सुनो,
तुम डराया न करो मुझे इस
तरह..
मुझे डर लगता है
कभी तुम्हारी आँखों से
कभी तुम्हारी बातो से
फिर भी तुम्हे जानना चाहती
हूँ
तुम्हे समझना चाहती हूँ
मुझे जानने दो
तुम्हे
समझने दो
तुम्हे सोचना मुझे अच्छा
लगता है..
मैंने तुम्हे बताया नहीं
कभी
तुम एक रहस्यमयी किताब से हो
तुम्हे पढ़ लेना चाहती हूँ
लेकिन अचानक नहीं
बल्कि हर पन्ना हर रोज़
थोड़ा थोड़ा करके
तुम्हे पढना मुझे अच्छा
लगता है
मैंने तुम्हे बताया नहीं
कभी
तुम एक बहुघातीय समीकरण से
हो
कभी तुम्हे सुलझा लेना
चाहती हूँ
कभी यूं ही उलझ कर रह जाना
चाहती हूँ
सुलझ कर उलझ जाना मुझे
अच्छा लगता है
मैंने तुम्हे बताया नहीं
कभी
कि तुम धुंध कि तरह छाये हो
मेरी ज़िन्दगी में
और
धुंध में भटकना मुझे अच्छा
लगता है
मैंने तुम्हे बताया नहीं
कभी
कि मैं जानती हूँ
कि तुम कभी सुनोगे भी नहीं
कभी पलटकर देखोगे भी नहीं
फिर भी तुम्हे पुकारना मुझे
अच्छा लगता है
मैंने तुम्हे बताया नहीं
कभी
कि मुझे मालुम है
कि तुम्हारी चाहत वो हसीं
दुनिया है
जो तुम्हारे आगे है
और तुम्हारी ख़ुशी में ही
खुश होना मुझे अच्छा लगता है
मैंने तुम्हे बताया नहीं
कभी
कि ऐसे सैकड़ो ख़त मैंने लिख
डाले है तुम्हे
जो तुम कभी पढोगे भी नहीं
और मेरे अलावा कोई तुम्हे लिखेगा
भी नहीं
फिर भी ...........
.............. अच्छा लगता
है......
- स्नेहा गुप्ता
03/05/2013 09:30PM