे देखा, उसने मुस्कुरा कर ख़ुशी से अपना हाथ हिला दिया. जवाब में किरण मुस्कुराई. सूरज से उसकी मुलाक़ात यही कोई एक डेढ़ साल पहले हुई थी "युवा कला प्रोत्साहन मंच" द्वारा आयोजित कला प्रदर्शनी में. इत्तेफाक ऐसा की सूरज उस लड़की को ढूंढ रहा था जिसने कैनवास पर रंगों को सजीव कर दिया था और किरण को उस लड़के को ढूंढ रही थी जिसने केवल पेंसिल से एक रेखाचित्र को एक शब्दचित्र बना दिया था. चित्रकार दोनों ही थे लेकिन विधाएं अलग थी और दोनों एक दूसरे की कला के मुरीद हो गए. दोनों मिले और काफी अच्छे दोस्त भी बने. सूरज भी किरण की ही तरह मध्यमवर्गीय परिवार का लड़का था. वह दानापुर में रहता था और किरण आजादनगर में. बाद में किरण को पता चला की सूरज ने अच्छी खासी नौकरी छोड़कर अशोक राजपथ में अकादमिक किताबों और स्टेशनरी की दूकान खोली थी. अपनी जिद के पक्के और जुनूनी सूरज ने जो सोचा था वह कर दिखाया और आज वह अपनी नौकरी की तनख्वाह का दुगुना पैसा अपनी दूकान से कमा रहा था. ज़रा भी बनावटीपन नहीं था सूरज में. बेबाक ऐसा की जो बात दिल में वही बात जुबां पर. उसपर भी स्वभाव से बेहद जिंदादिल और खुशमिजाज़.  किरण को उसकी यही बाते बहुत अच्छी लगती थी. सूरज के दोस्त भी गिने चुने थे और उन्ही में से एक किरण भी थी. हालांकि आपाधापी भरी ज़िन्दगी में बाते कहा हो पाती थी उतनी. स्टेशन से दोनों ही गाडी पकड़ते थे. कभी सूरज नहीं तो कभी किरण नहीं. और कभी ऐसा हो जाए की दोनों एक दूसरे को देख ले सूरज मुस्कुरा कर हाथ हिला देता और किरण भी मुस्कुरा देती. बस ऐसे ही मिलना होता था उन दोनों का. हाँ महीने दो महीने में कभी ऐसा हो जाए की वक़्त भी हो और दोनों साथ भी तो बगल वाले चाय की दूकान पर एक कप चाय पी लेते और दो-चार बाते भी हो जाती.

सूरज के बारे में सोचते सोचते कब घर आ गया किरण को पता भी नहीं चला. ज़ल्दी से ऑटो वाले को पैसे देकर वह घर की और भागी. वैसे ही आधा घंटा देर से पहुंची थी. अन्दर पहुँचते ही उसे रसोई से आवाज़े सुनाई दी. रसोई में पहुँच कर उसने देखा, कमलेश कलछी से सब्जी चला रहा था और माँ पर झल्ला रहा था. माँ आटा निकाल रही थी और किरण पर झल्ला रही थी. बिना कपडे बदले ही किरण ज़ल्दी से रसोई में दाखिल हुई और उसने कमलेश के हाथ से कलछी ले ली. कमलेश पैर पटकता हुआ अपने कमरे में चला गया.

" कितनी बार कहा है की ज़रा ज़ल्दी घर आया कर. लेकिन नहीं. बहाना ढूंढती चलती है काम से बचने का." माँ के स्वर में नाराजगी थी.

"आज ज़रा देर हो गयी." किरण ने कहा, "तुम जाओ माँ, मैं गूंध लुंगी." किरण ने माँ के हाथ से आटे की पतीली ले ली.

"आज ही दो सूट देने है." माँ थकी हुई सी आवाज़ में बोली और रसोई से चली गयी.

सब्जी में पानी की बघार डाल कर किरण ने ज़ल्दी से कपडे बदले और आटा गूंधते हुए चाय भी चढ़ा दी गैस पर.

दो कप में चाय निकाल कर वह कमरे में पहुंची. माँ सूट पर काज कर रही थी.

"तैयार हो गयी?" किरण ने पूछा.

"अभी कहा?" माँ सचमुच थकी हुई थी, "अभी दूसरी वाली में हेम करना है."

"कर लो तुम, बस रोटी बनानी है अब." किरण बोली.

खाना खाकर माँ सूट देने के लिए चली गयी. किरण अपने कमरे में अपने कपडे सहेज रही थी की तभी कमलेश अन्दर आया, "जीजी, पैसे चाहिए." धीमी आवाज़ में बोला.

"कितने?" किरण ने पूछा.

"५००."

"क्यूँ?"

"किताबे लेनी है."

"लिस्ट बना कर दे दो, मैं लेती आउंगी कल."

कमलेश कुछ देर चुपचाप बैठा रहा, फिर धीरे से बोला, "माँ के पैसे खर्च हो गए. मैं जब कमाने लगूंगा तब तुम्हारे सारे पैसे लौटा दूंगा."

"ये देखा है क्या है?" किरण ने थप्पड़ दिखाते हुए कहा, "एक लगेगा तो सारा भूत उतर जाएगा दिमाग पर से. जा चुपचाप जाकर लिस्ट लेकर आ किताबो की."

कमलेश हँस पड़ा. किरण भी हंसी.

"प्रदीप का नया एडिशन आया है. फिसिक्स और केमेस्ट्री चाहिए."

"जो जो चाहिए लिख कर दे दो." किरण बोली.

कमलेश अपने कमरे में चला गया. और किरण अपनी पेंटिंग करने लगी. यह तस्वीर उसे परसों तक बना कर दे देनी थी. पर बहुत काम बचा हुआ था. टूटी हुई चप्पल के कारण पैरो में भी बहुत दर्द हो रहा था उसके. लेकिन काम कैसे छोड़ दे. इसी पेंटिंग के दो हज़ार मिलाने वाले थे.

अगले दिन ऑफिस पहुँचते ही किरण ने अपनी चप्पले उतर कर देखा. पैरो की त्वचा छिल गयी थी. "ये नाजुकता रईसों के लिए है. हमारे लिए नहीं." ज़रा सा चिढ़कर उसने खुद से कहा.

बाबूजी का फ़ोन आया हुआ था. उन्होंने १०,०००/- भेजे थे. बैंक भी जाना था. भला हो ईशान बाबु का. उनके रहते किरण को परेशानी नहीं होती थी बैंक
में. ईशान बाबु बहुत भले आदमी थे. अपनी नेकदिली के कारण मशहूर थे. ऑफिस से आधे दिन की छुट्टी लेकर वह सीधे खजांची रोड की तरफ गयी. शर्माजी उसे देखकर हँसते हुए बोले, "मुझे मालुम था की तुम आओगी. अभी कल ही कमलेश किताबे देखकर गया था."


"हाँ, ये लिस्ट है. ये किताबे निकाल दीजिये, चाचाजी." किरण भी मुस्कुरा कर बोली.


"लो, ३०% की काट दी है." शर्मा जी बोले.


किताबो का बण्डल उठाकर किरण ने पैसे दिए और कृतज्ञता जताते हुए बोली, "आप लोग ही है चाचाजी की हम जैसे लोग इतनी महंगाई के बावजूद पढ़ पा रहे है."


"पढने वालो को मैं भी पहचानता हु, बेटा. कमलेश खूब तरक्की करेगा, देखना."

ऐसे ही कई लोग थे जिनकी वज़ह से किरण के कुछ काम आसान हो जाया करते थे. शर्माजी जहा औरो को १०% से ज्यादा डिस्काउंट नहीं करते थे वही किरण को वह हमेशा ३०% डिस्काउंट पर किताबे देते थे. बैंक में भी ईशान बाबु की बदौलत उसे पैसे ज़ल्दी मिल गए. बाहर आते ही उसने बाबूजी को फ़ोन लगाया, "पैसे मिल गए, बाबूजी."


"ठीक, माँ को दे दो जाकर." बाबूजी ने कहा.


"बाबूजी," किरण ने झिझकते हुए कहा, "वो पिछले महीने कमलेश की फीस के लिए सरिता से ४,०००/- उधार लिए थे. अभी सिर्फ २,०००/- ही लौटाए है. इसमें से एक हज़ार ले लू? बाकी एक हज़ार अगले महीने दे दूंगी."


बाबूजी खामोश हो गए. कुछ देर तक चुप रहने के बाद बोले, "तुमसे कोई बात छुपी नहीं है, बेटा. जो सही लगे करना."


"ठीक ठीक." किरण तुरंत बात समझते हुए बोली, "सरिता समझती है. मैं अगले महीने ही दे दूंगी उसका हिसाब. आप बिलकुल चिंता मत किजिए बाबूजी."


बाबूजी का कलेजा भर आया.

माँ को पैसे थमाकर किरण अपनी तस्वीर पूरी करने बैठ गयी. अंतिम दिन बचा था. गनीमत थी माँ ने दिन में ही सब्जी बना ली थी. घर में पाव रोटी थी. किरण तस्वीर बनाती रही. पर लग नहीं रहा था की पूरी हो पाएगी कल तक. शाम हो गयी. और शाम से रात.


अगले दिन रविवार था. सुबह से ही किरण तस्वीर बनाने में जुटी रही. उसे ध्यान तब टूटा जब माँ एक सूट लिए उसके पास आई.


"कैसा है?" माँ ने पूछा.


"अच्छा है." किरण बोली, "कपडा तो मुलायम है. रंग भी खूबसूरत है. बहुत महंगा लगता है."


"सिर्फ ५०० का है." माँ बोली.


"किसका है?" किरण ने पूछा.


"है एक किरण नाम की लड़की. चित्रकार है. उसी का है. उसकी माँ ने ख़रीदा है उसके लिए." माँ मुस्कुरा रही थी.


"मेरे लिए!" किरण हैरानी से बोली, "लेकिन इतने पैसे कहा से बचाए?"


"कल भेजे थे न बाबूजी ने."


किरण ख़ुशी के मारे कुछ बोल न सकी. बच्चे माता पिता के हृदय का सार कब जान सके है!!

तस्वीर पूरी न हो पाएगी किरण को लगा. उसने वर्माजी को फ़ोन किया.


"लेकिन करार तो आज का ही था किरण. मैंने सिंघानिया साहब को बोल दिया है की आज उन्हें तस्वीर मिल जायेगी." वर्मा जी परेशानी भरे स्वर में बोले.


" मैं कल सुबह खुद आपके पास लेकर आ जाउंगी." किरण ने मिन्नत की.
वर्मा जी कुछ देर खामोश रहे. "ठीक है, आज शाम ६ बजे तक दे दो." और फ़ोन कट गया.


दिन के एक बज रहा था. किरण ने एक ग्लास पानी पिया और फिर से अपनी तूलिका उठा ली.


और आखिरकार ५ बजते बजते तस्वीर पूरी हो गयी. किरण ने उसको कपडे से ढंका और चल पड़ी वर्माजी के घर.


"बहुत अच्छे किरण." वर्मा जी बोले, "ये लो तुम्हारे पैसे."


किरण ने पैसे लेकर उसको पहले आँखों से फिर माथे से लगाया.


"एक नया कांट्रेक्ट है किरण." वर्माजी बोले, "सात सफ़ेद घोड़े शाम के समय पानी में दौड़ते हुए. ६०००/-"


"कब तक?" किरण ने पूछा.


"१० दिन."


"ज़रूर." किरण ख़ुशी से बोली.

ओह्ह! ये टूटी हुई चप्पल! किरण की इच्छा हुई की कीले निकाल कर फ़ेंक दे. मगर क्या करती! अचानक  उसे ध्यान आया की उसने सुबह से कुछ नहीं खाया है.


लिट्टी वाले के ठेले के पास खड़े होकर उसने पूछा, "एक प्लेट कैसे?"


"५० रुपये." लड़के ने जवाब दिया.


"५० रुपये??" किरण को झटका लगा, "कल तक ही तो ४० था आज ५० हो गया. अंधेर मचा रखा है. खूब कमाते हो तुम लोग. खूब लूटते हो."


"हाँ, हाँ. हम लोग ही तो लूटते है. ये जो नेता करोडो अरबो लूट कर खाते है उनको कोई कुछ नहीं कहता. लेकिन हम ५ रुपये कमाई के रखे तो अंधेर मच जाता है. एक लिट्टी पर मुश्किल से दो रुपये बचते है. और उस पर हम लोग ही लूटेरे है." लड़का शायद भरा बैठा था, किरण के बोलते ही फूट पड़ा.
किरण को उसकी आवाज़ में अपनी बात सुनाई दी. "अच्छा, एक प्लेट लगा दो, भाई." वह बोली. उसे सचमुच 
जोर की भूख लग गयी थी.


वह पैसे निकाल रही थी की लड़के ने प्लेट उसके सामने रख दी.


"५ लिट्टियाँ? एक प्लेट की तो ४ आती है न?" किरण ने आश्चर्य से पूछा.


"खा लो दीदी. आशीर्वाद दे दो." लड़के ने स्निग्ध वाणी से कहा.


किरण को दया हो आई उस पर. सारे दिन धुप में खड़े होकर लिट्टियाँ बनाता और बेचता था वह. फिर दिल में इतनी दया और इतनी इंसानियत.


"मौर्यालोक से भी बड़ा होटल होगा एक दिन तुम्हारा, देखना." किरण मुस्कुरा कर बोली. लड़के के चेहरे पर भी हंसी आ गयी.

घर की तरफ जा ही रही थी की न जाने क्या इच्छा हुई की किरण गंगा घाट की तरफ मुड़ गयी. गंगा आरती में वक़्त था अभी. घाट पर ज्यादा लोग भी नहीं थे. किरण चप्पले उतार कर अपने पैर पानी में डाल कर बैठ गयी. ठन्डे पानी के स्पर्श ने उसके ज़ख़्मी पैरो पर मरहम का काम किया.
उसे लगा की उसकी ज़िन्दगी भी तो इस कीले लगी हुई टूटी चप्पल के ही जैसी थी. भारी और तकलीफदेह. इसके विपरीत कितना शांत था गंगाजी का पानी. कितना सुकून था वहाँ पर. इसी सुकून की तो किरण को भी तलाश थी. थोडा सुकून जिसके साथ वह अपनी परेशानियां भूल जाए. बहुत ज्यादा आरामतलब जीवन नहीं चाहिए था उसे. बस थोड़े सुकून के पल ज्यादा हो. और क्या. 

वह चप्पले पहन कर चलने को हुई की तभी एक छाया  देखि. पीछे कोई खड़ा था.

"सूरज तुम?" वह हैरान थी उसे देखकर, "कब आये?"


"अरे मैं तो काफी देर से हु." सूरज हंसकर बोला. "अरे" उसका तकियाकलाम था. हर बात की शुरुआत वह "अरे " से करता था. "अरे, आओ बैठो कुछ देर, फिर चले जाना."


किरण मना नहीं कर पायी.


"अरे, और सब कुछ कैसा चल रहा है?" सूरज ने ही पूछा.


"ठीक है सब." किरण बोली, "नया कांट्रेक्ट मिला है." किरण ने अपनी तकलीफों के बारे में सूरज को कुछ नहीं बताया था. उसे पसंद नहीं था अपना दुखड़ा रोकर किसी की दया बटोरना. "तुम बोलो." उसने सूरज से पूछा.


"अरे मेरा भी सब ठीक. अभी परीक्षा है न. पीक सीजन है. जिस्ता की डिमांड ज्यादा है."


"अच्छी बात." किरण बोली.


"अरे, मैं तो भूल ही गया." अचानक सूरज बोला, "ये देखो, मैंने तुम्हारी तस्वीर बनायी थी." कहते हुए उसने एक कागज़ अपनी शर्ट की जेब से निकाल कर किरण के हाथ में थमा दिया.


किरन ने देखा, उसका रेखाचित्र था. वह सम्मोहित सी देखने लगी.


"तुम्हारी आँखे बनाने में सबसे ज्यादा वक़्त लगा. तुम्हारे जैसी आँखे बन ही नहीं पा रही थी. बहुत कोशिशो के बाद बनी. तुम नाराज़ तो नहीं हो न?"
 

नाराज़ क्यों न हो? सूरज की हिम्मत कैसे हुई उसकी तस्वीर बनाने की? वह भी उससे बिना पूछे? किरण के जी में यही सवाल आने को थे. लेकिन आ नहीं रहे थे. उसे चाहकर भी गुस्सा नहीं आया सूरज पर.
 

"कितना वक़्त बर्बाद किया इस पर?" उसने एक अजीब सा सवाल पूछा सूरज से.


"बर्बाद? अरे, तुम्हारी बहुत सारी तस्वीरे बनायीं है मैंने. लेकिन यह तस्वीर सबसे अच्छी है. इसलिए इसे हमेशा अपने साथ रखता हु. कई दिनों से सोच रहा था तुम्हे दिखाने के लिए. लेकिन वक़्त ही नहीं मिल पा रहा था. इत्तेफाक से देखो की आज मिल गयी तुम. और इस तस्वीर को तो पूरी रात जाग कर बनाया है मैंने. मैंने कहा न बहुत मेहनत लगी इसे बनाने में."

किरण हैरानी से सूरज को देख रही थी. उसे लगा की उसकी टूटी हुई चप्पल, जो कीले लगने से भारी हो गयी थी, अचानक बिलकुल हलकी हो गयी है....
 






Friday, April 13, 2012

खामखाँ सी ज़िँदगी






खामखाँ उन राहोँ

की रहगुज़र रखना

खामखाँ हर एक

बात की खबर रखना

खामखाँ की बातेँ

खामखाँ के सपने

खामखाँ पराए

लगने लगते हैँ अपने

फिर उनका यूँ बातेँ बनाना

और उसपर भी अंदाज़ शायराना

फिर करके गुस्ताखी

खामखाँ मुस्कुराना

ग़र मुमकिन नहीँ तकदीरेँ बनाना

खामखाँ फिर क्योँ तस्वीरेँ बनाना

शुक्र है खुदा का

हुई न मुलाकातेँ

खामखाँ बढ़ जाती

फिर ये सारी बातेँ

खामखाँ है फिर भी

इनका ज़ेहन मेँ आना

दुखती ज़िँदगी को

खामखाँ फिर दुखाना

हैँ बड़ी ही ये नाज़ुक

खामखाँ दर्द सहेँगी

टूटे सपनोँ की कड़ियाँ

जब आँखोँ को चुभेँगी

खामखाँ रो पड़ेँगी

खामखाँ ऐसी किस्मत

खामखाँ ऐसी चाहत

खामखाँ फिर किस्मत की

इनायत की हसरत

वे कहते हैँ किस्मत को

खामखाँ है सोचना

तकदीर को अपने ही

हाथोँ से तुम लिखना

खामखाँ ये उम्मीदेँ

बढ़ती ही गई

खामखाँ वे न समझे

कि मैँ हूँ वही

खामखाँ बन गई एक

कहानी अनकही हूँ

इक इंसान हूँ मैँ भी

फ़रिश्ता नही हूँ

खामखाँ ये लफ़्ज़

खामखाँ ये ग़ज़ल

खामखाँ सी ज़िँदगी

हो गई है आजकल



- स्नेहा गुप्ता

07/04/2012

09:30 P.M.

Monday, April 25, 2011

घिर आई बदली ...

जब कभी कोई आशा किसी दुआ से सँभली
न जाने कहाँ से इन आँखोँ मेँ घिर आई बदली ....

उपवन मेँ भी झूमकर आई बहार
मौसमी के गीत पर खिला हरसिँगार
और गुलबहार जब हँस कर निखरी
चमन मेँ हर तरफ़ खुश्बू ही बिखरी
रजनीगंधा की जो ओस अचानक पिघली
न जाने कहाँ से इन आँखोँ मेँ घिर आई बदली ....

सुरमई शाम मेँ भी महका एक गीत
चंदा को छूकर झूमा संगीत
तारोँ को जैसे एक सुर मेँ है ढ़ाला
मद्धम मद्धम मुस्कुराती शशिबाला
अठखेली कर गुनगुनाई जो ये हवा पगली
न जाने कहाँ से इन आँखोँ मेँ घिर आई बदली ....

अप्रतिम, सुंदर, अद्भुत, मनभावन
मिट्टी की सोँधी खुश्बू से खिल उठा ये मन
बहते है कैसे कल कल कल कर
राहोँ के किनारे के छोटे छोटे निर्झर
क्यूँ ये बरखा आँसुओँ मेँ आ ढ़ली
न जाने कहाँ से इन आँखोँ मेँ घिर आई बदली ....
[written by - Sneha Gupta]

Friday, March 25, 2011

लिखना ज़रूरी है अभी ....

खामोश रहने की मजबूरी है अभी
ख्वाहिशेँ सारी अधूरी है अभी
ख्वाब सारे सच कहाँ हुए हैँ
हसरतोँ और किस्मत मेँ दूरी है अभी
खुल कर खेले तबस्सुम ये नियामत नहीँ मिली है
फ़क़त मुस्कुराने की मंज़ूरी है अभी
डर है कहीँ तुम भूल न जाओ मुझे
लिखते रहना मेरा ज़रूरी है अभी
[written by- Sneha Gupta]
GOD BLESS YOU
your true friend SNEHA

Wednesday, March 16, 2011

ये आँखेँ....

आँखोँ मेँ ख्वाब , ख्वाबोँ मेँ जन्नत है
आँखोँ ने माँगी रब से एक मन्नत है
आँखोँ मेँ बसती थोड़ी शरारत है
आँखोँ मेँ छुपी थोड़ी नज़ाकत है
आँखेँ जो देखे वो बहुत खूबसूरत है
आँखेँ ये इन्हीँ आँखोँ से हुई आहत है
आँखेँ ये दे जाती फिर भी, आँखोँ को बड़ी राहत है
आँखेँ अगर फ़िरा ली तो आ जानी कयामत है
आँखोँ मेँ ही कहीँ बस जाने की चाहत है
आँखेँ ये नसीब हो, क्या आँखेँ इतनी खुशकिस्मत है?
आँखेँ बयां कर देँगी वो जो हक़ीकत है
आँखोँ को झुकाकर रखने की ज़रूरत है
आँखोँ मेँ आखिर क्योँ इतनी इनायत है?
आँखेँ ये आखिर किसकी अमानत हैँ?