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Saturday, May 14, 2016

इश्क़

शरारतों से है, हिमाकतों से है..
ज़िद से है और मोहब्बतों से भी है


बेमुरव्वती से है, तिश्नगी से है
गुरूर से है और सादगी से भी है





तेवरों से है, नर्मियों से है

खूबियों से है और खामियों से भी है




इन लम्हों में इसे समेटूं तो कैसे,
हैं इश्क़ इतना ज़्यादा कि ज़िन्दगी कम पड़ जायेगी...


- स्नेहा राहुल चौधरी



[चित्र : गूगल से साभार ]

Wednesday, September 23, 2015

मोहब्बतें...

तुम्हें बहुत शिकायतें है न...?
कि मैं प्यार नहीं करता
तुमसे
कि मैं ध्यान नहीं रखता
तुम्हारा
कि मैं वक़्त नहीं निकालता
तुम्हारे लिए


मेरा अपनी चीज़ों को बिखेर देना
ताकि तुम उन्हें संवारो...
कुछ ज़रूरी काम भूल जाना
ताकि तुम याद दिलाओ...
तुम्हें बेवज़ह सताना,
कि मैं मनाऊं जब तुम रूठ जाओ...
तुम जानती हो न
कि ये प्यार नहीं तो क्या है....?


है तुम्हें पता और मुझे भी
कि रूमानियत कोई तोहफा नहीं है
कि ये कोशिश है एक आम ज़िन्दगी के
कुछ आम पलों को ख़ास बनाने की
एक दूसरे को अपनी ज़रूरत का एहसास दिलाने की


है तुम्हें पता और मुझे भी
कि रूमानियत कोई ज़िद नहीं है
कि ये तो बस एक विकल्प की चाह है
एक आम ज़िन्दगी से ऊब जाने की
या उसे प्यार से भरकर उसमे डूब जाने की


तो फिर कहो
कि तुम्हारी शिकायतें
तुम्हारी बेपनाह चाहतें है न...!
कि मेरी ये बेपरवाही
मेरी शरारतें है न...!
कि कुछ आम सी मगर बेहद खास
अपनी मोहब्बतें है न...!

© स्नेहा राहुल चौधरी 


[चित्र - गूगल से साभार ] 

Monday, September 1, 2014

चाँद की गुस्ताखी... शरारत चांदनी की...

अलसाया सा सूरज क्षितिज में खो गया 
कह के शब्बाखैर गुलमोहर भी सो गया
छिपते छिपाते मगर ‘कुछ’ कोने में भाग रहे है
जो सोये वो सोये मगर कुछ अब जाग रहे है 
ये रातरानी की अठखेलियों की घडी है 
करके नज़रें नीची रजनीगंधा हंस पड़ी है 
सुनने बैठे है सब एक दास्ताँ चाहत की
ये चाँद की है गुस्ताखी और शरारत चांदनी की...

पतंगों की हिदायत कि हर बात दायरे में हो
जुगनुओं की ज़िद कि बयान-ए-किस्सा मुशायरे में हो
लेकर करताल झींगुर शुरुआत करने पर तुले है
पत्तियों से लेकर सितारों तक के कान खुले है
दरी बिछाने को मेघों ने भेज दी है फुहारें
लकदक सी लहकती, उछलती, आई, बैठी बहारें
सुना है बड़ी ही अनोखी है ये कहानी मुहब्बत की
ये चाँद की है गुस्ताखी और शरारत चांदनी की...

फूल में बंद भँवरे की अब मिन्नतें कौन सुने
है बड़ी परेशानी कि ये किस्सा अब कौन बुने
भवें चढ़ाएं जाने क्यों कनेर अब खड़ी है
जाने किसके सर पे लगी हरसिंगार की छड़ी है
ठुनकती हुई जवाकुसुम भी देखो ज़िद पे अड़ी है
है बड़ी परेशानी ये फैसले की घड़ी है
पहले कौन बताये कब थी घड़ी नजाकत की
ये चाँद की है गुस्ताखी और शरारत चांदनी की...

गोरैया की बोली से भोर की दस्तक भी अभी हुई
अगली रात तक के लिए महफ़िल भी मुल्तवी हुई
समेट ली रजनीगंधा ने भी अपनी सारी पंखुड़ियां
उनींदी होकर गिर पड़ी अमलतास की पीली अन्कुरियाँ
है कैसा ये अनोखा किस्सा जिसके लिए सब लड़ पड़े है
नींद में भी सुनने को बेकल है सब कतारों में खड़े है
होगी नहीं कही भी कोई ऐसी चाहत खुबसूरत सी
जब चाँद ने की थी गुस्ताखी और शरारत चांदनी ने की...

- स्नेहा गुप्ता [26/05/2014, 09:30PM]

Saturday, May 18, 2013

आक्रोश


सल्फास खाकर जिंदा हैं
अजी, हम बड़े शर्मिन्दा हैं

जामों के छलकते बाँध में
डीयोडेरेंट की सड़ांध में
कूल डूड हॉट बेब हैं
मॉडर्निटी की छलकती पाजेब हैं
जज्बातों का बाज़ार है
इमोशनल अत्याचार है
दुःख का सीज़न गर्म है
दिल भी बड़ा ही नर्म हैं
महंगाई की चौहरी मार है
ईमानदारी भी बेरोजगार है
किरकेट का इसमें मेल नहीं
आई पी एल कोई खेल नहीं
अब मिलता कहाँ सुकून हैं
विश्वास का हो गया खून हैं
सच्चाई की चप्पल घिस रही है
चूल्हे में ममता पिस रही है
ऊपर शानदार मकान हैं
नीचे कोयले की खान हैं
रेलगाड़ी भी चल रही हैं
खूब पैसे उगल रही है
देखिये, कितना सज्जन ‘फेस’ है
वैसे सी.बी.आई. में दर्ज केस है
मगर पिंजरे में बंद परिंदा हैं

तेरे कातिल अभी तक जिंदा हैं
दामिनी, हम बड़े शर्मिन्दा हैं

-  -  स्नेहा गुप्ता  
  18/05/2013 8:25pm

Friday, May 3, 2013

दिवास्वप्न की पाती.....


सुनो,
तुम डराया न करो मुझे इस तरह..
मुझे डर लगता है
कभी तुम्हारी आँखों से
कभी तुम्हारी बातो से

फिर भी तुम्हे जानना चाहती हूँ
तुम्हे समझना चाहती हूँ
मुझे जानने दो
तुम्हे
समझने दो
तुम्हे सोचना मुझे अच्छा लगता है..


मैंने तुम्हे बताया नहीं कभी
तुम एक रहस्यमयी किताब से हो
तुम्हे पढ़ लेना चाहती हूँ
लेकिन अचानक नहीं
बल्कि हर पन्ना हर रोज़
थोड़ा थोड़ा करके
तुम्हे पढना मुझे अच्छा लगता है

मैंने तुम्हे बताया नहीं कभी
तुम एक बहुघातीय समीकरण से हो
कभी तुम्हे सुलझा लेना चाहती हूँ
कभी यूं ही उलझ कर रह जाना चाहती हूँ
सुलझ कर उलझ जाना मुझे अच्छा लगता है

मैंने तुम्हे बताया नहीं कभी
कि तुम धुंध कि तरह छाये हो मेरी ज़िन्दगी में
और
धुंध में भटकना मुझे अच्छा लगता है

मैंने तुम्हे बताया नहीं कभी
कि मैं जानती हूँ
कि तुम कभी सुनोगे भी नहीं
कभी पलटकर देखोगे भी नहीं
फिर भी तुम्हे पुकारना मुझे अच्छा लगता है

मैंने तुम्हे बताया नहीं कभी
कि मुझे मालुम है
कि तुम्हारी चाहत वो हसीं दुनिया है
जो तुम्हारे आगे है
और तुम्हारी ख़ुशी में ही खुश होना मुझे अच्छा लगता है

मैंने तुम्हे बताया नहीं कभी
कि ऐसे सैकड़ो ख़त मैंने लिख डाले है तुम्हे
जो तुम कभी पढोगे भी नहीं
और मेरे अलावा कोई तुम्हे लिखेगा भी नहीं
फिर भी ...........
.............. अच्छा लगता है......



 - स्नेहा गुप्ता
 03/05/2013 09:30PM

Sunday, March 31, 2013

कलाकार .....

तुम तस्वीरें बनाना चाहते हो न…?


कैसे बनाओगे?

बना पाओगे
मेरे उन आंसुओं की तस्वीरें  
जो कभी मेरी आँखों से छलकी ही नही …. ?

खींच पाओगे 
एक रेखाचित्र 
मेरे उस दर्द का 
जो तुमने कभी महसूस ही नहीं किया …?

कौन से रंगों में ढालोगे 
मेरे जले हुए सपनो की राख को…. ?

कैसे उकेरोगे 
उन रंगों को 
जो मेरी पलकों के नीचे 
सपनो की ख़ाक जमने से बनी है ....?

तुमने कहा था कि तुम कलाकार हो 

तुम्हे खुद पर भरोसा तो है न ...?

क्यूंकि तुम हमेशा मेरी मुस्कुराहटो में ही क़ैद होकर रह गये…. 

- स्नेहा गुप्ता 
01/04/2013 12:17 AM

Friday, March 1, 2013

अब आपसे मिला नहीं करेंगे .......

 आपसे किसी बात का गिला नहीं करेंगे 
वादा रहा अब आपसे मिला नहीं करेंगे 

आपको हमने यूँ तो हैरान बहुत किया 
बेसबब बेवज़ह परेशान बहुत किया 
ख्यालो से अब आपके खिला नहीं करेंगे 
वादा रहा अब आपसे मिला नहीं करेंगे 

 जिंदगी हसीन थी जिंदगी हसीन है 
बात लेकिन ये बेहद ज़हीन है 
इस बात में मगर हम घुला नहीं करेंगे 
वादा रहा अब आपसे मिला नहीं करेंगे 

आपकी चाहत की मन्नतें न सही 
तक़दीर में अपनी जन्नतें न सही 
मोम बनकर हम जला नहीं करेंगे 
वादा रहा अब आपसे मिला नहीं करेंगे 

मिल जाये कोई नियामत भी शायद 
क्या पता हो जाये मुहब्बत भी शायद 
मुस्कुरायेंगे हमेशा , होठों को सिला नहीं करेंगे 
मगर वादा रहा अब आपसे मिला नहीं करेंगे ...........

- स्नेहा गुप्ता 
01/03/2013
00:30AM


Friday, February 22, 2013

दास्ताँ -ए - जिंदगी ....

चार साल पहले इसे लिखा था ......




ये जिंदगी अश्को का एक समंदर है 

कुछ खामोशी के साथ उठती कई लहरें है 
इन पर भी कई अनकहे अल्फाज़ ठहरे है 
खुद में समेटे कई दास्तानें ये सागर है 

बढ़ रहा है शोर, तन्हाइयां घुट रही है 
सहेज कर रखी हर माला टूट रही है 
क्या रौशनी क्या अन्धेरा सब बराबर है 

मंजिलो से पहले ही हर उम्मीद भटक जाती है 
तूफानी लहरें कश्ती को भंवर में पटक जाती है 
बिखर गयी पंखुड़ियां खो गया हर मंजर है 

पार पाना नामुमकिन ये दरिया बहुत गहरा है 
हसरतो पर हालातो का बेहद सख्त पहरा है 
बाहर  धधकती ज्वालामुखी अन्दर है 

कुछ मिल जाए ऐसी किस्मत नहीं रही 
कुछ पाने की भी अब चाहत नहीं रही 
वक़्त के रहम-ओ-करम पर जिंदा अब मुक़द्दर है ....

- स्नेहा गुप्ता 



Saturday, April 28, 2012

मेरी आँखों में देखने की कोशिश न करना

मेरी आँखों में देखने की कोशिश न करना
इनमे तुम्हे अपने लिए दीवानगी नज़र आएगी
मेरे चेहरे को पढने की कोशिश जो करोगे
तुम्हे भी मेरी बेइन्तेहाँ चाहत हो  जायेगी


दोस्तों की भीड़ में खोयी हुई समझना
हर ग़म से बेखबर हो सोयी हुई समझना
मेरे दिल में झांकने की कोशिश न करना
दिल दहला देने वाली वीरानगी नज़र आएगी
गर खयालो में मुझे तुम लाने लगोगे
तुम्हे भी फिर मेरी आदत हो जायेगी


बेवज़ह की कोई पहचान ही समझना
मुझे तुम अजनबी अनजान ही समझना
मेरे अल्फाजो को महसूस करने की कोशिश न करना
बस तुमसे ही जुड़ी तिश्नगी नज़र आएगी
मेरे जज्बातों को समझने की कोशिश जो करोगे
तुम्हे भी मुझसे बेपनाह मुहब्बत हो जायेगी

- स्नेहा गुप्ता  
00:45 A.M. 28/04/2012 
  

Friday, April 13, 2012

खामखाँ सी ज़िँदगी






खामखाँ उन राहोँ

की रहगुज़र रखना

खामखाँ हर एक

बात की खबर रखना

खामखाँ की बातेँ

खामखाँ के सपने

खामखाँ पराए

लगने लगते हैँ अपने

फिर उनका यूँ बातेँ बनाना

और उसपर भी अंदाज़ शायराना

फिर करके गुस्ताखी

खामखाँ मुस्कुराना

ग़र मुमकिन नहीँ तकदीरेँ बनाना

खामखाँ फिर क्योँ तस्वीरेँ बनाना

शुक्र है खुदा का

हुई न मुलाकातेँ

खामखाँ बढ़ जाती

फिर ये सारी बातेँ

खामखाँ है फिर भी

इनका ज़ेहन मेँ आना

दुखती ज़िँदगी को

खामखाँ फिर दुखाना

हैँ बड़ी ही ये नाज़ुक

खामखाँ दर्द सहेँगी

टूटे सपनोँ की कड़ियाँ

जब आँखोँ को चुभेँगी

खामखाँ रो पड़ेँगी

खामखाँ ऐसी किस्मत

खामखाँ ऐसी चाहत

खामखाँ फिर किस्मत की

इनायत की हसरत

वे कहते हैँ किस्मत को

खामखाँ है सोचना

तकदीर को अपने ही

हाथोँ से तुम लिखना

खामखाँ ये उम्मीदेँ

बढ़ती ही गई

खामखाँ वे न समझे

कि मैँ हूँ वही

खामखाँ बन गई एक

कहानी अनकही हूँ

इक इंसान हूँ मैँ भी

फ़रिश्ता नही हूँ

खामखाँ ये लफ़्ज़

खामखाँ ये ग़ज़ल

खामखाँ सी ज़िँदगी

हो गई है आजकल



- स्नेहा गुप्ता

07/04/2012

09:30 P.M.

Monday, April 25, 2011

घिर आई बदली ...

जब कभी कोई आशा किसी दुआ से सँभली
न जाने कहाँ से इन आँखोँ मेँ घिर आई बदली ....

उपवन मेँ भी झूमकर आई बहार
मौसमी के गीत पर खिला हरसिँगार
और गुलबहार जब हँस कर निखरी
चमन मेँ हर तरफ़ खुश्बू ही बिखरी
रजनीगंधा की जो ओस अचानक पिघली
न जाने कहाँ से इन आँखोँ मेँ घिर आई बदली ....

सुरमई शाम मेँ भी महका एक गीत
चंदा को छूकर झूमा संगीत
तारोँ को जैसे एक सुर मेँ है ढ़ाला
मद्धम मद्धम मुस्कुराती शशिबाला
अठखेली कर गुनगुनाई जो ये हवा पगली
न जाने कहाँ से इन आँखोँ मेँ घिर आई बदली ....

अप्रतिम, सुंदर, अद्भुत, मनभावन
मिट्टी की सोँधी खुश्बू से खिल उठा ये मन
बहते है कैसे कल कल कल कर
राहोँ के किनारे के छोटे छोटे निर्झर
क्यूँ ये बरखा आँसुओँ मेँ आ ढ़ली
न जाने कहाँ से इन आँखोँ मेँ घिर आई बदली ....
[written by - Sneha Gupta]