Tuesday, August 2, 2016

एक प्यार ऐसा भी...

आकाश अपनी टाई बाँध रहा था जब उसकी पत्नी ने उससे पुछा, “सुनो, मैं मोटी हो गयी हूँ क्या?”

आकाश ने घूम कर देखा. उसकी पत्नी सुषमा अपने वेस्टकोट का बटन लगाने की कोशिश कर रही थी. शायद ये किसी भी पति के लिए आगे कुआँ और पीछे खाई वाली बात होती लेकिन आकाश ने कभी अपनी ज़िन्दगी में ऐसे पलों को हावी नहीं होने दिया था. उसने बिना किसी भाव के कहा, “तुम प्रोफेशनल हो. तुम बेहतर जानती हो.”

सुषमा ने अपने पति की ओर एक बार देखा और फिर चुपचाप अपना बैग निकालते हुए बोली, “आज मुझे ऑफिस छोड़ दोगे?”

“पहले बोलती.” आकाश बस निकलने को था, “आज कहीं जाना है मुझे.”

“ठीक है.” कहते हुए सुषमा तेजी से बाहर निकल गयी.

न सुषमा कुछ पूछती थी और न आकाश बताने की ज़रूरत समझता था.

शायद यही वज़ह थी सुषमा कभी जान नहीं पायी थी कि आकाश वंशिका को भूला नहीं था.

आकाश वंशिका की ऑफिस बिल्डिंग के बाहर था. सड़क के एक किनारे अपनी एंडेवर गाड़ी के अन्दर बैठा, ए.सी. ऑन किये उसके बाहर निकलने का इंतज़ार कर रहा था वह. यहाँ आने से पहले, कई बार उसके मन में यह ख्याल आया था कि इस तरह किसी शादीशुदा औरत का पीछा करना गलत है. लेकिन, नैतिकता की तमाम बातें उसके ज़ख़्मी दिल को सुकून दे पाने में नाकामयाब साबित हो रही थी. पांच साल बीत चुके थे. लेकिन वह उसकी कही हुई एक भी बात नहीं भुला था. अब भी उसके शब्द उसे चुभते थे.
ख्यालों में डूबते उतराते पांच साल पहले घटित हुई वह घटना फिर से उसकी आँखों के आगे तैर गयी जब उसके फ़ोन पर एक अनजान नंबर से फ़ोन आया था...

“हेल्लो, आकाश जी से बात हो सकती है?” एक घबराया हुआ स्त्री स्वर था.

“स्पीकिंग... हू इज दिस?” आकाश संभल कर जवाब नहीं दे पाया था.

“आकाश जी, मैं वंशिका बोल रही हूँ.” लड़की ने ज़ाहिर किया और उतनी हडबडाहट के साथ बोली, “मैं आपसे मिलना चाहती हूँ. आज ही. प्लीज़ बताइए, मिल सकते है?”

अब चौंकने की बारी आकाश की थी. “अरे वंशिका जी, आप? हाँ मिल सकते है लेकिन बात क्या है? आप इतनी घबराई हुई क्यों है?”

“मिलकर बताउंगी. लेकिन आपको मेरी कसम है, इस बारे में आप किसी से भी कुछ भी मत कहना. मैं आपको मैसेज करके बताती हूँ कि हमें कहाँ मिलना है.”

और इसके साथ ही फ़ोन कट गया था. चंद पलों बाद ही आकाश के फ़ोन पर उसी नंबर से मैसेज आया था जिसमे एक मामूली से रेस्तरां का पता दिया और मिलने का वक़्त दिया हुआ था.

आकाश भौचक्का सा था. जिस लड़की से उसकी शादी लगभग तय हो चुकी थी वह उससे इस तरह गुपचुप तरीके से मिलना चाहती थी और वह समझ नहीं पा रहा था कि उसे यह बात अपने माँ बाप से कहनी चाहिए थी या नहीं. प्यार, मोहब्बत और रिश्तों के मामले में आकाश का स्वभाव एक पोखर के जैसा था. शांत लेकिन ज्यादा गहरा नहीं. वह एक बड़ी कंपनी में एक अच्छे पोस्ट पर था. ऐसा नहीं था कि उसकी नसों में खून के साथ संस्कार घुले हुए थे. दरअसल उसकी कभी ऐसी इच्छा ही नहीं हुई थी कि ज़िन्दगी में प्यार वाला एंगल होना ही होना चाहिए. धीर गंभीर स्वाभाव वाले आकाश में न तो कभी किसी लड़की ने दिलचस्पी दिखाई और न ही आकाश ने कभी अपने सिंगल होने का शोक मनाया. शायद परिवार के साथ रहने के कारण उसे किसी भी चीज़ की कमी नहीं खलती थी. उसे किसी चीज़ का शौक ही नहीं था.  प्यार और शादी को लेकर उसका यही नजरिया था कि सबके साथ ऐसा होता है इसलिए इसे इतना तवज्जो देने की ज़रूरत क्या है.

आखिरकार उसने वंशिका से मिलकर पूरी बात जानने के बाद ही कुछ करने का फैसला किया.

रेस्तरां आकाश की तबियत से कुछ ज्यादा ही गरीब था. जब आकाश वहां पहुंचा तो वंशिका वहाँ पहले से ही उसका इंतज़ार कर रही थी. पहली बार आकाश ने वंशिका को देखा था. यूँ तो कई बार उसकी माँ ने कहा था कि एक बार मिल लो लेकिन आकाश का वही जवाब था, “ज़रूरत क्या है. शादी ही तो करनी है. आपने देख लिया तो बस हो गया. मिल लूँगा किसी दिन. अलग से क्या वक़्त निकालू?”

आकाश ने गौर किया था कि वंशिका तस्वीरों से बिलकुल अलग थी. तस्वीरों में जहाँ वह गंभीर और घरेलु लगती थी वहीँ हकीकत में ठीक इसके उलट लग रही थी. उसने भूरे रंग की शर्ट और नीले रंग की जीन्स पहन रखी थी. कंधे से एक ऑफिस बैग लटका था और वह बेचैनी में उंगलियाँ तोड़ रही थी.

“आई एम् सॉरी. आई एम् लेट.” आकाश ने उस तक पहुँच कर बैठते हुए कहा.

“इट्स ओके.” वंशिका ने बिना किसी भूमिका के कहा, “आकाश जी, आप प्लीज़ इस शादी के लिए मना कर दीजिये. अगर ये शादी हुई तो हम दोनों की लाइफ बर्बाद हो जायेगी. मैं किसी और से प्यार करती हूँ. मैंने घर में सबको ये बात बताई है. लेकिन सब इसे मेरा बचपना मानते है. ऐसा नहीं है कि वो लोग उसे पसंद नहीं करते. एक्चुअली बात ये है कि आपकी हैसियत उससे बहुत ज्यादा है. मैं कुछ भी बोलती हूँ तो घर में सब मुझे दुनियादारी समझा कर चुप कर देते है. वह आपके जितना नहीं कमाता लेकिन जितना करता है वो मेरे लिए काफी से ज्यादा है. मेरे बहुत ज्यादा शौक नहीं है. बस ख़ुशी से और प्यार से रहना चाहती हूँ. अगर आप मना कर देंगे तो मैं घर वालों को उससे शादी करने के लिए मना लुंगी. प्लीज़, मेरी बात मान लीजिये.” वंशिका एक सांस में सब कुछ कह गयी.

ख़ामोशी से सब कुछ सुनने के बाद, आकाश ने एक लम्बी सांस ली और नज़र भर के वंशिका को देखा. न जाने क्यों उसके घरवालों ने जिस ‘बचपने’ की बात कही होगी वह उसके चेहरे पर नज़र आने लगी उसे. भला कौन सी ऐसी समझदार लड़की होगी जो महीने के लाखों कमाने वाले लड़के को छोड़कर अपने निरी हैसियत वाले प्रेमी के साथ शादी करना पसंद करेगी. आकाश को उसका भविष्य साफ़ नज़र आ रहा था. पैसे की तंगी और रोज़मर्रा की ज़रूरतों के बीच अपने बच्चों का भविष्य तलाशती हुई थुलथुल सी औरत जो कभी प्यारी सी वंशिका हुआ करती थी. “खैर”, आकाश ने सोचा, “ऐसी बेवक़ूफ़ लडकियां, यही डीसर्व करती है.”

“ठीक है. मना कर दूंगा.” आकाश ने भी बिना किसी भूमिका के कहा.

“ओह्ह थैंक यू वैरी मच.” वंशिका ने चहक कर आकाश के दोनों हाथों को थाम लिया, “आप बहुत अच्छे है आकाश जी. मैं दुआ करुँगी कि आपको बहुत अच्छी पत्नी मिले. और प्लीज़ इस बारे में किसी से कुछ भी मत कहियेगा.” और इतना कहकर वह लगभग उछलती हुई बाहर चली गयी थी.

आकाश को कुछ महसूस हो रहा था. आहत सा, कुछ अपमानित सा... उसे यकीन नहीं हो पा रहा था कि वंशिका जो खुद एक बेहद साधारण लड़की है, उसे एक मामूली लड़के के लिए छोड़ देगी. उसे तो लगा था कि वंशिका ने कुछ स्पेशल करने के लिए उसे मिलने बुलाया होगा. या वह उसका ‘अटेंशन’ चाहती होगी. लेकिन उसने तो...

आकाश ने शादी के लिए मना कर दिया था. माँ ने पुछा तो कह दिया कि वंशिका उसके ‘स्टैण्डर्ड’ की नहीं है. कुछ दिनों तक घर का माहौल अजीब सा रहा लेकिन उसके बाद सब लोग सब कुछ भूल गए. सिवाए आकाश के... उसके पोखर जैसे शांत मन में उस मामूली सी लड़की ने पत्थर मारकर जो तरंगे पैदा कर दी थी उन्होंने उसे बेचैन कर दिया था. कहते है कि जब तक हमारी ज़िन्दगी में कोई चीज़ नहीं होती है तो कई बार उसकी कमी का एहसास भी नहीं होता. लेकिन एक बार उसका एहसास हो जाए तो उसे भुला पाना मुश्किल होता है. वंशिका के साथ बमुश्किल बिताये उन १५-२० मिनटों ने आकाश का चैन छीन लिया था. वह अक्सर सपने में देखता कि वंशिका रोते हुए उसके पास आई और अपनी गलती के लिए माफ़ी मांगी और आकाश ने हँसते हुए उसे माफ़ कर दिया. लेकिन ऐसा कभी नहीं हुआ. आकाश बेचैनी से इस बात का इंतज़ार करता रहा कि वंशिका अपनी गलती की सजा पाकर उसके पास रोती हुयी आये... दिन, महीने और यहाँ तक की साल भी बीते लेकिन आकाश की बेचैनी कम नहीं हुई. शादी के बाद भी नहीं.. पत्नी सुषमा ने शुरूआती महीनों में पुरजोर कोशिश की कि उसका पति अपनी ज़िन्दगी में उसे भी जगह दे लेकिन नाकामयाब होने पर वह भी हताश होकर अपनी दुनिया में ही रहने लगी. आकाश के गंभीर स्वभाव ने किसी को भी कोई और वज़ह होने का आभास तक न होने दिया.

और आकाश इन सबसे बेखबर अपने छद्म अपमान को झेलता हुआ दिल ही दिल में जलता रहा. जब उसकी बेचैनी उसके बर्दाश्त के बाहर हो गयी तो उसने इन्टरनेट पर वंशिका की बर्बाद ज़िन्दगी का तमाशा ढूँढने की कोशिश की. लेकिन उसे मिली तो बस कुछ तस्वीरें जिनमे बेहद मामूली सी वंशिका एक बेहद मामूली से लड़के के साथ थी. आकाश को ये देखकर धक्का लगा कि वंशिका की आँखों में वही चमक थी जो उस वक़्त उसने देखी थी. “नहीं, नहीं... इन्टरनेट तो झूठी दुनिया है.” आकाश ने खुद को समझाया. उसने फैसला किया कि असलियत में अपनी गलती पर पछता रही वंशिका से मिलेगा और उसे दिलासा देगा.

और आज कई दिनों तक खुद को भरोसा दिलाने के बाद आखिरकार वह वंशिका के ऑफिस के बाहर उसका इंतज़ार कर रहा था. उसकी आँखें घड़ी पर गयी. ६ बजने में कुछ ही मिनट थे. वंशिका कभी भी बाहर निकल सकती थी.

और आखिरकार वंशिका बाहर निकली. आकाश को लगा जैसे वह उसी पांच साल पहले वाले रेस्तरां में पहुँच गया था. क्यूंकि वंशिका बिलकुल पांच साल पहले वाली वंशिका जैसी ही थी. बिलकुल उसी तरह की मामूली सी शर्ट और जीन्स पहने और बालों को पोनी बांधे वह एक ऑटो वाले को हाथ दे रही थी. आकाश उतर कर उससे मिलता उसके पहले ही वह ऑटो में बैठ कर चल पड़ी. आकाश ने उसका पीछा किया. ऑटो सबसे पहले एक प्ले स्कूल के पास रुका. वंशिका अन्दर गयी और ५ मिनट बाद एक २-३ साल के बच्चे को गोद में लिए निकली.

वंशिका का बच्चा!

आकाश को लगा कि जैसे आसमान फट पड़ा...

वंशिका बच्चे को लेकर वापस ऑटो में बैठी और कुछ दूर जाकर एक चाट वाले के पास रुक गयी. उसने ऑटो वाले को पैसे देकर विदा किया और बच्चे को गोद में लेकर उससे बाते करने लगी. बच्चा कभी उसके बालो से तो कभी उसकी उँगलियों से खेलता हुआ हंस हंस कर उसकी बातों का जवाब दे रहा था. इतनी देर में एक पल्सर मोटरसाइकिल वंशिका के पास आकर रुकी. बाइक सवार ने जब हेलमेट उतारा तो आकाश ने देखा कि ये वही मामूली सा लड़का था. बच्चा ने पिता को देखा तो उछल कर उसकी गोद में चला गया. पास रखी एक बेंच पर तीनों बैठे और एक दूसरे से बाते करने लगे. हवा चलने लगी थी और वंशिका की कुछ लटें बार बार उसकी आँखों में आकर फँस रही थी. वंशिका ने एक हाथ से चाट की प्लेट और दूसरे हाथ से बच्चे का बैग पकड़ रखा था. तभी आकाश ने देखा कि लड़के ने वंशिका के बैग में से क्लिप निकाली और उसके बालों को तरतीब कर दिया.

लड़के ने जिस हक़ और दुलार से वंशिका के बालों को संवारा था, जब आकाश ने उसे महसूस किया तो उसे लगा कि जैसे उसके हाथ अचानक से काँप रहे है. तीनों अब भी एक दूसरे से बातें करने में मशगूल थे. वंशिका बच्चे को कुछ खिला रही थी और उसका पति उसे खिला रहा था.

आकाश ने अपनी गाड़ी में लगे शीशे में खुद को देखा. उसे लगा कि उसका विकृत सा चेहरा अब धीरे धीरे सामान्य हो रहा था.

आकाश ने अपनी गाड़ी मोड़ी और चलने से पहले बेहद मामूली सी वंशिका और उसके बेहद मामूली से परिवार को देखा. वही पांच साल पहले वाली हंसी... वही चहक.. एक मामूली से चाट वाले से मामूली सी चाट खाकर खुश होता एक बेहद मामूली सा परिवार... उसने गौर किया कि यह वंशिका पांच साल पहले वाली वंशिका जैसी नहीं दिख रही थी. इस वंशिका के चेहरे पर पांच साल पहले वाली वंशिका से ज्यादा चमक थी.

आकाश को महसूस हो रहा था कि उसकी हैसियत वंशिका से बहुत बहुत नीचे है...

सुषमा ऑफिस से निकल रही थी कि फ़ोन बजा. आकाश का था. शादी के इन छः महीनों में उसके पति ने आज तक कभी भी उसे फ़ोन नहीं किया था. अनहोनी की आशंका से उसने घबराकर फ़ोन उठाया, “हेल्लो, क्या हुआ?”

“ऑफिस से निकल गयी हो क्या?” आकाश का सवाल था.

सुषमा ने महसूस किया कि आकाश के लहजे में एक अजीब सा सुकून था. उसने धीरे से कहा, “नहीं, बस निकल रही हूँ.”

“रुको, मैं लेने आ रहा हूँ.”

सुषमा के कानों में जैसे ही ये शब्द पड़े उसे लगा कि शायद वो सपना देख रही है. उसकी तन्द्रा टूटी जब आकाश ने दुबारा पूछा, “सुनो, मैं सोच रहा था कि आज बाहर डिनर करते है. तुम्हे क्या पसंद है...?”

[चित्र: गूगल से साभार]


-   - © स्नेहा राहुल चौधरी 

Tuesday, July 19, 2016

पता नहीं...

सोना अपने दोनों पैरो के अंगूठों से फर्श की टाइल्स को बगीचे की घास मानकर कुरेद रही थी. उकडूं बैठकर दुपट्टा का सिरा अपने घुटनों के बीच दबाये वह अपने बाएं हाथ की अंगूठी से खेल रही थी. पूरा लड़कीपना ज़ाहिर था उसका. उसे मालुम था कि लडको को लड़कीपना बहुत भाता है. इसलिए वह इसे दिखाने का कोई मौका नहीं छोडती थी.

पास ही कुछ दूरी पर जतिन भी बैठा था. भरा पड़ा... उसे सोना का ये लड़कीपना बहुत भाता था. वह सोना को इस तरह खुद अठखेलियाँ करते देखते हुए पूरी ज़िन्दगी बिता सकता था, ऐसा उसका मानना था. उसे सोना से बहुत कुछ कहने की इच्छा हो रही थी, हमेशा की तरह. लेकिन हमेशा की तरह वो चुप था.
बगल में रखी चाय की दो खाली प्यालियों की तरह दोनों खामोश थे.

कुछ देर बाद वही हुआ जिसका जतिन को हमेशा से अंदेशा रहा था. सोना खुद ही बोल पड़ी, “जतिन, एक बात पूछूं?

जतिन बोला, “पूछो.”

सोना हिचकिचाई. वह हिचकिचाने की ‘प्रैक्टिस’ कई दिनों से कर रही थी. शायद तब से जब से उसके दिमाग में ये सवाल आया था जिसे पूछने का उसने मन बना लिया था. कुछ देर चुप रहने के बाद, वह बोली, “जतिन, क्या तुम मुझे पसंद करते हो?”

जतिन मानो छूटते ही बोला, “हाँ, करता हूँ. बहुत पसंद करता हूँ तुम्हें, सोना. लेकिन मंजिल मिलेगी या नहीं, पता नहीं.”

सोना को लगा जैसे कुछ सन्न से उसके दिमाग पे लगा. वह सँभालते हुए बोली, “मंजिल क्यों नहीं मिलेगी? हम दोनों के पिताजी इतने अच्छे दोस्त है. पिताजी तुम्हारी बेहद तारीफ़ करते है और तुम्हारी मां भी मुझे इतना चाहती है. फिर...?”

जतिन ने पहले की सी ही उदासी से कहा, “फिर भी, सोना. मुझे भरोसा नहीं किस्मत पर.”

“क्यों?” सोना ने बेचैनी से पुछा.

“पता नहीं.” जतिन का उदासी भरा जवाब था.

कुछ देर के लिए चुप्पी छा गई. सोना ने अपना दुपट्टा ठीक कर लिया था और पालथी मारते हुए एक गाल हाथ पर रखकर बड़े गौर से खाली प्यालियों को निहार रही थी.

कुछ देर बाद वह धीरे से बोली, “हम दोनों की तो ‘कास्ट’ भी ‘सेम’ है. फिर क्या ‘प्रॉब्लम’ होगी?”

जतिन का सीधा जवाब, “पता नहीं...”

सोना कुछ देर चुपचाप बैठी रही. फिर धीरे से उठी और जाने लगी.

जतिन ने रोका, “रुक जाओ, सोना. मां से मिलकर चली जाना.”

“शाम ढलने से पहले घर पहुँच जाना चाहती हूँ.” सोना पलटकर बोलो तो उसकी नज़र फिर से उन खाली प्यालियों पर पड़ी.

“मैं छोड़ दूंगा.” जतिन उठते हुए बोला.

“नहीं. अब अकेली ही जाउंगी.” सोना की आवाज़ में न जाने कहा से एक दृढ़ता आ गई थी. ये लड़कीपना तो बिलकुल नहीं था.

और सोना चली गई अपना लड़कीपना चाय की उन्हीं खाली प्यालियों के पास छोड़कर... उसके चेहरे पर एक अजीब सी मुस्कान थी. उसे क्या मिल गया था.. पता नहीं...


[चित्र: गूगल  से साभार]


-  © स्नेहा राहुल  चौधरी 

Saturday, May 14, 2016

इश्क़

शरारतों से है, हिमाकतों से है..
ज़िद से है और मोहब्बतों से भी है


बेमुरव्वती से है, तिश्नगी से है
गुरूर से है और सादगी से भी है





तेवरों से है, नर्मियों से है

खूबियों से है और खामियों से भी है




इन लम्हों में इसे समेटूं तो कैसे,
हैं इश्क़ इतना ज़्यादा कि ज़िन्दगी कम पड़ जायेगी...


- स्नेहा राहुल चौधरी



[चित्र : गूगल से साभार ]

Monday, February 8, 2016

प्यार के साइड इफेक्ट्स


“सुनो, मैं तुम्हारे बच्चे की माँ बनने वाली हूँ. प्लीज़, मुझसे शादी कर लो.” उसने बेहद गंभीर आवाज़ में कहा.
“धत पगली, ये भी कोई तरीका है प्रोपोज करने का? पूरी फ़िल्मी हो तुम... चलो, लंच बॉक्स दो मेरा. ऑफिस के लिए देर हो जायेगी.”
वह ठुनकते हुए बोली, “जाओ, तुम तो हमेशा मज़ाक ही उड़ाते हो.”
“तो और क्या करूँ? प्रोपोज करना भी तो नहीं आता तुम्हे.” वह हंसा और लंच बॉक्स उठाकर निकल गया.
लंच करते वक़्त खुश्बूदार बिरयानी और दही कोफ्ते की सुगंध पूरे दफ्तर में फ़ैल गयी तो सहकर्मी ने पूछा, “यार, क्या किया जो ऐसी बीवी मिली?”
वह मुस्कुराते हुए बोला, “एक महीने तक काली बिल्ली के खुर पूजे थे.”
तभी फ़ोन बजा और स्क्रीन पर “जान” फ़्लैश हुआ. फ़ोन उठाते ही आवाज़ सुनाई दी, “प्लीज़ कर लो न शादी!”
वह फुसफुसाया, “पगली, ऑफिस में काम नहीं है क्या तुम्हे?”
वह हड़बड़ी में बोली, “अरे रेस्टरूम में हूँ. सुनो, मैं क्या सोच रही थी कि भाग के शादी कर लेते है.”
आखिरकार वह ठहाका लगा कर हंसा, “अरे, कर तो ली शादी. अब कितनी बार करूँ?”
अब दूसरी तरफ शिकायती लहजा था, “जाओ, तुम्ही ने तो कहा था कि मैं हमेशा तुम्हारी गर्लफ्रेंड बनी रहूँगी और तुम मेरे बॉयफ्रेंड रहोगे और हम हमेशा एक दूसरे के साथ डेटिंग और फ्लर्टिंग करते रहेंगे. जाओ, कट्टी तुमसे.” और फ़ोन कट गया.
उसने मुस्कुराकर फ़ोन देखा और लंच ख़त्म कर के अपने काम में लग गया. एक घंटे बाद हाफ डे लेकर वह घर पहुंचा. पूरे घर में जगह जगह गुलाब के फूल लगाए और मोमबत्तियां जलाई. जब वह घर पहुंची तो घुटनों पर बैठकर एक फूल उसे देते हुए उसने कहा, “ज़िन्दगी से भी प्यार करता हूँ तुमसे. जीवन भर मेरा साथ दोगी?”
उसके चेहरे पर नूर आ गया. मुस्कुराई, “हाँ, मरने के बाद भी तुम्हारा पीछा नहीं छोड़ूंगी.”
“अरे यार!” उसने घबराने का नाटक किया, “बीवी चाहिए, चुड़ैल नहीं...”
“ये प्यार के साइड इफेक्ट्स है.” अब ठहाके वह लगा रही थी, “प्यार करने वाली बीवी के साथ कभी पीछा न छोड़ने वाली चुड़ैल फ्री...”
और वह हंसती रही. वह मुस्कुराकर कुछ पल उसे हँसते हुए देखता रहा और उसकी हंसी को अपनी अंतरात्मा में सहेजता रहा और थोड़ी देर बाद उसने उसकी हंसी पर अर्ध विराम लगा दिया...


स्नेहा राहुल चौधरी

Sunday, November 29, 2015

वादा...

मुझे अपना एक-एक कदम एक-एक मील सरीखा महसूस हो रहा था. बमुश्किल बीस मिनट दूर जेम्स का घर मुझे कई सदियों दूर महसूस हो रहा था. मुझे समझ में नहीं आ रहा था आखिर जेम्स को सब कुछ बताते हुए मैं उसका सामना कैसे करुँगी. पता नहीं ये सब कुछ जेम्स झेल भी कैसे पायेगा...

बूंदाबांदी जारी थी. केरल में तो ये आम बात ही थी. लेकिन एक दिन पहले जो तूफ़ान आया था उसने मेरी और जेम्स की ज़िन्दगी को तबाह कर दिया था... मैं अनमनी सी चली जा रही थी बस ये सोचते हुए कि ये रास्ता कभी ख़त्म न हो...

जेम्स का कॉटेज सामने नज़र आने लगा था. मेरी हिम्मत नहीं हो रही थी अन्दर जाऊ. पिछली रात के तूफ़ान में सड़क के इस पार एक पेड़ गिर पड़ा था. मैं उसकी ही एक शाखा पर बैठ गयी थी. सोच नहीं पा रही थी कि आखिर जेम्स से कहूँगी तो क्या... “जेम्स, मुझे माफ़ कर दो. मैं अपना वादा नहीं निभा पायी...” ... “जेम्स, तुम्हे इस तरह उसे अकेले छोड़कर नहीं जाना चाहिए था...”
मुझे लग रहा था मेरा सर फट जाएगा.

इससे पहले कि कुछ और सोच पाती, मेरा मोबाइल बज उठा. मैंने देखा – “जेम्स कालिंग...”

खुद पर पूरा नियंत्रण रखते हुए मैंने अपने आंसू पोंछे और फ़ोन उठाया, “हेल्लो...”

“हेल्लो, शिन्नी...! वहाँ क्या कर रही हो...? अन्दर आओ. बारिश में क्यों भींग रही हो?” जेम्स की आवाज़ थी... सारे जहाँ की खुशियाँ समेटे हुए... ज़िन्दगी की उमंग और चाहत से भरपूर... मुझे आश्चर्य नहीं हुआ था जब मिली ने बताया था, “वी आर सीइंग ईच अदर, यू नो...”
बस दुःख हुआ था...

“हेल्लो... हेल्लो... शिन्नी... देखो तो सामने...”
मेरी तन्द्रा टूटी तो मैंने देखा था कि जेम्स दरवाज़े पर खड़ा होकर हाथ हिलाते हुए मेरा ध्यान आकर्षित करने की कोशिश कर रहा था. जैसे ही मैंने उसे देखा, उसने फ़ोन काटकर अन्दर आने का इशारा किया.
अब मैं और नहीं भाग सकती थी...

मैं जैसे ही पास पहुंची, जेम्स ने झपट कर मुझे गले लगा लिया.

“ओह शिन्नी... शिन्नी...! मैंने तुम्हें... तुम सबको कितना मिस किया...”
वह बोले जा रहा था और मैं काठ हो गयी थी. सोच ही नहीं पा रही थी अगर उसे सच्चाई बता दूँ तो क्या उसकी खुशियों की कातिल नहीं कहलाउंगी. उसका मुस्कुराता हुआ चेहरा देखकर मेरा कलेजा मुंह को आ रहा था.

“आज सुबह ही तुम्हारे घर आना चाहता था. फ़ोन किया था पर तुमने उठाया नहीं तो सोचा बाद में मिल लूँगा...”

मैं क्या बताती उसे.. कि मैं घर पर नहीं कब्रिस्तान में थी.

हम अन्दर आ गए थे और अन्दर घुसते ही मेरा कलेजा टूक टूक हो गया. पूरे घर में सिर्फ मिली ही छायी हुई थी. दीवारों, दरवाजों, मेजो, कुर्सियों.. हर जगह सिर्फ उसकी ही छाप नज़र आ रही थी. लग रहा था कि अब किसी तस्वीर से मिली खिलखिलाती हुई बाहर निकल आएगी. सर घूम रहा था. मैं पास ही एक कुर्सी पर बैठ गयी. पूरे घर में जैसे उसकी खुशबू फैली हुई थी. लग रहा था कि अब किसी कमरे से उसकी खनकती हुई आवाज़ शिकायतों के साथ बाहर आएगी, “देखो न शिन्नी, पूरे घर को कबाड़ बना दिया है. सोचो, शादी के बाद मैं कैसे रहूंगी इस कबाड़खाने में. अगर हर सन्डे साफ़ सफाई न करूँ, तो पता चला किसी दिन मुनिसिपैलिटी वाले ये पूरा घर ही ले जायेंगे.”

“शिन्नी... शिन्नी...” जेम्स ने मेरा कन्धा हिलाया, “क्या हुआ?”

“क.. कुछ नहीं.” मैंने खुद को संभाला, “जेम्स, कुछ बताना है तुम्हे.”

“अभी नहीं.’ जेम्स ने मेरी बात काट दी. “पहली मेरी बनायीं हुई कॉफ़ी पीकर फ्रेश हो लो, फिर करेंगे ढेर सारी बातें.”

और मेरे जवाब का इंतज़ार किये बिना ही जेम्स किचन में चला गया. मुझे हर चीज़ अजीब लग रही थी. सबसे ज्यादा अजीब ये बात थी कि जेम्स ने अभी तक एक बार भी मिली के बारे में नहीं पूछा था. वरना तो हर वक़्त मिली मिली मिली... उस दिन क्या हो गया था उसे. वो कुछ ज्यादा ही कूल और रिलैक्स लग रहा था.

मैं उसके बारे में ही सोच रही थी कि वह कॉफ़ी ले आया. “ये लीजिये मैडम! गरमागरम कॉफ़ी...” वही गर्मजोशी... वही अंदाज़... चेहरे पर या आवाज़ में ज़रा भी शिकन नहीं. अबिम ने मुझे बताया था पिछली रात से जेम्स से उसकी बात नहीं हुई थी. जेम्स था तो बिलकुल सही लेकिन उसका मिली की खोज खबर न लेना अखर रहा था.
अब मैं और बर्दाश्त नहीं कर सकती थी. मुझे उसे सब कुछ बताना था. वह कॉफ़ी मेज पर रख कर अपना सामान अनपैक करने में लग गया था.

“जेम्स, यहाँ बैठो.” मैंने उसे आवाज़ लगाते हुए सामने रखी कुर्सी खींच ली थी.

“हाँ, बोलो.” जेम्स ख़ुशी से मेरे पास आकर बैठ गया. फिर खुद ही कहने लगा, “सॉरी यार, पूरा सामान बिखरा हुआ है. आज सुबह ही आया पर कुछ कर नहीं पाया...”

“जेम्स,’ मैंने उसकी बात काट दी, “मिली... मिली नहीं रही...” मेरे हाथ कांपने लगे. मुझे लग रहा था कि मैंने उसका सामना नहीं कर पाउंगी. मैंने नज़रे झुका ली, “कल रात को बहुत तेज़ तूफ़ान आया था. कल शाम को मिली ये कहकर निकली कि वह तुम्हें बहुत मिस कर रही थी इसलिए कुछ वक़्त अकेले नेवल कैंप के पास वाले ‘बीच’ पर गुज़ार कर जल्दी लौट आएगी. लेकिन बारिश तेज़ हो जाने के बाद भी जब देर रात तक वह नहीं आई तो हम सब उसे ढूँढने निकले. आज सुबह तीन बजे हमें उसकी लाश दो किलोमीटर दूर मिली. हम अभी सेमेट्री से ही...” इसके आगे नहीं बोल पायी थी मैं. गला रुंध गया था. लाख रोकने के बाद भी आंसू बह निकले. और आख़िरकार बाँध टूट गया और मैं बिलख बिलख कर रोने लगी.

“जानता हूँ.”
ये जेम्स की आवाज़ थी. बेहद ठंडी और भावशून्य...
मैं अवाक रह गयी...
“जेम्स...” आगे कुछ कह नहीं पायी मैं...
“मुझे मालुम है कि मिली मर गयी.” जेम्स ऐसे बोलने लगा जैसे मिली उसकी कोई न लगती थी, “आज सुबह ही पता चल गया था मुझे. अरे यार! जो पैदा होता है वो मरता भी है. मिली भी मर गयी तो कौन सा पहाड़ टूट गया. सुबह से मुझे दिलासा दे देकर लोगो ने मूड ऑफ कर रखा है. मिली मरी है... मैं तो नहीं मरा न.. डिसगस्टिंग...”

“तुम... तुम जल्लाद हो जेम्स...” मैं आपा खो बैठी, “जिस लड़की पर अपनी जान लुटाते थे... आज उसके मरने पर तुम्हें अफ़सोस तक नहीं हो रहा... कोई किसी के साथ टाइम पास भी करता है न तो उसकी मौत पर दुखी हो जाता है... लेकिन तुम जैसा सेल्फिश आदमी शायद ही दुनिया में हो... मिली कितना प्यार करती थी तुमसे... तुम इंसान नहीं हो सच... हैवान हो... शैतान हो...”

“बस!” जेम्स चिल्लाया, “मेरे घर में मुझ पर ही चिल्लाने की तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई?”

“नहीं रहना मुझे यहाँ...” मैं भी तैश में आ गयी थी, “मुझे तुमसे कोई रिश्ता भी नहीं रखना... शर्मिंदगी होती है कि कभी मैं तुम्हे अपना बेस्ट फ्रेंड मानती थी...”

उसके बाद मैं रुकी नहीं. दनदनाते हुए उसके घर से निकली और बारिश में ही भींगती हुई अपने कॉटेज में वापस आ गयी. दरवाज़ा बंद किया और औंधे मुंह बिस्तर पर गिर पड़ी. सामने टेबल पर एक तस्वीर थी... हमारी यादों की तस्वीर... हम तीनों साथ थे उसमे... मैं, मिली और जेम्स...

जो कुछ भी हुआ था उस दिन यकीन नहीं होता कि वो सपना था या हकीकत... मिली की मौत और जेम्स की बेरुखी... मेरी तो जैसे दुनिया ही उजड़ गयी थी. और मेरी दुनिया में था भी कौन जेम्स और मिली के अलावा... चार साल की उम्र से मदर मरियम अनाथाश्रम में साथ साथ रहे थे हम और जेम्स. एक साथ खेले, कूदे और बड़े हुए... सिस्टर ग्रेस की बदौलत मुझे और जेम्स को अच्छी पढाई मिली और बाद में नौकरी भी. मेरी दुनिया में बस जेम्स ही था. बेस्ट फ्रेंड्स थे हम दोनों. मैंने कभी सोचा ही नहीं था कि इसके आगे भी दुनिया होती है. फिर एक दिन हम दोनों की छोटी सी दुनिया में मेरिलिन आई. वह जेम्स के साथ काम करती थी. उसका भी दुनिया में कोई नहीं था. शायद एक अकेलेपन के दर्द का रिश्ता था जिसने हम तीनो को जोड़ दिया. फिर मेरिलिन मिली बन गयी. और जब मिली ने मुझे बताया कि जेम्स से उसका अफेयर चल रहा था तो मुझे लगा कि जैसे अन्दर कुछ टूट गया था. मैंने कभी जेम्स से शादी करने के बारे में नहीं सोचा था. लेकिन जब मुझे महसूस हुआ कि अब उसकी ज़िन्दगी में कोई और लड़की होगी जो मुझसे ज्यादा अहमियत रखेगी तो मुझे लगा जैसे ज़िन्दगी में मेरा एक ही खज़ाना था जो मेरा नहीं रहा. मेरा और जेम्स का रिश्ता न तो दोस्ती था और न ही प्यार. हम दोनों का रिश्ता दोस्ती और प्यार से बहुत ऊपर था... इसका कोई नाम नहीं था... ये एक ऐसा रिश्ता था जिसे सिर्फ महसूस किया जा सकता था... लेकिन जब मैंने जेम्स की आँखों में मिली के लिए वो खुशनुमा एहसास देखा तो मुझे इतनी ख़ुशी हुई जितनी शायद अपने लिए भी कभी नहीं हुई थी... फिर मैंने भी दिल की सारी गिरहें खोलकर मिली का स्वागत किया और जल्द ही मैं और मिली एक साथ शिफ्ट हो गए. जेम्स के अलावा एक अबिम था जो मेरी फ़िक्र करता था. और कुछ वक़्त बाद मैंने भी उसे नज़र अंदाज़ करना बंद कर दिया था. मैंने महसूस किया था अबिम वाकई मेरी परवाह करता था.
जेम्स मिली पर जान लुटाता था. और मिली भी उसपर दिलोजान से फ़िदा थी. जो भी उन्हें देखता उनके प्यार की कसमें खाता. मुझे याद है मिली के जन्मदिन पर जेम्स ने मुझसे पूछा था कि वह उसे क्या गिफ्ट दे. मैंने मोतियों का एक ‘नेकलेस’ ‘सज्जेस्ट’ किया था. और जेम्स बेवकूफी में नकली मोतियाँ ले आया था. खूब हँसे थे फिर हम तीनों... जेम्स ने कहा था कि वह मोतियाँ बदल कर ले आएगा. लेकिन मिली ने मना कर दिया था... वह ‘नेकलेस’ उसे दिल से भा गया था... और क्यों न भाता... आखिर जेम्स का दिया हुआ तोहफा जो था... वह एक पल को भी उस नेकलेस को खुद से अलग नहीं करती थी...

कितना चाहती थी वो जेम्स को... और क्या सिला दिया जेम्स ने उसे...

रोते रोते मेरी आँख कब लग गयी थी मुझे पता नहीं चला था. दरवाज़े पर हो रही खटखट से नींद खुली थी. दरवाज़ा खुला तो मैंने देखा सामने जेम्स था. उसका ये रूप देखकर मैं डर गयी थी. लाल लाल सूजी हुई आँखें और अजनबी सा चेहरा... मुझे लगा जैसे वह काफी देर से घर के बाहर भींग रहा था. मगर अचानक से मुझे उसका रूखा हुआ ‘बिहेविअर’ याद आया और मैंने उसे झिड़क दिया, “क्या करने आये हो यहाँ?”

“लोग झूठ कहते है तो मुझे अच्छा नहीं लगता शिन्नी.” बेहद ठंडी आवाज़ में वह बोला, “मिली मरी नहीं है...”

उसकी आवाज़ इतनी सर्द थी कि एकबारगी मेरी कंपकंपी छूट गयी. उसे देख-सुन कर ये साफ़ साफ़ ज़ाहिर हो रहा था कि वह अपने होश में नहीं था. यकीन नहीं हो रहा था कि सुबह मैं इसी जेम्स से लड़कर आई थी. वह बुरी तरह भींगा हुआ था मगर लग रहा था जैसे उसे कुछ महसूस ही नहीं हो रहा था. उसकी हालत देखकर मेरा कलेजा मुंह को आ गया. मैं एक दोस्त को खो चुकी थी और दूसरे को हरगिज़ खोना नहीं चाहती थी.

“अन्दर आओ जेम्स...” मैंने उसे बुलाया और वह बिलकुल एक छोटे बच्चे की तरह मेरे पीछे पीछे अन्दर आ गया. उसकी हालत खुद बखुद पुकार रही थी कि वह अपने होश में नहीं था.

मैंने उसे पकड़ कर कुर्सी पर बिठा दिया और एक तौलिये से उसका सर पोंछने लगी. वह खामोश नहीं था. बस अपनी ही धुन में बोले जा रहा था – “ मैंने मिली से वादा किया था कि मैं कल ही आ जाऊँगा. और आऊंगा तो सबसे पहले उससे ही मिलूँगा. मैंने ही उससे कहा था कि वह नेवल कैंप के पास वाले ‘बीच’ पर मेरा इंतज़ार करे. उसने अपना वादा निभाया था, शिन्नी. वह आई थी मुझसे मिलने. बस मैं नहीं पहुँच सका. लेकिन जानती हो शिन्नी? मैंने उससे कहा था कि अगर मैं उससे कल नहीं मिल पाया तो अगले दिन ज़रूर मिलूँगा.”
मैं खामोशी से उसकी बात सुन रही थी. लेकिन अचानक वह बेचैन हो उठा.

“शिन्नी... शिन्नी... तुम मेरे साथ चलो. वह बीच पर ज़रूर आई होगी.वह उठकर खड़ा हो गया और मेरा हाथ पकड़ कर दरवाज़े की तरफ चल पड़ा.

मैं अचानक से बदले उसके इस बर्ताव को समझ नहीं पायी. मैंने उसे रोकने की कोशिश की, “जेम्स रुक जाओ. मिली मर चुकी है. वो भला अब ‘बीच’ पर कैसे आ सकती है? होश में आओ जेम्स.” मैंने उसे झकझोरा.

“नहीं...!” जेम्स जोर से चिल्लाया, “मिली मरी नहीं है. जिंदा है वो... हरपल उसे महसूस करता हूँ मैं.” वह काँप रहा था... पता नहीं सर्दी से या गुस्से से... “जब लोग उसकी मौत का मातम मनाते है तो मुझे बहुत गुस्सा आता है. दिल करता है सबको मार डालू मैं... मरी नहीं है मिली. मर कैसे सकती है वो..? कैसे अपना वादा तोड़ सकती है?” वह हांफने लगा था. फिर मेरा हाथ पकड़ कर खींचते हुए बाहर ले जाने लगा, “चलो, मैं तुम्हे मिली से मिलवाता हूँ. वो जिंदा है और ज़रूर मेरा इंतज़ार कर रही होगी..”

“रुको जेम्स.” मैंने उसे रोकने की कोशिश कि लेकिन उसने परवाह नहीं की.

वह मुझे खींचते हुए बाहर ले आया. बारिश रुक चुकी थी. बस बूंदाबांदी हो रही थी. लेकिन वह रुका नहीं. मुझे खींचते हुए ‘बीच’ की तरफ ले जाने लगा और रास्ते भर बुदबुदाता रहा, “मर कैसे सकती है मिली? हरपल उसे महसूस करता हूँ मैं... मेरे चारो तरफ है वो.”

मैं बस उसके पीछे चलती जा रही थी और कोशिश कर रही थी उसकी हालत समझ सकू. मुझे डर लग रहा था कि कहीं जेम्स पागल न हो जाए.

आखिरकार हम ‘बीच’ पर पहुँच गए. जेम्स ने घड़ी देखकर कहा, “सात बज गए है. वह आती ही होगी.”

मैं खामोश थी और उम्मीद कर रही थी कि थोड़ी देर बाद जेम्स फूट फूट कर रोये और उसका गुबार बाहर निकल जाए.
मगर ऐसा हुआ नहीं. ‘बीच’ पर अजीब सी शान्ति छाई रही. यकीन नहीं हो रहा था कि बस एक दिन पहले ही वहाँ तूफ़ान आया था जिसने मिली की जान ले ली थी. उस दिन समंदर भी जैसे मिली को निगल कर शांत हो गया था.

कुछ ही मिनट बीते थे कि अचानक तेज़ आवाज़ हुई और समंदर से एक बहुत बड़ी लहर किनारे की तरफ उठी. मैं हैरान थी कि अचानक शांत पड़े समंदर में इतनी बड़ी लहर कहाँ से आ गयी. मैंने घबरा कर जेम्स को पीछे की तरफ खींचने की कोशिश की.
लेकिन टस से मस नहीं हुआ. उल्टा उसने बाँहे फैला दी और आँखें बंद कर के बेहद शांत आवाज़ में बोला, “मेरी मिली आ गयी...”

मैं डर गयी और जोर से चिल्लाई, “जेम्स पागल मत बनो. चलो यहाँ से.” उसे खींचने की मेरी सारी कोशिशें बेकार हो रही थी.

लेकिन जेम्स तो जैसे दूसरी ही दुनिया में चला गया था. बेहद ठंडी आवाज़ में बोला, “तुम घर जाओ, शिन्नी... मैं मिली के साथ जाऊँगा...”

इससे पहले कि मैं कुछ बोल पाती, पानी की तेज़ लहर ने मुझे दूर तक पटक दिया. मेरी आँखों के आगे अँधेरा छा गया...

मैं कितनी देर तक बेहोश रही मालुम नहीं. लेकिन जब मेरी आँख खुली तो समंदर में पहले की तरह ही मुर्दानगी जैसी शान्ति थी. आसमान साफ़ हो गया था और चाँद की रौशनी पानी में चमक रही थी. लेकिन जेम्स का दूर दूर तक कोई पता नहीं था.

मैं पागलों की तरह जेम्स जेम्स चिल्लाते हुए उसे ढूँढने लगी लेकिन वह कही नज़र नहीं आया. मुझे लग रहा था कि बस एक ही पल में मेरी दुनिया उजड़ गयी थी. जो दो लोग मेरे सबसे ज्यादा करीब थे वो मुझसे हमेशा के लिए बहुत दूर चले गए थे. मैं रोते रोते वहीँ गिर पड़ी. तभी अचानक मेरी नज़र एक चमकती हुई चीज़ पर पड़ी. मैंने उसे उठाकर देखा...

वो नकली मोतियों की माला थी जो चाँद की रौशनी में चमक रही थी...

चित्र : गूगल से साभार 



© स्नेहा राहुल चौधरी 
29/11/2011 9:20pm