Wednesday, September 23, 2015

मोहब्बतें...

तुम्हें बहुत शिकायतें है न...?
कि मैं प्यार नहीं करता
तुमसे
कि मैं ध्यान नहीं रखता
तुम्हारा
कि मैं वक़्त नहीं निकालता
तुम्हारे लिए


मेरा अपनी चीज़ों को बिखेर देना
ताकि तुम उन्हें संवारो...
कुछ ज़रूरी काम भूल जाना
ताकि तुम याद दिलाओ...
तुम्हें बेवज़ह सताना,
कि मैं मनाऊं जब तुम रूठ जाओ...
तुम जानती हो न
कि ये प्यार नहीं तो क्या है....?


है तुम्हें पता और मुझे भी
कि रूमानियत कोई तोहफा नहीं है
कि ये कोशिश है एक आम ज़िन्दगी के
कुछ आम पलों को ख़ास बनाने की
एक दूसरे को अपनी ज़रूरत का एहसास दिलाने की


है तुम्हें पता और मुझे भी
कि रूमानियत कोई ज़िद नहीं है
कि ये तो बस एक विकल्प की चाह है
एक आम ज़िन्दगी से ऊब जाने की
या उसे प्यार से भरकर उसमे डूब जाने की


तो फिर कहो
कि तुम्हारी शिकायतें
तुम्हारी बेपनाह चाहतें है न...!
कि मेरी ये बेपरवाही
मेरी शरारतें है न...!
कि कुछ आम सी मगर बेहद खास
अपनी मोहब्बतें है न...!

© स्नेहा राहुल चौधरी 


[चित्र - गूगल से साभार ] 

Wednesday, July 22, 2015

चाँद और ख्वाहिशें..

हवाओं में तैरो, आसमां से उतर आओ,
ऐ चाँद, कभी कभी ज़मीन पर भी नज़र आओ...


पलों में रूमानियत थोड़ी और बढ़ी है,
घड़ी दो घड़ी तो और ठहर जाओ...


सुनो, क्या गाती है एहसासों की धड़कन,
महसूस करोगे, थोड़े करीब अगर आओ...


सौदा मेरी नींद का, तुमसे, ख्वाहिशों के लिए,
चलो, अब मेरी हथेली में नज़र आओ...

- © Sneha Rahul Choudhary 


[फोटो साभार - गूगल]

Thursday, June 18, 2015

बॉबी [चैप्टर 4]

[ पिछली कड़ियाँ यहाँ पढ़े - भूमिका, चैप्टर -1चैप्टर 2चैप्टर 3]

ऐसे ही “कुछ भी” करके कुछ न कुछ करते करते कुछ साल बीत गए और एक दिन ईशांत को अपने ऑफिस में एक लड़की “ईशा” के नाम के बैच के साथ दिखाई दी.
उसे देखते ही ईशांत की बांछे खिल गयी. उसे लगने लगा कि यकीनन उसके सपनों को पूरा होने में बस कुछ क़दमों का फासला है. और जब वह उसके करीब पहुंचा तो उसने पाया कि वह तो उसके ख़्वाबों से निकलकर उसके सामने आकर खड़ी हो गयी थी. मासूम सा चेहरा, बड़ी बड़ी खुबसूरत आँखें, फूलों से भी नाज़ुक होंठ और सावन की धूप में घटा जैसे उसके गालों पर बिखरे उसके बाल...

“हे हेल्लो,” उसने आगे बढ़कर लड़की की तरफ हाथ बढाते हुए कहा, “न्यू रिक्रूट? पहले कभी देखा नहीं...?”

“हेल्लो सर!” लड़की ने शालीनता से जवाब दिया, “एक्चुअली आई हैव कम तो मीट माय फ्रेंड.”

“ओह्ह नाईस. हूज योर फ्रेंड?”

“ईशा, शी इज इन एच आर.”

“ईशा...?” ईशांत मुस्कुराते हुए उसके मासूम से मजाक पर फ़िदा फ़िदा सा होते हुए बोला, “लूकिंग फॉर द गल हूज बैज यू वियर?”

“येस सर!” लड़की ने बिना किसी शिकन के कहा, “एक्चुअली आई ड्रॉप्ड कॉफ़ी ऑन माय शर्ट, सो आई हैड टू...” उसने अपनी बात अधूरी छोड़ दी इस उम्मीद के साथ कि ईशांत उसकी पूरी बात समझ लेगा.

ईशांत उसकी बात समझ गया और इसीलिए उसने बातचीत का सिलसिला दूसरी दिशा में मोड़ लिया. उसे ये जानकार भी आश्चर्य हुआ कि उसकी कंपनी में पहले से ईशा नाम की एक लड़की थी. इसे इत्तेफाक के साथ साथ भगवान् की मर्ज़ी मानते हुए उसने नाम के साथ समझौता करते हुए उस लड़की के साथ अपनी जान पहचान बढानी शुरू कर दी. उसका नाम काजल था. वह बिलकुल वैसी ही थी जैसी ईशांत की चाहत थी. ऐसा लगता था जैसे भगवान् ने उसके ख़्वाबों ख्यालों से निकालकर उसकी ड्रीम गर्ल उसके सामने खड़ी कर दी हो. वह बिलकुल दूध जैसी गोरी थी. इतनी गोरी कि उसके कपोलों पर दूध में पिघली हुयी गुलाब की पंखुड़ियों जैसा रंग आ जाया करता था. वह खुबसूरत थी, मासूम थी, भोली थी, प्यारी थी, और सारे जहाँ की मासूमियत के साथ कभी कभी इशारों में ईशांत से अपने प्यार का इज़हार भी कर देती थी. कम से कम ईशांत को तो ऐसा ही लगता था. ज्यादा दिन नहीं बीते थे जब उसके खुबसूरत चेहरे पर अपने होंठो के स्पर्श के साथ ईशांत ने कहा था, “तुम जैसी बहु पाकर मेरी माँ बहुत खुश होगी.”

“और तुम?” उसने शर्माते हुए पूछा था.

खटर... खटर... खटर.... खटर.. खटर...

अचानक होने लगी इस खट पट से ईशांत काजल के ख्यालों से निकल वापस उस गैराज में पहुंचा. उसने सर घुमाया तो एक हिलती डुलती सी परछाई दिखी. यकीनन वो अक्की ही था...

ईशांत धीरे धीरे रेंगता हुआ उसके पास पहुंचा तो उसने देखा कि जिस तख्ते पर बॉबी लेटी है उस तख्ते के नीचे से अक्की एक थैला निकालने की कोशिश कर रहा था.

अक्की ने उसे आते देखा तो ऊँगली से चुप रहने का इशारा किया.

“ये क्या कर रहे हो?” ईशांत ने फुसफुसा कर पूछा.

“सुबह तक इंतज़ार नहीं कर सकता मैं.” अक्की ने भी फुसफुसा कर जवाब दिया.

ईशांत चुपचाप उसकी हरकतें देखने लगा. कुछ मिनटों की मेहनत के बाद अक्की बिना किसी आवाज़ के वह थैला निकालने में सफल हो गया जो वास्तव में एक बैग था. दोनों लड़के बिना आवाज़ किये चुपचाप गैराज से बाहर निकल आये कुछ दूर जाकर एक पत्थर के पास जाकर बैठ गए.

“तुमने इसे निकाल क्यों लिया? बॉबी हमें यहाँ लायी है. सुबह तक हमें सब कुछ पता चल ही जाएगा.”

“मेरे भाई.” अक्की मुस्कुराते हुए बोला, “जितना मैं बॉबी को जानता हूँ, वह अगर फांसी पर लटकने को भी होती तो मुझे मदद के लिए नहीं बुलाती. लेकिन उसने मुझे बुलाया है तो इसका मतलब ये है कि ये किस्सा मेरी सोच से कही ज्यादा मालदार है.”

“मतलब मैं समझा नहीं.” ईशांत ने हैरानी से कहा, “तुम बॉबी को जानते हो?”

अक्की के चेहरे की मुस्कान गायब हो गयी. दूर तक सूने रास्ते को निहारते हुए वह बोला, “बचपन से.” एक ठंडी आह निकली उसके दिल से. “लम्बी कहानी है. फिर कभी सुनाऊंगा. अभी इमोशनल मत करो.” उसने ज़ल्दी से खुद को संभालते हुए कहा.

ईशांत को उसकी में आवाज़ एक जाना पहचाना सा दर्द महसूस हुआ जो बड़ी ज़ल्दी गायब भी हो गया.

“बॉबी तो कमाल का लम्बा हाथ मारने के तैयारी में है. जियो मेरी जान. एक बार फिर दिल जीत लिया तुमने.”

ईशांत रह रह कर ख्यालों में खो जा रहा था जिस कारण उसने ध्यान नहीं दिया कि कब ईशांत ने उस बैग में से एक छोटी से पॉकेट डायरी निकाल ली थी और उसमे अपनी आँखें घुसाए हुए था.

“इसमें आखिर है क्या?” ईशांत ने उसके हाथ से डायरी लेकर पन्ने पलटते हुए कहा.

“प्लान.” अक्की ने खुश होते हुए कहा.

“कैसा प्लान? ईशांत ने खीझते हुए कहा, “इसमें बस कुछ अजीब से शब्द लिखे है ... हॉर्स डिग्री... रश्मिरथी... शेखर विलिअम्स.. कुछ समझ में नहीं आ रहा इसमें.”

“ये एक खजाने का कोडेड ब्लूप्रिंट है.” अक्की ने बैग में हाथ डालकर और कुछ पाने की उम्मीद में टटोलते हुए कहा, “बैग में और कुछ ख़ास नहीं है. दोनों चुड़ैले सो रही है. चुपचाप गाडी लेकर चलते बनो. इस कोड को अनलॉक करने में हम दोनों को एक दूसरे की ज़रुरत पड़ेगी. जब 50-50 बाँट सकते है तो 25-25 क्यों ले?”
वह बैग कंधे पर टांग कर गाडी की तरफ भागा तो ईशांत भी उसके पीछे भागा.

“ये कुछ ज्यादा ज़ल्दबाज़ी नहीं हो रही?” ईशांत ने हाँफते हुए पूछा.

“मैंने सोचा कि तुम सिर्फ शकल से चोमू दीखते हो. लेकिन तुम वास्तव में चोमू हो.” अक्की ने खीझते हुए गाडी स्टार्ट की.

ईशांत अब भी उसकी बात समझने की कोशिश कर रहा था कि अक्की की खीझी हुई दूसरी झल्लाहट आई, “जस्ट हॉप ऑन, यार! बिलकुल ही फ्यूज़ हो क्या तुम?”

इतनी झाड़ सुनने के बाद भी कन्फ्यूज़ सा ईशांत गाड़ी में बैठ गया. फिर क्या था. अक्की ने एक मिनट भी नहीं लगाया गाड़ी के फर्राटे मारने में.

***************

धूप काफी तेज़ थी. पसीने की बूँदें बॉबी के कंधे पर चमक रही थी. एक हाथ से अपना जैकेट कंधे पर टाँगे वह दूरबीन से कुछ देखने की कोशिश कर रही थी. कुछ कदम दूर नताशा एक पत्थर पर अपना चाक़ू तेज़ करने में लगी थी.

अक्की कुछ कदम हट कर उँगलियाँ तोड़ रहा था. और ईशांत बॉबी की डायरी में कुछ लिख रहा था. सब भरे पड़े थे लेकिन बोल कोई नहीं रहा था.

आखिरकार अक्की से बर्दाश्त नहीं हुआ, “मैं सिर्फ खाना लाने गया था. सोचा सुबह के लिए कुछ इंतज़ाम हो जाएगा. मुझे क्या पता था कि गाडी में सिर्फ एक किलोमीटर तक का पेट्रोल बचा है. आजकल भलाई का कोई ज़माना ही नहीं है. किसी के लिए कुछ करने का सोचो तो लोग शक करने लगते है.”

“काला सेठ की काली कमाई पर लगी काले कव्वे की काली नज़र की कसम अक्की, मैंने तुझसे ज्यादा भला इंसान दुनिया में नहीं देखा.” बॉबी मुस्कुराते हुए बोली और दूरबीन हटाकर आलू चिप्स का एक पैकेट फाड़कर खाने लगी.

“वक़्त बदलता है.. इंसान बदलते है...” अक्की पूरी बेशर्मी से अपनी करनी पर लीपापोती करने में लगा रहा.

“गलत.” बॉबी ने उसकी बात काटी, “इंसान बदलता है तभी वक़्त भी बदलता है. वक़्त तो दोहराया गया था. मैं सोयी थी और तू चला गया था. लेकिन इस बार बॉबी बदली हुई है इसलिए एक किलोमीटर बाद ही तू मुंह लटकाए मिल गया.”

“इसी बात की तो तकलीफ है, बॉबी कि तू भी मुझे दूसरों की नज़र से देखती है. कभी एक बार...” अक्की आगे भी कुछ कहना चाहता था लेकिन नताली ने एक मुक्का मारकर एक टहनी के दो टुकड़े कर दिए जिससे बड़ी तेज़ आवाज़ हुई और कुछ पल को वह भूल गया कि वह क्या बोलना चाहता था.
जब उसे याद आया कि उसे क्या बोलना था तब तक माहौल बदल चुका था क्योंकि बॉबी उसे एक झिडकी वाली नज़र से देखकर नताली के साथ कुछ गपशप करने में मशगूल हो गयी थी.

“मैं सीरियसली जानना चाहता हूँ कि इस प्लान की वायाबिलिटी क्या है?” ईशांत अक्की के पास बैठते हुए एक बड़े से चार्ट पेपर पर आरी तिरछी लकीरे खींचते हुए बोला, “मतलब एक अरबपति ने अपना सारा माल एक अनजान जगह छुपा रखा है जिसका नक्शा एक कविता में कोडेड है जो किसी और ही लिपि में लिखा है. ये सब बॉबी को कैसे पता चला? और ये सब सच है भी या नहीं...?”


[Photo Credit - Google]

Tuesday, June 9, 2015

बॉबी [चैप्टर 3]

[पिछली कड़ियाँ यहाँ पढ़े - भूमिकाचैप्टर 1चैप्टर 2

“लेकिन करना क्या है?” अक्की ने कबाड़ से एक कुर्सी निकाल कर उसपर बैठते हुए पूछा.

“डकैती...” बॉबी ने नाखून चबाते हुए जवाब दिया.

“जे हुई न ज़ोरदार बात.” अक्की ने जोर से चिल्ला कर अपना समर्थन दिया, “अगर तुमने चोरी के लिए बुलाया होता तो मैं वापस चला जाता.”

“मैं कच्चे दांव नहीं खेलती, गुलफ़ाम.” बॉबी मुस्कुराते हुए बोली.

ईशांत ख़ामोशी से सबके चेहरे निहार रहा था. उसे समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करे. बॉबी उसकी ओर देखकर मुस्कुराई और सबसे बोली, “अभी सब आराम कर लो. कल हमें बहुत लम्बे सफ़र पर जाना है. जिसे जहाँ जो जगह मिले, लुढ़क लो...”

चारों ने अपनी ज़िन्दगी के रास्ते खुद चुने थे. इसलिए बिना किसी शिकायत के चारों चार कोने में लुढ़क लिए. थोड़ी देर में तीन अलग अलग तरह के डेसिबल के खर्राटे भी सुनाई देने लगे.

चौथा बचा था ईशांत! उसे नींद नहीं आ रही थी. वह यही सोच रहा था कि क्या उसने अपने ये लिए ये ज़िन्दगी चुनकर सही किया था.

किसी को बुरा न लगे तो एक बात कहे देती हूँ कि हम इंसान अव्वल दर्जे के बेवक़ूफ़ जानवर होते है. हमें लगता है कि ज़िन्दगी के फैसले हम लेते है लेकिन सच्चाई तो ये है ज़िन्दगी हमसे फैसले लिवाती है उल जुलूल हालात पैदा करके. हम खुद को बुद्धिमान मानकर समझते है कि सामने वाला वही सोच  रहा है जो हम चाहते है. लेकिन होता असल में कुछ और है. अब उदाहरण देखिये कि मुझे लग रहा है आप ये कहानी पढ़ कर नाखून चबाते हुए सोच रहे होंगे कि अब आगे क्या होने वाला है लेकिन हो ये रहा है कि आप नाक भौं सिकोड़ कर कह रहे है कि लो जी कर लो बात! आ गयी एक और कहानी चोरी वाली... अभी पिछले ही साल एक महा सुपर हिट फिल्म देखकर आये है नामे “हैप्पी न्यू ईयर” जिसे देखते हुए फिर से कुछ लोगो ने नाक भौं सिकोड़ कर कहा था कि भैया हम इटालियन जॉब और ओशन’स ट्राइलॉजी पचासों बार देख चुके है परन्तु ये देसी वर्जन भी अच्छा है. दरअसल नए डिब्बे में पुराना माल बेचकर “मैं होशियार” की फीलिंग रखने में कोई कानूनी बाधा नहीं है. अब हमें मिर्ची इसलिए लगी क्योंकि हमने पहले ही साफ़ कर दिया था कि यहाँ मामला “डकैती” का है “चोरी” का नहीं. इसलिए अगर आपने भूमिका की चेतावनियों को पढने के बाद भी कहानी पढने का निर्णय लिया है तो यकीन मानिए आपको निराशा नहीं होगी. कृपया इसे बकवास न कहे. भूमिका याद कीजिये. मैंने पहले ही कहा था कि सूत्रधार भी एक छद्म पात्र है.
खैर चलिए वापस वही चलते है जहाँ बात रुकी थी.

ईशांत के दिल में थोड़ी बहुत झिझक थी. उसे अपने सामने बस शून्य नज़र आता था. उसकी झिझक का इतिहास ज्यादा बड़ा नहीं है इसलिए बिना बोर किये यह बताया जा सकता है. ईशांत इक्कीसवी सदी के संस्कारी भारतीय परिवार में पैदा हुआ था. बचपन से ही उसपर माँ बाप के सपने स्कूल बैग के साथ साथ लदे थे. उसकी किस्मत अच्छी थी कि वो उस वक़्त पैदा नहीं हुआ था जब रियलिटी शोज़ का भूत माँ बाप के सर चढ़ कर बोलता था. वरना भगवान ने जितनी सुरीली आवाज़ उसे दी थी, उसके माँ बाप यकीनन उसे इंडियन आइडल जूनियर बना के ही मानते. उसके माँ बाप के सपने उसकी पीठ से उतर उसकी आँखों में आ गए और जब उसकी आँखें उन सपनों से भारी होने लगी तो डॉक्टर ने उसकी आँखों पर चश्मा चढवा दिया.
बचपन बीता और जवानी आई. अपने हमउम्र लड़कों की तरह ईशांत भी “एक अनदेखी अनजानी सी, पगली सी दीवानी सी” लड़की के ख्वाब देखने लगा. उसकी बड़ी इच्छा थी कि उसकी मुलाक़ात ईशा नाम की किसी लड़की से हो, थोड़ी लुका-छिपी हो, थोड़ी हसी-ठिठोली, थोड़े आंसू, थोड़ी उम्मीद, शादी और एक खुशनुमा ज़िन्दगी... न.. न.. खबरदार जो आपने शादी के बाद एक खुशनुमा ज़िन्दगी के ख्वाब देखने वाले ईशांत को हकीकत से अनजान बेवकूफ बालक समझा तो...! भैया, आप अपनी मैया की पूजा करते है कि नहीं...??? तो आप ई काहे भूल जाते है कि आपकी मैया की आपके बाबूजी के साथ शादी के बाद खुशनुमा ज़िन्दगी के बदौलत ही आप अपनी मैया की पूजा करने लायक बने हुए है... फिर आपको ईशांत के सपनों पर क्यों ऐतराज हो रहा है??
या फिर आप उसकी नाम वाली सनक पर भवें सिकोड़ रहे है..? देखिये ईशांत का अपने लिए ईशा नाम की लड़की की ख्वाहिश रखना उतना ही नेचुरल है जितना कि नवीन नाम के किसी लड़के का नूतन नाम की किसी लड़की से मिलने की ख्वाहिश रखना या सन 1998 के बाद से अंजलि नाम की किसी लड़की का राहुल नाम के किसी लड़के से “कुछ कुछ होता है राहुल, तुम नहीं समझोगे...” कहने की चाहत रखना...
इसी इच्छा को दिल में रखे उसने पढाई पूरी कि और नौकरी पर लग गया. माँ बाप का आदर्श बेटा ईशांत एक आदर्श गर्लफ्रेंड की तलाश में था जो आगे चल कर एक आदर्श वाइफ बन सके...
वैसे माँ बाप ने उसे केवल इतनी हिदायत दी थी कि “बेटा, हमारी मर्ज़ी के बिना चाहे “कुछ भी” करना मगर शादी मत करना.” इसलिए ईशांत “कुछ भी” करके माँ बाप की मर्ज़ी से ही शादी करना चाहता था.


ऐसे ही “कुछ भी” करके कुछ न कुछ करते करते कुछ साल बीत गए और एक दिन ईशांत को अपने ऑफिस में एक लड़की “ईशा” के नाम के बैच के साथ दिखाई दी. 
[क्रमश:]

Sunday, May 31, 2015

बॉबी [चैप्टर 2]

[ पहली कड़ी यहाँ पढ़े - चैप्टर 1

चाय आ गयी थी. दोनों धीरे धीरे चाय सुड़कने लगे थे.

“मुझे लगता है मैंने तुम्हे पहले कही देखा है.” चाय पीते हुए अक्की ने अपनी नज़रें उसपर टिकाई.

ईशांत हडबडा सा गया. उसके हाथ अचानक से सुन्न से पड़ने लगे थे.

अक्की उसकी ये हडबडाहट देखकर एक मक्कार हंसी के साथ बोला, “चिल्ल यार! मैं तो मजाक कर रहा था. बस वेट कर रहा था कि तुम अपनी बैक स्टोरी सुनाओ या कुछ घबरा कर अपने मुंह अपनी ही सफाई देना शुरू कर दो...”

इससे पहले कि ईशांत कुछ बोल पाता, एक काली टोयोटा क्वालिस आकर उनके सामने रुक गयी. गाड़ी के काले शीशे नीचे सरके और अन्दर से एक लड़की ने उन दोनों की ओर देखा. कंधे से हलके नीचे झलके उसके काले बाल उसकी काली टर्टलनेक पर फब रहे थे. ईशांत ने शंका से और अक्की ने बेतकल्लुफ़ी से उसे देखा.

लड़की ने कुछ पलों तक दोनों को घूरा और गियर बदलते हुए पूरी धौंस के साथ बोली, “गाड़ी में बैठो.”

उसकी हुक्मरानी बात सुनकर अक्की तो खड़ा हो गया लेकिन ईशांत ने शंकित होकर पूछा, “मुझसे कह रही हो?”

“हाँ!” लड़की ने संक्षिप्त जवाब दिया.

“अरे बैठो यार!” अक्की तब तक गाड़ी के सामने का दूसरी तरफ वाला दरवाज़ा खोल चुका था, “टेंशन मत लो. मैं हूँ न..”

लड़की ने ग़ज़ब की फुर्ती के साथ दरवाज़ा बंद किया और तेवर के साथ बोली, “तुम्हारे दादा की गाडी नहीं है. पीछे बैठो दोनों.” फिर वह सबको सुनाने के अंदाज़ में बुदबुदाई, “पता नहीं, नमूनों को उठाने के लिए हमेशा मुझे ही क्यों भेजा जाता है...  ”

“और सुनो..!” हर एक पल का मज़ा लेते हुए अक्की पिछली सीट पर बैठते हुए बोला, “पहले लड़के लड़कियों को उठाते थे, अब लडकियां लडको को उठा रही है, “कलियुग है! घोर कलियुग!”

लड़की ने अचानक एक पिस्तौल निकाली और उसमें मैगज़ीन लोड करके अक्की की ओर तानते हुए पूरी नफरत के साथ कहा, “अगर दुबारा तुम्हारे मुंह से आवाज़ निकली तो बोलने के लायक नहीं छोड़ूंगी.”

उसके गुस्से का मजाक उड़ाते हुए अक्की दांतों से होंठ काट कर चुप हो गया. उससे हटा तो लड़की का ध्यान ईशांत पर गया जो अभी भी बाहर ही था. लड़की ने उसे देखकर खीझते हुए कहा, “तुम्हें इनविटेशन कार्ड देना पड़ेगा क्या..?”

ईशांत हडबडाया हुआ सा पीछे की सीट पर अक्की की बगल में बैठ गया. लड़की की पिस्तौल देखकर अक्की शांत हो गया था लेकिन जो चुप हो जाए वो अक्की कहाँ... कुछ मिनट चुप रहने के बाद उसकी जुबान फिर खुली, लेकिन इस बार ईशांत के लिए. “भाई,” उसने ईशांत से कहा, “मैंने तो अंदाज़ा नहीं लगाया था कि तुम भी उसी फ़ोन कॉल पर शहीद होने निकल पड़े हो.”

ईशांत ने कोई जवाब नहीं दिया. लेकिन वह इतना समझ चुका था कि उसे और अक्की को फ़ोन करके ज़िन्दगी में कुछ शानदार करने का लालच देकर रात के २ बजे दिल्ली-आगरा हाईवे पर बुलाने वाली एक ही लड़की थी.
जो भी था... और जैसा भी हो रहा था... ईशांत की दिलचस्पी ज़िन्दगी में मसलों में वापस आने लगी थी...

“बोल न भाई...” अक्की ने जोर से कहा तो ईशांत की तन्द्रा टूटी, “खुद से बाते करके बोर हो गया. आई वान्ना नो योर स्टोरी...”

“कुछ नहीं.” ईशांत ने ठंडी आह भरकर कहा.

“इश्क़ का मामला लगता है मुझे तो.” अक्की ने अपनी एक आँख दबाते हुए ईशांत को छेड़ा. ईशांत फिर भी चुप ही रहा.

ड्राईवर की सीट पर बैठी वह लड़की बहरों सा बर्ताव कर रही थी मानो उसे अक्की की बाते सुनाई ही न दे रही हो. ईशांत को शक था कि हो न हो इसी लड़की ने उसे फ़ोन किया था लेकिन अक्की को पक्का यकीन था फ़ोन पर जिसकी आवाज़ उसने सुनी थी वह किसी और लड़की की थी. उन दोनों के मन में चल रहे कई सवालों से अनजान बनी वह लड़की चुपचाप गाड़ी चलाये जा रही थी. गाड़ी के अन्दर रौशनी थी और उसी रौशनी में ईशांत सामने के शीशे पर उभर रही लड़की के चेहरे को पढने की कोशिश कर रहा था. उसका चेहरा अजीब तरीके से कठोर सा था. मतलब उसमे कोमलता या कमनीयता नाम की चीज़ नहीं थी. देखने से ही उसके जबड़े काफी सख्त लग रहे थे. उसके होंठ अजीब से रूखे और सूखे से थे. उसके नीचे वाले होठों के दाई तरफ कटे का एक हल्का सा निशान था जिसे छुपाने की शायद उस लड़की ने कोई कोशिश नहीं की थी. उसकी आँखें उदास जैसी थी. उसके दाए गाल पर अजीब से छोटे छोटे गड्ढे थे. शायद मुंहासों के... लेकिन मुंहासों के गड्ढे दोनों गालों पर होने चाहिए थे न.. तो फिर ये गड्ढे... ईशांत गौर से देखने के चक्कर में अनजाने में थोडा आगे झुक गया...

इतने में गाडी ने अचानक एक खतरनाक टर्न लिया और ईशांत का सर शीशे से जा टकराया.

“अपनी औकात में रहो, ईशांत शर्मा...” लड़की पीछे पलट कर गुर्राई, “तुम्हारे बॉस की बीवी नहीं हूँ जो तुम्हारे मासूम चेहरे पर फ़िदा हो जाउंगी...” कुछ पलों तक घायल शेरनी की तरह ईशांत को घूरने के बाद उसने गाडी की स्टीयरिंग फिर से संभाल ली.

अचानक हुए इस वाकये से ईशांत घबरा सा गया था. उसकी सांस अचानक उखड गयी थी. वह थोड़ी देर शांत रहकर सामान्य होने की कोशिश करने लगा. अक्की बेतकल्लुफी से दोनों को देखता रहा. बीच-बचाव करना वैसे भी उसके उसूलों में शामिल नहीं था खासतौर पर तब तो हरगिज़ नहीं जब उसका कोई फायदा न होता है. लेकिन दिल ही दिल में वह इस लड़की की हिम्मत पर दाद दे रहा था. वैसे भी बस में सीट के लिए रोने वाली लडकियां उसे कभी पसंद नहीं आई थी. वह भी काफी देर से लड़की का भूगोल जाने की कोशिश कर रहा था. लड़की शायद टीवी नहीं देखती थी. वरना अपने रूखे चेहरे पर एक बार तो वैसलीन मलने का ख़याल उसे आ ही जाता. वैसे खूबसूरत तो थी वो. बस अपने सांवले चेहरे से थोडा प्यार करती तो यकीनन उसकी खूबसूरती एक अलग ही मिसाल होती. लेकिन ऐसा लग रहा था जैसे उसका ध्यान अपनी खूबसूरती के बजाय कही और उलझा हुआ था. और उसका ध्यान कहाँ उलझा हुआ था ये अक्की ने बखूबी देख लिया था. उसके हाथों की कसरती मांसपेशियां कहानी के कुछ हिस्सों को तो बयान कर ही रही थी. अक्की ने अंदाज़ा लगाया कि उसका एक ज़ोरदार मुक्का किसी हट्टे कट्टे बन्दे के भी जबड़े तोड़ सकता था. अक्की जहाँ बैठा था वहां से वह उसे अच्छी तरह से दिखाई दे रही थी. उसका कसरती शरीर चीख चीख कर उस के वर्कआउट के कड़े अनुशासन की गवाही दे रहा था. “पुश-अप्स और वेट-लिफ्टिंग तो रोज़ करती होगी.” उसने सोचा लेकिन उससे पूछने की उसकी हिम्मत न हुई.

कुछ देर तक और चलने के बाद गाडी एक गेराज के आगे जाकर रुकी. लड़की बिना उन दोनों की ओर देखे चुपचाप गाडी से उतर कर अन्दर चली गयी. अक्की ने ईशांत की ओर देखा और मुस्कुराते हुए लड़की के पीछे चल दिया. ईशांत ने दोनों के देखा और खामोशी से अक्की के पीछे हो लिया.

लड़की गेराज के पिछले दरवाजे से एक छोटे से कमरे में पहुंची और एक छोटी सी लाइट जलाते हुए बोली, “बॉबी, लड़के आ गए है.”

अक्की ने आशिक़ी से और ईशांत ने कुतूहल से यह नाम सुना. लेकिन हैरत तीनों को हुई जब कोई जवाब नहीं आया. लड़की ने लाइट पूरे कमरे में घुमाई तो एक कोने में जीन्स और जैकेट पहने कुर्सी पर लुढकी हुई एक दूसरी लड़की दिखी जिसका चेहरा काऊबॉय हैट से ढका था.

“बॉबी.” पहली ने दूसरी को दूसरी बार पुकारा.

दूसरी के शरीर में हरकत हुई. उसके दाए हाथ ने चेहरे से हैट को हटाया और अपनी नींद से बोझिल आँखें लिए पूरी अंगड़ाई के साथ बॉबी उठ खड़ी हुई. उसने आगे बढ़कर एक स्विच ऑन किया और पूरा कमरा रौशनी से नाहा गया. उसी रौशनी में उसने ईशांत और अक्की को देखा और ईशांत और अक्की ने उसे.. कंधे तक झुल्के अखरोटी बाल, बड़ी बड़ी आँखें, सलोना चेहरा, नाज़ुक से होंठ और उन होंठो पर एक कातिल मुस्कान..

वह दो कदम आगे बढ़ी और अपनी जेब से एक मोबाइल निकाल कर बगल में रखी एक कुर्सी पर पैर फैला कर बैठते हुए बोली, “बड़ी देर से दर पे आँखे लगी थी... हुज़ूर आते आते बड़ी देर कर दी...”

“हाय!” अक्की सीने पे हाथ रखते हुए आह भरने लगा, “क्या कहे यारों कि हम ऐसे संगदिल से मिले... क़त्ल भी किया और जान भी बख्श दी, हम एक ऐसे हसीन क़ातिल से मिले...”

बॉबी ने मुस्कुरा कर अक्की को देखा और फिर ईशांत की ओर देखते हुए बोली, “खुशामदीद!”

“तुमने ही फ़ोन किया था न?” ईशांत ने पूछा.

“हाँ!” बॉबी ने जवाब दिया, “अगर तुम्हे जल्दी है तो हम आज से ही काम शुरू कर देते है.”

“लेकिन करना क्या है?” अक्की ने कबाड़ से एक कुर्सी निकाल कर उसपर बैठते हुए पूछा.

“डकैती...”
[क्रमशः]

Wednesday, May 20, 2015

बॉबी [चैप्टर -1]

रात के करीब डेढ़ बजे थे. वह अपने जूते घिसटता हुआ अपने क़दमों को गिनने की कोशिश कर रहा था. उस वक़्त दिल्ली-आगरा हाईवे रामदयालु-सुल्तानगंज जैसा सुकून तो नहीं दे रहा था पर करकरडूमा-राजीव चौक के शोर शराबे को चुनौती देने की खुली घोषणा ज़रूर कर रहा था. उसकी ली-वाइज़ की जींस कई जगह से उधरी हुई थी. हालांकि भरोसेमंद रही थी उसकी यह ली-वाइज़ की जींस... पिछले कई महीनों से जब से उसकी किस्मत ने उससे खुली जंग छेड़ दी थी, तब से हर मोड़ हर मौके पर उसकी इस जींस ने लोहा लेने में उसका साथ दिया था... ये अलग बात थी कि जिसने वह जींस ‘गिफ्ट’ में दी थी, उसने साथ छोड़ दिया था, लेकिन उस जींस ने उसका साथ नहीं छोड़ा था... माँ कसम पिछले कई महीनों से लगातार घिस रही उस जींस को बेशक अपनी बिरादरी के भाई-बंधुओं की शान-ओ-शौकत पर कई बार रश्क हुआ होगा लेकिन वह भी पक्की नमकहलाल... अर्र माफ़ कीजिये... डिटर्जेंट-हलाल निकली... दरअसल उसकी वह जींस समाजवाद की सच्ची पुरोधा थी. उसने अपने निर्माण के गौरवशाली इतिहास के घमंड में चूर न होकर उसकी दान और दया में मिली हर टी-शर्ट और शर्ट का एकसमान निर्विकार भाव से साथ दिया था. अगर “इंडियाज गाट वफादार” नाम का कोई टैलेंट हंट होता तो यकीनन वह जींस पहला खिताब जीत लाती.



वैसे वफादारी में तो उसके वुडलैंड के जूतों का भी कोई सानी नहीं था. उसे याद था वह दिन, जब साकेत के वुडलैंड शो-रूम में उस खूबसूरत सी सेल्सगर्ल ने इन जूतों की रसीद के पीछे अपना फ़ोन नंबर लिख कर एक हसरत भरी मुस्कराहट के साथ उसे दिया था और कैसे उसने वह नंबर देखकर गर्व के साथ कहा था – “सॉरी डिअर, आई एम् कमिटेड...”

“कमिटेड...”

अचानक रात के उस सन्नाटे में हवा बड़ी तेज़ी से उडी और रास्ते की धूल उसके मुंह पर ज़िन्दगी के एक तमाचे की तरह पुत गयी.
वह भूत से वर्तमान में आ गया था.

करीब दो बज चुके थे. रात के सन्नाटे में पिछले आधे घंटे से पैदल चलता हुआ वास अपने गंतव्य तक पहुँच गया था. पहले बार अपने क़दमों से नज़रे हटाकर उसने रौशनी से नहाए हुए उस बोर्ड को पढ़ा – “बाबूजी दा ढाबा”

वह अच्छी तरह से पहचानता था इस ढाबे को. पिछली बार अपनी हार्ले डेविडसन उसने यही खड़ी थी. बड़ी शान से... इसी ढाबे पर तो उसने यह खोज की थी कि उसे ऑस्कर वाइल्ड नहीं बल्कि नोरा रोबर्ट्स और सोफी किन्सेला पसंद थी. कैसे खिलखिला कर हंसी थी वो जब उसने उसके हैंडबैग में से “आई हैव योर नंबर” निकाली थी.
“तुम मुझे बेवकूफ बना रही थी, आजतक?” प्यार भरी नाराज़गी थी ये.
“और क्या करती?” वह मुस्कुराकर बोली थी, “ज़िन्दगी में वैसे ही इतने सारे गम है. अब अगर तुम्हारी तरह हर चीज़ में परफेक्शन तलाशना शुरू कर दू तो हो गया मेरा बंटाधार. और ऑस्कर वाइल्ड की वे सारी किताबें तो बस तुम्हे इम्प्रेस करने के लिए अपने पास रखती थी...” उसने हौले से अपनी बायीं आँख दबाते हुए कहा था.
“बड़ी चालू हो तुम तो...” उसने प्यार भरी चिकोटी काटी थी उसके गाल पर, “फंसा ही लिया तुमने मुझे अपने जाल में...”

और फिर वो हंसी... जैसे पहाड़ों से गिरती हुई वो नदी होती है न... अल्हड़ सी... ज़िन्दगी से भरपूर... कभी उधर कभी उधर... चहकती हुई सी...
उसने महसूस किया था... कैसे किसी का चहकना... महकना... ज़िन्दगी को जवान बनाए रखता है... आज बमुश्किल तीस का भी नहीं हुआ था लेकिन बेहद बूढा महसूस करता था खुद को...

कितनी अलग थी वो उससे... और कितना अलग था वो उससे... लेकिन न जाने क्या दिख गया था उसे इसमें... उसकी खनकती हुई सी आवाज़ दिन भर की सारी थकान उतार देती थी... उसके नखरे... उसकी फरमाइशें – “सुनो न इशांत...” और एक बार जो ये “सुनो न इशांत” शुरू होता तो फिर ये मुस्कुरा सुनता रहता वो चहक कर सुनाती रहती... दुनिया भर की फरमाइशें जो कभी ख़तम होने का नाम न लेती लेकिन फिर भी उसे यही महसूस होता कि कितना कम मांगती है वो उससे. उसका बस चले तो सारी दुनिया लाकर उसके क़दमों में रख दे...

कितना तरस गया था वो उस आवाज़ को सुनने के लिए... काश, एक बार वो अपनी आवाज़ में उसका नाम पुकार लेती... बस एक बार उसे आवाज़ दे देती तो उसकी ज़िन्दगी का सन्नाटा ख़तम हो जाता...

उसकी आवाज़ तो नहीं, लेकिन सामान से लादे एक ट्रक ने ज़रूर सन्नाटे को भंग किया. उसकी तन्द्रा टूटी तो उसे पता चला कि वह सड़क के बीचोबीच खड़ा था. वह एक तरफ हो गया. ट्रक गुज़र गया. गनीमत थी कि वह नहीं गुज़रा. वैसे तो उसकी ज़िन्दगी में जीने लायक कुछ ख़ास बचा नहीं था लेकिन मरने के बारे में उसने अभी सोचा नहीं था. बस एक अजीब सी उम्मीद थी जो उसे इस ढाबे तक ले आई थी.

जूते घिसटता हुआ वह ढाबे के सबसे छोर पर रखी एक बेंच पर बैठ गया. ढाबे की गहमागहमी थोड़ी कम पड़ गयी थी. एक लड़का बनियान में हाथ पोछता हुआ बाहर निकला और उसकी तरफ आया.

“क्या लेगा साहेब?” लड़के ने पूछा.
वह थोड़ी देर को अचकचा गया. उसने पूरा हिसाब लगाया था कि ढाबे तक पहुँचते पहुँचते उसे इंतज़ार न करना पड़े. लेकिन अब सोचना बेकार था. वह मुसीबत में पड़ चूका था. जेब में फूटी कौड़ी तक नहीं थी. शर्ट से पसीने की बू आ रही थी. और ढाबे वाला खैरात देने के मिजाज़ में तो बिलकुल नहीं लगता था.

“एक गिलास पानी दे, अभी. फिर बताता हूँ” उसने गला साफ़ करते हुए कहा.

लड़के ने ऊपर से नीचे तक उसे गौर से देखा. बाल थोड़े बड़े और बिखरे हुए. बिखरी हुई दाढ़ी और मूछें... कुचैली सी शर्ट और उधरी हुई जींस के साथ बड़े सोल वाले जूते. लड़के को गड़बड़ लगी. वह वहां से खिसका और जाकर मालिक के कान में कुछ कानाफूसी की.

लड़के ने जिस अंदाज़ से घूरा था उससे तो उसने ये अंदेशा लगा लिया था कि कुछ ही देर में ये सब मिलके उसे धक्के मार के निकाल देंगे. इसलिए कोई कुछ कहे इसके पहले ही वह उठने को हुआ. तभी किसी ने उसके कंधे पर हाथ रखते हुए जबरदस्ती वापस बिठा लिया.

“बैठो दोस्त!”
उसने चौंकते हुए उस अजनबी की ओर देखा जो उसे दोस्त कहकर बुला रहा था. आँखों पर रे-बैन टिकाये, हाथ में टाइटन बांधे, नीली टी-शर्ट और डेनिम जींस पहने वह शख्स मुस्कुरा रहा था.
इतने में ढाबे का मालिक भी पहुँच गया. उसने दोनों को घूर कर देखा. डेनिम को देखकर उसे ऐसा लगा जैसे दो दिन पहले की बनी बासी दाल मखनी में किसी ने ताज़ा तड़का लगा कर ऊपर से धनिये की पत्तियाँ डाल दी हो. वही ली-वाइज़ को देखकर उसे ऐसा लगा जैसे बासी बजबजाती पनीर भुर्जी में जी भरकर घी और जीरे की छौंक लगाने के बाद भी उसकी बदबू न गयी हो..

खैर ऐसे दृश्य तो उसकी ज़िन्दगी में रोज़ ही देखने मिलते थे. वह काम-धंधे और बाल-बच्चे वाला आदमी था इसलिए अपने एक दर्जन लठैतों के बावजूद वह आँखे और कान बंद करके काम करता था. जगमगाते ट्यूब-लाइटों की चमचमाती रौशनी में प्रतिदिन और प्रतिरात दमदमाते हुए काम करने के बावजूद जब कभी नजदीकी पुलिस चौकी में किसी अपराधी की शिनाख्त करने के लिए उसे बतौर गवाह बुलाया जाता था तो वह कई मिनटों तक घूरने के बावजूद पहचानने से इनकार कर देता था. उसे बस एक ही बात से मतलब होता था कि बस उसके ढाबे को कोई नुक्सान न हो.
और इन दो लड़कों को देखकर उसे यकीन हो गया था कि इन जमूरों से डरने वाली कोई बात नहीं है.

उस अजनबी ने ढाबे वाले को देखकर तुरंत कहा, “दो कप चाय. और साथ में बिस्किट.”

“ला रे...!” ढाबे वाला चिल्लाया और बिना किसी प्रतिक्रिया के रास्ता बदल के दूसरी ओर चला गया. छोटा लड़का तुरंत चाय लाने दौड़ पड़ा.

“तुम कौन हो?” स्थिति सँभालने पर ली-वाइज़ ने डेनिम से पूछा.

“मैं भगवान् कृष्ण हूँ. मुसीबत में फंसे भक्तों की रक्षा करता हूँ.” डेनिम ने मुस्कुरा कर कहा.

“बकवास बंद करो.” ली-वाइज़ झल्ला गयी.

“अरे गुस्सा मत करो यार! मेरा नाम अक्की है.” अक्की ने बेतकल्लुफी से कहा, “लेकिन सच बताऊ. मुझे ये देखकर दुःख हो रहा कि दुनिया में मैं अकेला सेंस ऑफ़ ह्यूमर का मालिक बचा हूँ. अब मेरी विरासत कौन संभालेगा...?”

शायद मजाक किसी को अच्छा नहीं लगा था. थोड़ी देर के लिए सन्नाटा छा गया.

“चिल यार!” अक्की ने ही शुरुआत की, “यहाँ तुम्हें मुसीबत में देखा तो हेल्प कर दी. दैट्स इट!”

“थैंक्स!” जवाब छोटा और भावहीन था.

“मोस्ट वेलकम. लेकिन बताओ, कि तुम्हारी ऐसी हालत कैसे हो गयी? एक्सेंट से पढ़े लिखे काबिल लगते हो. फिर ये हुलिया क्यों बना रखा है?”

उसने कोई जवाब नहीं दिया.

“नाम क्या है तुम्हारा?” अक्की ने फिर पूछा.

“ईशांत... ईशांत शर्मा.” और आखिरकार ली-वाइज़ ने अपनी पहचान बता ही दी.

अक्की ने कोई जवाब नहीं दिया लेकिन उसकी निगाहें ईशांत के चेहरे को ऐसे घूर रही थी जैसे कोई बाघ झपट्टा मारने से पहले हिरण के क़दमों की आहट को तोलता है. 

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